ग्रंथियाँ व हॉर्मोन्स

    ग्रंथियाँ (Glands) :-

  • कोशिकाओं का वह समूह जो तरल पदार्थों का स्त्राव करें, उसे ग्रंथियाँ कहा जाता है।
  • मानव में ग्रंथियाँ तीन प्रकार की होती हैं-

         1. अन्त: स्त्रावी

         2. बहि: स्त्रावी

         3. मिश्रित

1.    अन्त: स्त्रावी :- कोशिकाओं का वह समूह जो तरल पदार्थों के रूप में हॉर्मोन्स का स्त्राव करे, अन्त:स्त्रावी ग्रंथियाँ कहलाती है।

  • इन ग्रंथियों में नलिकाकार संरचनाएँ नहीं पाई जाती इसलिए इन्हें नलिका विहीन ग्रंथियाँ कहा जाता है।
  • अन्त: स्त्रावी ग्रंथियाँ तंत्रिका तंत्र के साथ मिलकर शरीर का नियमन तथा नियंत्रण करती है, जिसे न्यूरो एण्डो क्राइनोलॉजी कहा जाता है।
  • अन्त: स्त्रावी विज्ञान का जनक थॉमस एडीसन को कहा जाता है।
  • मानव में इनकी संख्या 9 होती हैं।

 हॉर्मोन्स :-

  • हॉर्मोन्स शब्द 'हार्मोइन' से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ उत्तेजित करने वाला होता है।
  • स्टारलिंग ने हॉर्मोन्स शब्द दिया था।
  • सिक्रेटीन हॉर्मोन्स सर्वप्रथम खोजा गया हॉर्मोन्स है, जिसकी खोज स्टारलिंग तथा बैलिस ने छोटी आँत के ड्यूडीनम की दीवारों से S-cells से स्त्रावित होने वाले हॉर्मोन्स के रूप में की।

Note :-

(i) हॉर्मोन्स ऊर्जा तो नहीं देते हैं लेकिन उपापचयी क्रियाओं में ऊर्जाउत्पादन को प्रभावित कर शारीरिक वृद्धि एवं विकास का नियमन करते हैं।

(ii) हॉर्मोन्स कम मात्रा में स्त्रावित होते हैं।

(iii) प्रो हॉर्मोन्स निष्क्रिय अवस्था में स्त्रावित हॉर्मोन्स होते हैं जैसेप्रो इंसुलिन

(iv) हॉर्मोन्स अपना कार्य करने के बाद यकृत में नष्ट होते जाते हैं।

(v) हॉर्मोनों का लक्षित अंग दूर होता है

हॉर्मोन्स रासायनिक संदेशवाहक होते हैं, रासायनिक संघटन के आधार पर 3 प्रकार के होते हैं।

  • अमीनो अम्ल व्युत्पन्न
  • पेप्टाइड हॉर्मोन्स
  • स्टेरॉयड हॉर्मोन्स

अमीनो अम्ल व्युत्पन्न

  • एमीन हॉर्मोन्स है।
  • ये अमीनो अम्ल से बने होते हैं। जैसेएपिनेफ्रीन, नॉर एपिनेफ्रीन, थायरॉक्सिन, मिलेटोनिन, सिरेटोनिन आदि।

पेप्टाइड हॉर्मोन्स –

  •  3-200 AA मिलकर पेप्टाइड हॉर्मोन्स का निर्माण करते हैं। जैसेऑक्सीटोसिन, ADH, TSH, STH, FSH, LH आदि।

स्टेरॉयड हॉर्मोन्स –

  • ये स्टीरॉयड्स (व्युप्पन्न वसा) से निर्मित। जैसेटेस्टीस्टीरोन, कार्टिसोल, प्रोजेस्टेरॉन, एस्ट्रोजन, कार्टिकोस्टीरोन।

 

पीयूष ग्रंथि :-

 

