जैव विविधता

जैव विविधता

– सामान्यत: रूप से जैव विविधता से अभिप्राय जीव मण्डल में पाये जाने वाले जीवों की विभिन्न जातियों की विविधता से हैं।

– जैव विविधता शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम एर्डवर्ड ओ. विल्सन ने किया।

– यह विविधता आनुवंशिक जाति एवं पारिस्थितिक तंत्र प्रकार की होती है, जो पर्यावरण संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

– राज्य की प्राकृतिक विशिष्टताओं ने यहाँ पेड़-पौधे एवं जीव जन्तुओं को अनुठापन दिया है तथा ये राजस्थान का जैव विविधता की दृष्टि से समृद्ध प्रान्त है।

– जैव विविधता की दृष्टि से राज्य को चार विशिष्ट जैव विविधता क्षेत्रों में विभाजित किया गया है।

1. मरु अथवा मरुस्थलीय पारिस्थितिक तंत्र

2. अरावली पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र

3. पूर्वी मैदानी पारिस्थितिक तंत्र

4. दक्षिणी पूर्वी पठारी पारिस्थितिक तंत्र

1. मरु अथवा मरुस्थलीय पारिस्थितिक तंत्र:-

– राजस्थान का उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र मरुस्थली तथा अर्द्ध-मरुस्थली प्रदेश है।

–       यहाँ की विशेषता न्यून वर्षा तथा उच्च तापमान है।

– इस पारिस्थितिक क्षेत्र में कांटेदार वृक्ष, कंटीली झाड़ियाँ, घास आदि की बहुलता है, जिन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है।

2. अरावली पर्वत पारिस्थितिक तंत्र:-

– राज्य के दक्षिणी-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की और फैली अरावली पर्वत शृंखला न केवल एक विशिष्ट भू-रूप हैं, जो जैव विविधता की दृष्टि से समृद्ध तथा विशिष्ट प्रदेश है।

– इस पारिस्थितिक तंत्र के दक्षिण में वनों का विस्तार है, जहाँ बहुतायत में वनस्पति पाई जाती है।

– इस क्षेत्र में सागवान के जंगल और अन्य सदाबहार वृक्ष बहुतायत में पाये जाते हैं।

– इस क्षेत्र में धोक, केर, आम, महुआ, चुरैल, सालर, बांस आदि वनस्पतियाँ तथा बघेरा, रीछ, जरख, चौंसिगा काला हिरण, चीतल, सांभर, जंगली, सुअर, भेड़ियाँ, उड़न गिलहरी, लोमड़ी, आदि वन्य जीव पाये जाते हैं।

– इस क्षेत्र में पाये जाने वाले जीवों के संरक्षण के लिए इस क्षेत्र में कुम्भलगढ़, जयसमंद तथा माउंट आबू अभयारण्य, रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान, सरिस्का अभयारण्य, कैलादेवी अभयारण्य इसी क्षेत्र में स्थित है।

3.पूर्वी मैदानी पारिस्थितिक तंत्र:-

– यह अरावली पर्वतमाला के पूर्वी भाग में स्थित गंगा यमुना के मैदान का भाग है।

– इस क्षेत्र में पक्षियों की संख्या सर्वाधिक पाई जाती है।

– केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान इसी क्षेत्र के अंतर्गत है, जिसे यूनेस्को द्वारा विश्व प्राकृतिक धरोहर घोषित किया गया है।

4. दक्षिणी-पूर्वी पठारी पारिस्थितिक तंत्र:-

– यह क्षेत्र हाड़ौती के पठार के नाम से जाना जाता है।

– इस क्षेत्र में जलीय जैव-विविधता सर्वाधिक पाई जाती है।

– चम्बल क्षेत्र में मगरमच्छ, घड़ियाल, डॉल्फिन, कछुएँ विविध प्रकार की मछलियाँ, केकड़े आदि पाये जाते हैं।

– मुकुन्दरा राष्ट्रीय उद्यान में वन्य जीवों के अतिरिक्त अनेक पादपीय विविधता है।

– इस क्षेत्र में जैव विविधता संरक्षण हेतु रामगढ़ अभयारण्य, सेरगढ़ अभयारण्य, बस्सी अभयारण्य तथा राष्ट्रीय चम्बल घड़ियाल अभयारण्य बनाये गये हैं।

जैव विविधता का संरक्षण:-

     जैव विविधता वर्तमान समय में संकटग्रसत है, इसके

      निरंतर विलुप्त होने अथवा इसमें कमी के प्रमुख कारण है-

(i) प्राकृतिक आवासों का नष्ट होना अथवा कम ।

(ii) कीटनाशकों का अतिशय प्रयोग।

(iii) शिकार, अंधविश्वास एवं अज्ञानता।

(iv) जलवायु प्रदूषण।

(v) पर्यावरण प्रदूषण।

(vi) प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन।

(vii) विदेशी प्रजातीय का आक्रमण।

– जीव एवं वनस्पति संरक्षण दो प्रकार से किया जा सकता है।

1. स्व: स्थाने संरक्षण:-

– संकट कालीन प्रजाति को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षण प्रदान करना।

(i) जैव मण्डल रिजर्व

(ii) संरक्षण रिजर्व

(iii) राष्ट्रीय उद्यान

(iv) वन्य जीव अभयारण्य

2. बहि: स्थाने संरक्षण:-

– इस विधि में संकटग्रसत पादप व जंतु प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर कृत्रिम आवास में संरक्षण प्रदान किया जाता है।

