राजस्थान में वन एवं प्राकृतिक वनस्पति

  • वनों का संरक्षण भारत में वैदिक संस्कृति से ही महत्वपूर्ण भाग रहा है।
  • मौर्यकाल में चंद्रगुप्त मौर्य ने वनों के संरक्षण हेतु एक अधिकारी की नियुक्ति की थी।
  • विश्नोई सम्प्रदाय के संस्थापक गुरू जम्भेश्वर जी के 29 नियमों में से एक नियम वृक्षों की रक्षा से संबंधित था।
  • ब्रिटिश काल में 1854 ई. में लॉर्ड डलहौजी ने वन विभाग की स्थापना की।
  • 1855 ई. में फोरेस्ट चार्टर जारी कर व्यर्थ भूमि व वन भूमि को सरकारी सम्पत्ति घोषित किया।
  • भारत की प्रथम राष्ट्रीय वन नीति 1894 ई. में जारी की गई।
  • स्वतंत्र भारत के बाद प्रथम राष्ट्रीय वन नीति 1952 ई. में बनाई गई।
  • राष्ट्रीय वन नीति 1952 के अनुसार देश के कम से कम 33% भू भाग पर वनों की आवश्यकता प्रतिपादित की गई।
  • राष्ट्रीय वन नीति 1952 के अनुसार किसी राज्य के कुल क्षेत्रफल के पहाड़ी क्षेत्र वन (65%) तथा मैदानी प्रदेश का 20-30% भाग पर वन होने चाहिए।
  • राजस्थान में 1949-50 में वन विभाग की स्थापना की गई।
  • राजस्थान भारत का प्रथम राज्य था जिसने ‘राजस्थान राज्य वन संरक्षण अधिनियम 1953’ राज्य में लागू किया।
  • राजस्थान में स्वतंत्रता से पूर्व वनों के विकास हेतु प्रथम योजना 1910 ई. जोधपुर रियासत ने बनाई थी।
  • 1935 ई. में प्रथम वन कानून अलवर रियासत में बनाया गया था।
  • 1976 ई. में 42 वे संविधान संशोधन द्वारा‘वन व वन्य जीव’ विषय को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची का विषय बना दिया गया।

राजस्थान राज्य वन संरक्षण अधिनियम 1953 के अनुसार प्रशासनिक आधार पर वनों को तीन प्रकारों में विभाजित किया गया।

  1. संरक्षित/रक्षित वन-

इस प्रकार के वनों में लकड़ी काटने तथा पशुचारण पर आंशिक प्रतिबंध होता है।

  1. आरक्षित वन-

इन वनों पर पूर्ण सरकारी नियंत्रण होता है इसमें लकड़ी काटने तथा पशुचारण आदि पर पूर्ण प्रतिबंध होता है।

  1. अवर्गीकृत वन-

ऐसे वन जिन पर सरकार का कोई नियंत्रण या प्रतिबंध नही होता है ऐसे वनों में लकड़ी काटने और पशुचारण की पूर्ण सुविधा होती है।

 

जलवायु के आधार पर राजस्थान में पाँच प्रकार के वन पाए जाते हैं-

  1. शुष्क मरुस्थलीय वन-

वर्षा- 20 सेमी से कम वर्षा वाले स्थानों पर पाए जाते हैं।

विस्तार – शुष्क रेतीला मैदान

जिले- जैसलमेर-बाड़मेर-पश्चिमीजोधपुर-बीकानेर-दक्षिणी     

गंगानगर-चुरू

वनस्पति- नागफनी (कैक्टस), थोर, आक, खजूर,केर, कुमट, बेर  अर्थात जीरोफाइट्स या मरुद‌्भिद वनस्पति पाई

जाती है।

  • बीकानेर में मरुस्थलीय वनस्पति हेतु मरुधरा जैविक उद्यान बनाया गया है।
  1. अर्द्धशुष्क मानसूनी पतझड़ वन-