  • पीयूष ग्रंथि मस्तिष्क के अग्र भाग में स्फेनॅाइड   हड्डी के सेला टर्सिका नामक गुहा में पाई जाती है।
  • पीयूष ग्रंथि हाइपोथैलेमस से इन्फडी बुलम द्वारा जुड़ी रहती है।
  • पीयूष ग्रंथि मानव की सबसे छोटी अन्त:स्त्रावी ग्रंथि है।
  • इनका भार 0.3-0.4 ग्राम होता है।
  • इनका आकार मटर के दाने जैसा होता है।

   पीयूष ग्रंथि से निकलने वाले हॉर्मोन्स :-

1.    GH (Growth Harmon)/वृद्धि हॉर्मोन्स/ सोमेटोट्रॉफिक हॉर्मोन्स :-

  • यह शरीर की शारीरिक वृद्धि करता है।
  • बाल्यावस्था में इस हॉर्मोन्स की कमी से बौनापन (ड्रोफेनिज्म) रोग होता है।
  • बाल्यावस्था में इस हॉर्मोन्स की अधिकता से भीमकाय (जाइगेटिज्म) रोग होता है।

एक्रोमिगेली – वयस्क अवस्था में इस हॉर्मोन्स की अधिकता से शरीर के किसी विशेष अंग की वृद्धि ज्यादा हो जाती है, जिसे एक्रोमिगेली कहा जाता है।

2.    LH (ल्युटिनाइजिंग हॉर्मोन्स) :-

  • यह हॉर्मोन्स महिलाओं में अण्डोत्सर्ग करवाता है।
  • पुरुषों में यह हॉर्मोन्स शुक्रजनन को प्रेरित करता है। (र्स्पमेटोजिनेसिस)

3.    ACTH (एडिनोकार्टिको ट्रोपिक हॉर्मोन्स) :-

  • यह एड्रीनल ग्रंथि पर कार्य करता है।

4.    TSH (थायरॉइड स्टेमुलेटिंग हॉर्मोन्स) :-

  • यह थायरॉइड ग्रंथि से थायरॉक्सिन के स्त्रावण को प्रेरित करता है।

5.    FSH (फोलिकल स्टेमुलेटिंग हॉर्मोन्स) :-

  • यह महिलाओं में अण्डजनन (ऊजिनेसिस) को प्रेरित करता है।
  • यह महिलाओं में MC को नियंत्रित करता है।
  • पुरुषों में यह शुक्रजनन को प्रेरित करता है।
  • FSH तथा LH हॉर्मोन्स संयुक्त रूप से गोनेडोट्रोपिक हॉर्मोन्स कहलाता है।

6.    MSH (मेलेनोसाइट स्टेमुलेटिंग हॉर्मोन्स) :-

  • यह मिलेनोसाइट (मिलेनोएमार्फस) को मिलेनिन में बदलता है जिससे त्वचा का रंग गहरा होता है।

7.    प्रोलेक्टिन/मिल्क हॉर्मोन्स :-

  • यह दुग्ध ग्रंथियों में दुग्ध निर्माण को प्रेरित करता है।

8.    ऑक्सीटोसिन/पिटोसिन/ Love Harmon/ प्रसव पीड़ा/जन्म सहायक हॉर्मोन्स/ Birth Harmon/ दुग्ध हॉर्मोन्स :-

  • यह हॉर्मोन्स गर्भवती महिला में पाया जाता है।
  • यह हॉर्मोन्स गर्भाशय योनि में अनिश्चित संकुचन पैदा करता है, जिससे गर्भाशय तथा योनि का आकार बढ़ जाता है।
  • यह हॉर्मोन्स प्रसव के समय पीड़ा उत्पन्न करता है।
  • यह दुग्ध ग्रंथियों में दुग्ध निर्माण को प्रेरित करता है।
  • वर्तमान में ऑक्सीटोसिन  प्रोलेक्टिन के टीके गाय भैंसों को दिए जाते हैं, जिससे इनकी दुग्ध उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है।