(i) बॉटेनिकल उद्यान

(ii) बीज बैंक

(iii) टिश्यू कलचर लैब

(iv) चिड़िया घर

(v) जीन बैंक

जैव-विविधता संरक्षण के प्रयास:-

राजस्थान स्तर पर:–

– राजस्थान में 14 सितम्बर, 2010 को “राजस्थान राज्य जैव विविधता बोर्ड” की स्थापना की गई।

– राजस्थान में जैव विविधता विरासत स्थल के रूप में चयनित स्थल।

1. आंकल गाँव जीवाश्म पार्क (जैसलमेर)

2. नाग पहाड़ (अजमेर)

– राजस्थान में जैव विविधता पार्क:- ‘गमधर वन क्षेत्र’ (उदयपुर) में स्थित है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर:-

1. IUCN International Union for conservation of nature का गठन 1948 में किया गया। जिसका उद्देश्य जैव विविधता में होने वाली कमी को दर्शाना एवं उसे रोकने के लिए प्रयास करना है।

2. रेड डाटा बुक (Red Data Book)

– IUCN द्वारा इस पुस्तक का प्रथम संस्करण का प्रकाशन 1 जनवरी, 1972 को हुआ। इसके पाँच संस्करण जारी हो चुके हैं-

(i) लाल रंगों के पृष्ठों पर मुद्रित:- विलुप्त या लुप्त हो रहीं जातियाँ।

(ii) सफेद रंग के पृष्ठों पर मुद्रित:- कम संख्या में पाये जाने वाली प्रजातियाँ।

(iii) पीले रंग के पृष्ठों पर मुद्रित:- लुप्त होती प्रजातियों की संख्या मे तेजी से कमी आना।

(iv) भूरे रंग के पृष्ठों पर संख्या कम होने की आंशका।

(v) हरे रंग के पृष्ठों पर मुद्रित:-  ऐसी जातियाँ जिन्हें बचा लिया गया है तथा संख्या में वृद्धि हो रही है।

(iii) CITES (Conventation on International Trade in Endangered Species)

– IUCN द्वारा 1973 में आयोजित कर्न्वेशन में संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर नियंत्रण लगाने से संबंधी सहमति। 

– जैव विविधता को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है।

1. आनुवंशिक जैव विविधता:-

– जीवन निर्माण के लिए जीन एक मूलभूत इकाई है।

– किसी प्रजाति में जीन को विविधता की आनुवंशिक जैव-विविधता है।

– समान भौतिक लक्षणों वाले जिलों के समूह को प्रजाति कहते हैं।

– मानव आंशिक रूप से ‘होमोसेपिन’ प्रजाति से संबंधित है, जिससे कद, रंग और अलग दिखावट जैसे शारीरिक लक्षणों में भिन्नता है। इसका मुख्य कारण आनुवंशिक जैव विविधता है।

2. प्रजातीय जैव विविधता:-

– यह प्रजातियों की अनेक रूपता को बताती है।

– यह किसी निर्धारित क्षेत्र में प्रजातियों की संख्या से संबंधित है।

– प्रजातियों की विविधता, उनकी समृद्धि प्रकार तथा बहुनता से आंकी जाती है।

– जिन क्षेत्रो में प्रजातीय विविधता अधिक होती है उन क्षेत्रों को जैव विविधता हॉट-स्पॉट कहते है।

3. पारितंत्रीय जैव विविधता:-

– परितंत्रों में होने वाली पारितंत्रीय प्रक्रियाएँ तथा आवास स्थानों की भिन्नता ही पारितंत्रीय विविधता बनाते हैं। 

जैव विविधता का महत्त्व:-

– जैव विविधता ने मानव संस्कृति के विकास में बहुत योगदान दिया है।

– जैव विविधता की पारिस्थितिक, आर्थिक और वैज्ञानिक भूमिकाएँ प्रमुख है।

(i) जैव-विविधता की पारिस्थितिक भूमिका:-

– पारितंत्र में कोई भी प्रजाति बिना कारण न तो विकसित हो सकती है और न ही बनी रह सकती है अर्थात् प्रत्येक जीव अपनी जरूरत पूरा करने के लिए साथ-साथ दूसरे जीवों के पनपने में सहायक होता है।

– जीव व प्रजातियाँ ऊर्जा ग्रहण कर उसका संग्रहण करती है कार्बनिक पदार्थ उत्पन्न एवं विघटित करती है और पारितंत्र में जल व पोषक तत्त्वों के चक्र को बनाए रखने में सहायक होती है।

(ii) जैव विविधता की आर्थिक भूमिका:-

– सभी मनुष्यों के लिए जैव विविधता एक संसाधन है।

– खाद्य फसलें, पशु, वन संसाधन, मत्स्य और दवा संसाधन आदि प्रमुख आर्थिक महत्त्व के संसाधन है।

(iii) जैव विविधता की वैज्ञानिक भूमिका:-

– जैव विविधता का स्तर अन्य जीवित प्रजातियों के साथ हमारे संबंध का एक अच्छा पैमाना है।

– वास्तव में जैव-विविधता की अवधारणा कई मानव संस्कृतियों के अभिन्न अंग है।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:-

1. अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस 22 मई को मनाया जाता है।

2. वर्ष 2011-2020 तक UNO द्वारा जैव विविधता दशक घोषित किया गया।

3. वर्ष 2010 को जैव विविधता को अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया गया है।

4. भारत का पहला जैव मण्डल – नीलगिरी (1986) है।

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