वर्षा–  20-40 सेमी वर्षा वाले क्षेत्रों में ये वन पाए जाते हैं।

विस्तार – अरावली के पश्चिम में अर्द्वशुष्क जलवायु प्रदेश में

जिले  –जोधपुर-नागौर-पाली-जालोर-सीकर-झुंझुनूँ-हनुमानगढ़-  गंगानगर

वनस्पति –नीम, बबूल,पीपल, बरगद, खेजड़ी, रोहिड़ा,

मरूस्थलीय घास अर्थात स्टेपी तुल्य वनस्पति पाई जाती है।

नोट –राजस्थान की अर्थव्यवस्था में सर्वाधिक योगदान मानसूनी पतझड़ी वन का होता है।

  1. मिश्रित पतझड़ वन-

वर्षा- 50-80 सेमी वर्षा वाले स्थानों पर ये वन पाए जाते हैं।

विस्तार-पश्चिमी राजस्थान के अलावा सम्पूर्ण राजस्थान में

वनस्पति- धौक/धोकडा़, हरड़

राजस्थान में सर्वाधिक धोकड़ा वन पाए जाते हैं।

  1.  शुष्क सागवान वन-

वर्षा- 75-100 सेमी वर्षा वाले क्षेत्रों में ये वन पाए जाते हैं।

विस्तार- दक्षिण एवं दक्षिण पूर्वी राजस्थान में

जिले- बांसवाडा़-डूंगरपुर-उदयपुर-प्रतापगढ़-राजसमंद-चित्तौड़-

कोटा-बूंदी

वनस्पति – सागवान, खैर,साल, पलाश, तेंदु

विशेषता- सर्वाधिक सागवान दक्षिणी राजस्थान बांसवाड़ा तथा  प्रतापगढ़ में पाया जाता है।

  1.  उपोष्ण सहाबहार वन –

वर्षा-100-150 सेमी या अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

विस्तार – माउन्ट आबू, झालावाड़, कोटा, बाराँ, उदयपुर, बाँसवाडा़, डूँगरपुर

वनस्पति – बाँस, सिनकोना, रोजवुड, आयरन वुड

विशेषता – राजस्थान में सबसे कम ये वन पाए जाते हैं तथा राजस्थान की GDP में सबसे कम योगदान इनका होता है अत: ये वन आर्थिक दृष्टि से उपयोगी नहीं होते हैं।

राजस्थान में पाई जाने वाली प्रमुख घास-

  1. सेवण/लीलोण-

रेगिस्तानी क्षेत्रों (विशेषकर जैसलमेर) में पाई जाने वाली सेवण घास को स्थानीय भाषा में ‘लीलोण’ कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम-‘लसियुरस सिडीकुस’ है।

सेवण घास प्रोटीन युक्त पौष्टिक घास है।

सेवण घास में ही राजस्थान का राज्य पक्षी गोडावण अण्डे देता है इसलिए इस घास को गोडावण पक्षी की प्रजनन स्थली भी कहते हैं।

  1. सुगणी घास-

जैसलमेर में पाई जाने वाली घास जिसका उपयोग दवाएँ और साबुन बनाने में होता है।

  1. बूर और मोतियाँ-

दोनों सुगन्धित घास हैं जो पश्चिमी राजस्थान में पाई जाती है। बूर घास विशेषकर बीकानेर के कोलायत, देशनोक, नोखा एवं सरदारशहर के आस पास मिलती है।

  1. ओलेवरी घास-

जोधपुर के ओसियाँ में प्रमुखता से मिलती है इसे लेमन घास भी कहते हैं।

  1. धामण, करड़, अंजन-

यह तीनों मरुस्थलीय घास हैं जिसमें करड़ और अंजन गायों और घोड़ो के लिए उपयुक्त हरी घास है।

  1. खस और पामरोजा-

ये दोनों सुगन्धित घास हैं जिनका उपयोग शरबत व इत्र बनाने में किया जाता है।

ये घास भरतपुर, टोंक, सवाईमाधोपुर जिलों में उत्पन्न होती है।

Note :-

  1. बीड़-राजस्थान में घास के मैदान या चारागाहों को स्थानीय भाषा में बीड़ कहा जाता है।
  2. राजस्थान में सर्वाधिक धोकडा़ वन पाए जाते हैं।

वैज्ञानिक नाम-एनोजिस पण्डुला

राजस्थान की प्रमुख प्राकृतिक वनस्पति-

  1. खैर

वानस्पतिक नाम- अकेशिया केपू/अकेशिया कटेचू

उपयोग- खैर वृक्ष की छाल व लकड़ी के टुकड़ो से कत्था बनाया जाता है।

विशेषता-कथौड़ी जनजाति हाण्डी पद्वति द्वारा कत्था बनाती है। यह वृक्ष मुख्यत: उदयपुर, चित्तौड़, बूंदी, झालावाड़ आदि में पाया जाता है।