9.   ADH (एन्टीडाई यूरेटिक हॉर्मोन्स) (वेसोप्रोसिन) :-

  • यह शरीर में जल लवण का संतुलन बनाता है।
  • यह शरीर में जल की हानि को कम करता है।
  • मरुस्थलीय जीवों में इस हॉर्मोन्स की अधिकता होती है जैसे – ऊँट, कंगारू, चूहा अपने जीवन में कभी पानी नहीं पीता।
  • लम्बे समय से चाय, कॉफी एल्कोहॉल के सेवन से इस हॉर्मोन्स की कमी हो जाती है, जिससे मूत्र निष्कासन की दर 10-15 गुणा बढ़ जाती है, जिसे डाइबिटीज इन्सीपिडस रोग कहा जाता है तथा इस लक्षण को बहुमूत्रता (बार-बार मूत्र आना) कहा जाता है।
  1. पिनियल ग्रंथि :-

 

  • यह मस्तिष्क का भाग है।
  • यह मस्तिष्क के अग्र भाग में पाई जाती है।
  • यह डाईसेफेलॉन के पृष्ठ भाग में पाई जाती है।

अन्य नाम – जैविक घड़ी, तीसरी आँख (मेंढ़क), मस्तिष्क की रैती, एसिबुलाई।

    कार्य :-

  • नींद, मूड रंग का निर्धारण करती है।
  • रंग निर्धारण हेतु यह मिलेटोनिन हॉर्मोन्स का स्त्रावण करती है।
  • मिलेटोनिन MSH के विपरीत कार्य करता है।
  • मिलेटोनिन, मिलेनिन को मिलेनोसाइट में बदलता है, जिससे त्वचा का रंग हल्का होता है।
  • यह उभयचर रेपटाइल्स में रंग परिवर्तन में सहायता करता है। (रंग बदलते की प्रक्रिया मेटोक्रोसिस कहलाती है।)
  • यह ग्रंथि लैंगिक परिपक्वता में देरी लाती है।
  • चूहे की बाल्यावस्था में यदि पिनियल ग्रंथि को निकाल दिया जाए तो उसमें लैंगिक परिपक्वता जल्दी जाती है।
  • जन्म से अंधे बच्चों में प्रकाश के प्रति कम संवेदनशीलता होती है, जिससे उनमें लैंगिक परिपक्तवता जल्दी जाती है।
  • एकमात्र ऐसी ग्रंथि जो प्रकाश के द्वारा प्रभावित होती है।
  • यह दैनिक प्रक्रियाओं का नियमन करती है, इसलिए इसे जैविक घड़ी कहा जाता है।
  • 7-8 वर्ष की उम्र में यह नष्ट होना आरम्भ हो जाती है तथा 14 वर्ष में यह पूर्ण रूप से नष्ट हो जाती है, नष्ट होने के पश्चात् यह CaCO3 व CaPO4 के रूप में जम जाती है इसलिए इसे ‘मस्तिष्क की रैती’ कहा जाता है।
  1. थायरॉइड ग्रंथि :-

 

  • यह मानव शरीर की सबसे बड़ी अन्त:स्त्रावी ग्रंथि है।
  • स्थिति – गले में श्वास नली के मध्य।
  • महिलाओं में इसका आकार पुरुषों की तुलना में बड़ा होता है।
  • भार – 25-30 ग्राम

NOTE :- एकमात्र ऐसी अन्त:स्त्रावी ग्रंथि जिसके सभी हॉर्मोन्स निष्क्रिय अवस्था में पाए जाते हैं।

