राजस्थान के पर्यावरणीय व पारिस्थितिकीय मुद्दें

–        पर्यावरण दो शब्दों परि + आवरण से मिलकर बना है जिसमें जैविक व अजैविक घटक पाये जाते हैं।

–        Environment शब्द की उत्पत्ति फ्रेंच भाषा के Environner (घिरा हुआ) शब्द से हुई है।

 

पर्यावरणीय समस्याएँ:- पर्यावरण का अवनयन

–        मानव द्वारा अपने हितों की पूर्ति हेतु प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित, अंधाधुंध दोहन, कुप्रबन्धन के कारण उत्पन्न समस्याएँ पर्यावरणीय समस्याएँ कहलाती है।

वर्तमान में पर्यावरणीय समस्याओं के विभिन्न स्तर:-

1. स्थानीय स्तर:-

–        मृदा प्रदूषण (मृदा संबंधी समस्या)

–        जल जनित रोग (कुबड़ पट्टी)

–        वन्य जीवों की प्रजातियों का विलुप्त होना।

2. क्षेत्रीय स्तर की समस्या:-

–        बाढ़, सूखा, अकाल, चक्रवात, अम्लीय वर्षा, तेल का रिसाव

3. वैश्विक स्तर की समस्या:-

–        ओजोन छिद्र, ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरणीय प्रदूषण (वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण), जैव विविधता क्षरण

ओजोन छिद्र:-

–        ऑक्सीजन (O2) का विशेष रूप है – O3 (ओजोन)

–        यह हल्के नीले रंग की तीव्र गंध वाली गैस है जो समताप मण्डल में पायी जाती है।

–        पृथ्वी के चारों वायुमण्डल की पहली परत क्षोभमण्डल (ट्रोपोस्फीयर) कहा जाता है।

–        समताप मण्डल में एक हल्के नीले रंग की परत पायी जाती है जिसे ओजोन (O3) परत कहते हैं। इसकी औसत मोटाई 300 डॉबसन इकाई है।

–        यह ओजोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणें (UV) को पृथ्वी तक आने से रोकती है। इसलिए ओजोन परत को पृथ्वी का रक्षा कवच कहा जाता है।

–        ओजोन छिद्र – ओजोन परत की मोटाई में कमी।

–        ओजोन की औसत मोटाई 300 डॉबसन इकाई है यदि ओजोन परत में 220 डॉबसन इकाई में कमी आना। वह क्षेत्र ओजोन छिद्र की समस्या से प्रभावित है।

–        ओजोन छिद्र की प्रथम घटना का पता वर्ष 1985 में अण्टार्कटिका महाद्वीप पर जोसेफ फॉरमेन (ब्रिटिश अण्टार्कटिका टीम का नेतृत्व किया) नामक व्यक्ति ने की।

ओजोन छिद्र के उत्तरदायी कारण:-

–        CFC (क्लोरो फ्लोरो कार्बन) (व्यापारिक नाम – फ्रेऑन)

CFC का प्रयोग:-

–        शीतलक, (फ्रिज, AC)

–        जेट प्रणोदक (विमान)

–        फॉमिंग एजेण्ट (सौन्दर्य प्रसाधन)

फलूरीनेटेड गैसें:-

–        HFC (हाइड्रो फ्लोरो कार्बन)

–        PFC (पर फ्लोरो कार्बन)

–        SF6 (सल्फर हेक्सा फ्लोराइड)

नाइट्रोजन ऑक्साइड

ग्रीन हाउस गैसें:-

ओजोन छिद्र की समस्या से प्रभावित क्षेत्र:- कोटा

दुष्परिणाम:-

–        त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद रोग, प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर होना, सनबर्न, आनुवांशिक।

–        मृदा की नमी में कमी, प्राकृतिक वनस्पति का शुष्क होना।

–        फसल उत्पादन में कमी, बीजों की गुणवत्ता में कमी

–        जलवायु परिवर्तन

उपाय:-

–        CFC (क्लोरो फ्लोरो कार्बन) के उत्सर्जन में कमी आना।

–        CFC के स्थान पर अन्य पर्यावरण अनुकूल गैसों का प्रयोग।

–        वृक्षारोपण (ग्रीन कॉरिडोर)

–        ओजोन छिद्र की समस्या के समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ प्रयास किए गए हैं-

         वियना समझौता

         मांट्रियल सम्मेलन

         किगाली सम्मेलन

–        ओजोन संरक्षण दिवस 16 सितम्बर को मनाया जाता है क्योंकि 16 सितम्बर, 1987 को प्रथम ओजोन सम्मेलन हुआ था।

ग्लोबल वार्मिंग:-

–        इसे भूमण्डलीय तापन, वैश्विक तापन के नाम से जाना जाता है।

–        मानवीय क्रियाओं के कारण ग्रीन हाऊस गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन से पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि।

–        ग्लोबल वार्मिंग को जलवायु परिवर्तन की संज्ञा दी जाती है।

–        ग्रीन हाऊस इफेक्ट/हरित गृह प्रभाव

–        ग्लोबल वार्मिंग के लिए उत्तरदायी ग्रीन हाऊस गैसें:-

         CO2 (कार्बन डाइ ऑक्साइड) – 60 प्रतिशत

         CH4 (मीथेन) – 14-20 प्रतिशत

         नाइट्रस ऑक्साइड (NO2) – 6 प्रतिशत

         फ्लूरीनेटेड गैस

         CFC – 14 प्रतिशत

         जलवाष्प

–        ग्लोबल वार्मिंग से प्रभावित क्षेत्र – पश्चमी मरुस्थलीय प्रदेश

–        दुष्परिणाम – पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि

–        वर्षा में अनियमितता – सूखा, अकाल – कृषि एवं पशु उत्पाद में कमी, खाद्य सुरक्षा में कमी, जैव विविधता का विकास।