  1. पलाश/ढाक-
  • वानस्पतिक नाम- ब्यूटिया मोनोस्पर्मा
  • विशेषता- अपने सुर्ख लाल व पीले रंग के कारण पलाश के फूलों को ‘जंगल की ज्वाला’ कहा जाता है।
  • पलाश के वृक्ष मुख्यत:राजसमंद में पाए जाते हैं।
  1. तेंदू-
  • वानस्पतिक नाम- डिसोपाइरस मेलेनोजाइलोन
  • स्थानीय नाम – टिमरू
  • उपयोग- तेंदू को ‘वागड़ का चीकू’ भी कहते हैं। तेंदू के पत्ते का प्रयोग बीड़ी बनाने में किया जाता हैं।
  • तेंदू के सर्वाधिक वृक्ष मध्यप्रदेश में पाए जाते हैं।
  • राजस्थान में तेंदू सर्वाधिक-उदयपुर, चित्तौड़, कोटा में पाया जाता है।
  • बीड़ी उद्योग सर्वाधिक अजमेर, ब्यावर, भीलवाड़ा में हैं।

विशेषता – 1974 में तेंदू के वृक्ष का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था।

  1. महुआ-
  • वानस्पतिक नाम- मधुका लोंगोफोलिया
  • महुआ को आदिवासियों का कल्पवृक्ष भी कहा जाता है।
  • राजस्थान में आदिवासी जनजातियाँ महुआ का प्रयोग टोटम प्रथा में करती हैं।
  • महुआ के पुष्प से देशी शराब बनाई जाती है जिसे ‘मोकड़ी’ कहते हैं।

  • महुआ मुख्यत: उदयपुर, डूंगरपुर, सिरोही क्षेत्रों में पाया जाता हैं।
  1. खेजड़ी-

    अन्य नाम     – राजस्थान का गौरव, थार का कल्प वृक्ष

    वैज्ञानिक नाम  –  प्रोसेसिप सिनरेरिया

    साहित्यिक नाम – सीमलो

    पौराणिक नाम  – शमी वृक्ष

    स्थानीय नाम    – जान्टी 

    सिंधी में           – छोंकडा़

    कन्नड़ में         – बन्नी

    तमिल में          – पेयमये

  • खेजडी की फली कोखेजड़ी की फली को ‘सांगरी’, पत्तियों को ‘लूंग’ तथा खेजड़ी के फूल को ‘मींझर’ कहते हैं।
  • विजयदशमी/दशहरे के दिन शमी का पूजन किया जाता है।
  • 31 अक्टूबर, 1983 को खेजड़ी को राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया गया।
  • मरुस्थलीकरण को रोकने हेतु 1991 में 'ऑपरेशन खेजड़ा' चलाया गया।
  • 12 सितम्बर, 1978 से प्रतिवर्ष खेजड़ली दिवस मनाया जाता है।
  • भाद्रपक्ष शुक्ल दशमी को खेजड़ली गाँव जोधपुर में विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला भरता है।
  1. रोहिडा़-
  • अन्य नाम –राजस्थान का सागवान, राजस्थान की मरुशोभा, मारवाड़ टीक
  • वैज्ञानिक नाम- टिकोमेला अण्डूलेटा
  • 31 अक्टूबर, 1983 को रोहिड़ा को राज्य पुष्प घोषित किया गया।
  • रोहिड़ा से बन्दूक की बट बनाई जाती है।
  1. बाँस-
  • अन्य नाम-आदिवासियों का हरा सोना
  • वानस्पतिक नाम- बेम्बूसा वल्गेरिस
  • मुख्यत: बाँसवाडा़, उदयपुर, कोटा में पाया जाता है।
  1. चंदन वन-
  • वानस्पतिक नाम- ‘सेन्टालम एल्बम’
  • राजस्थान में राजसमंद जिले के हल्दीघाटी (खमनौर) व सिरोही के देलवाड़ा क्षेत्र में चंदन के वन पाए जाते हैं।
  1. गोंद-
  • राजस्थान के पश्चिमवर्ती भागों मुख्यत: बाड़मेर के चौहट्टन का गोंद बहुत प्रसिद्व है।
  • इस क्षेत्र में गोंद उतारने  का कार्य मेघवाल व मुसलमान जाति के लोग ज्यादा करते हैं।
  1. आँवल झाडी़-

आँवल झाड़ी की छाल चमड़ा साफ करने (टेनिंग) में प्रयुक्त होती है।

 

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