–        असमानता, अनिश्चितता – मरुस्थलीकरण, ग्लेशियर का पिघलना, समुद्री हीम/तटीय प्रदेशों का अस्तित्व खतरें में

ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के उपाय:-

–        गैर परम्परागत ऊर्जा संसाधन के उपयोग को प्रोत्साहन (परम्परागत ऊर्जा संसाधनों के उपयोग में कमी) (सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोमास, बायोगैस)

–        ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में कमी

–        गैर परम्परागत ऊर्जा संसाधनों से संचालित वाहनों को बढ़ावा देना।

–        वनों का विकास।

–        न्यून प्रदूषणकारी तकनीक का प्रयोग करना।

–        जन जागृति, पर्यावरण संरक्षण संबंधी नीतिगत संस्थागत प्रयास को बढ़ावा देना।

अम्लीय वर्षा:-

–        विभिन्न औद्योगिक इकाइयों से उत्सर्जित गैसों के वायुमण्डलीय अवयवों में मिलने से वर्षा जल का अम्लीय होना।

अम्लीय वर्षा के लिए उत्तरदायी यौगिक:-

         1. सल्फर डाई ऑक्साइड (SO2)  H2SO4 (सल्फ्यूरिक अम्ल)

         2. नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO2)  HNO3 (नाइट्रिक अम्ल)

अम्लीय वर्षा के कारण:-

–        ओटो मोबाइल्स, कोयला आधारित तापीय ऊर्जा संयंत्र से निकलने वाला धुआँ।

–        रिफाइनरी से निकलने वाली गैसें।

–        जीवाश्म ईंधन के जलने, स्वचालित वाहनों से निकला धुआँ।

–        औद्योगिक इकाइयों से उत्सर्जित गैसें।

राजस्थान में अम्लीय वर्षा से प्रभावित क्षेत्र:-

–        औद्योगिक इकाइयों के आस-पास वायु प्रदूषण से प्रभावित क्षेत्र।

दुष्परिणाम:-

–        मृदा की उर्वरा शक्ति में कमी।

–        कृषि उत्पाद में कमी।

–        मरुस्थलीकरण का विस्तार।

–        पेयजल भण्डार असुरक्षित (पेयजल संकट)।

–        जल जनित रोगों को बढ़ावा मिलेगा।

अम्लीय वर्षा को रोकने के उपाय:-

–        सल्फर डाइ ऑक्साइड तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी।

–        गैर परम्परागत ऊर्जा संसाधनों को प्रोत्साहन।

–        वाहनों की समय-समय पर जाँच।

–        वायु प्रदूषण को कम करना।

–        अम्लीयता की समस्या के समाधान हेतु रासायनिक उर्वरकों का उपयोग।

–        जन जागृति।

जल जनित रोग की समस्या:-

1. फ्लोरोसिस:-

–        जल में फ्लोराइड की अधिक मात्रा राजस्थान में फ्लोरोसिस की समस्या से प्रभावित क्षेत्र को कुबड़ पट्टी, बांका पट्टी, हाँच बेल्ट कहा गया।

–        नागौर से अजमेर के मध्य फ्लोराइड युक्त जल पट्टी।

–        R.O. प्लाण्ट लगाये।

–        स्वच्छ पेयजल आपूर्ति।

–        वाटर ट्रिटमेंट।

–        जल प्रदूषण को कम करना।

सेम की समस्या:- (जल प्लावन की समस्या)

–        भूमिगत जल रिसाव के कारण धरातल के ऊपरी परत का दलदली होना (जलाधिक्य की समस्या)।

–        भूमिगत लवण/क्षार धरातल पर आकर जमा होंगे।

–        मृदा में लवणीयता/क्षारीयता की समस्या।

–        मृदा की उर्वरा शक्ति में कमी।

–        कृषि उत्पाद में कमी।

–        मरुस्थलीकरण का विस्तार।

सेम की समस्या से प्रभावित क्षेत्र:-

–        नहरी क्षेत्र (इंदिरा गांधी नहर के आस-पास का क्षेत्र) द्वारा हनुमानगढ़ का बड़ापोल क्षेत्र सेम की समस्या से प्रभावित है।

–        अत्यधिक सिंचित क्षेत्र – बाड़मेर, जालोर में नर्मदा नहर के आस-पास का क्षेत्र

–        जिप्सम जमाव क्षेत्र

सेम की समस्या का समाधान:- वृक्षारोपण

–        इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में वृक्षारोपण हेतु वानर सेना का गठन किया गया है।

–        अरावली परियोजना का संचालन किया जा रहा है जिसका उद्देश्य वृक्षारोपण करना है।

–        क्षारीयता की समस्या का समाधान – जिप्सम का प्रयोग।

–        लवणीयता की समस्या का समाधान – रॉक फॉस्फेट को बढ़ावा देना।

–        अत्यधिक सिंचित क्षेत्र – शुष्क कृषि पद्धति को बढ़ावा देना।

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