थायरॉइड ग्रंथि से निकलने वाले हॉर्मोन्स –

1.   थायरॉक्सिन :-

  • थायरॉक्सिन का निर्माण दो रासायनिक पदार्थों से होता है।
      • T4 – टेट्रा आयाेडो थाइरोनिन
      • T3 – टाई आयोडो थाइरोनिन
  • थायरॉक्सिन के संश्लेषण में आयोडीन की आवश्यकता होती है इसलिए इसे आयोडीन युक्त हॉर्मोन्स कहा जाता है।
  • शरीर में आयोडीन की कमी होने पर थायरॉइड ग्रंथि अपने आकार को बढ़ा लेती है।
  • रक्त से अधिक मात्रा में आयोडीन के अवशोषण हेतु थायरॉइड ग्रंथि फूल जाती है, जिसे गलगण्ड/घेंघा/गॉइटर रोग कहा जाता है।
  • पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों में घेंघा रोग सर्वाधिक होता है ,जिसे एन्डेमिक घेंघा कहा जाता है।
  • समुद्री भोजन करने वाले लोगों में यह रोग कभी नहीं होता है।
  • प्रतिदिन थायरॉक्सिन के संश्लेषण हेतु 120 mgm. आयोडीन की आवश्यकता होती है।
  • 100 ml रक्त में 0.3 gm आयोडीन होता है।

  थायरॉक्सिन के कार्य :-

  • यह शरीर की शारीरिक, मानसिक जननिक वृद्धि करता है।
  • यह उभयचर में कायान्तरण करता है।
  • कायान्तरण :- लार्वा अवस्था को वयस्क में रूपान्तरण करने की प्रक्रिया कायान्तरण कहलाती है। जैसे – मेंढ़क के लार्वा (टेडपोल) के वयस्क में रूपांतरण।
  • महिला के MC का नियंत्रण करता है।

NOTE :- जिन महिलाओं में इस हॉर्मोन्स की कमी हो जाती है वह बांझ कहलाती है।

  • यह BMR (Basal metabolic rate) का नियंत्रण करता है।
  • BMR (Basal metabolic rate) :- शरीर में ऊर्जा निर्माण की दर BMR कहलाती है।
  • BMR α \(\frac{1}{Weight}\)
  • BMR भार पर निर्भर करता है।
  • BMR बढ़ने पर तापमान में वृद्धि हो जाती है, जिससे भार में कमी जाती है।
  • BMR ¯ ® तापमान ¯ ® भार ­
  • हृदय – थाइरॉक्सिन ­ – हृदय गति बढ़ जाती है।
  • पाचन – थाइरॉक्सिन ­ – पाचन की क्रियाशीलता ­
        • [डायरिया (दस्त) लगेगी, भूख बढ़ेगी]
  • तंत्रिका – तंत्रिका कोशिका में उपस्थित माइलीन सीट के निर्माण में सहायक।
  • रक्त – RBC के निर्माण में प्रेरित
  • थाइरॉक्सिन ­ – माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या ­ – श्वसन की क्रिया ­ – भार की कमी
  • कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन के उपापचय का नियंत्रण करता है।

   थायरॉक्सिन की कमी से होने वाले रोग :-

जड़वामनता (क्रेटेनिज्म) :-

  • बच्चों में थायरॉक्सिन की कमी से यह रोग होता है। 
  • इस रोग में बच्चे का शारीरिक, मानसिक जननिक विकास नहीं हो पाता है। 
  • इस रोग के लक्षण :-

         1. मंद बुद्धि

         2. पेट बाहर निकला होना

         3. सिर बड़ा

         4. बौनापन

         5. जननांगों का अर्द्धविकसित होना

B.    मिक्सिडीमा रोग :- वयस्क में थायरॉइड  की कमी से ऐसे रोगियों में वसा का अधिक जमाव हो जाता है इस कारण मोटे हो जाते हैं, वजन बढ़ जाता है तथा ठंड के प्रतिसंवेदनशील होते हैं।

C.    हाशिमोटा :- थायरॉइड के उपचार में दी जाने वाली औषधियों के खिलाफ प्रतिरक्षा तंत्र (एंटी विष) का निर्माण कर लेता है, जिससे थायरॉइड ग्रंथि नष्ट हो जाती है।

    थायरॉक्सिन की अधिकता से होने वाले रोग:-

A.    ग्रेव रोग :- इस रोग में नेत्र गोलक के नीचे श्लेष्मा का जमाव हो जाता है, जिससे नेत्र गोलक बड़े हो जाते हैं तथा ऐसे व्यक्तियों की दृष्टि डरावनी/घूरती हुई होती है।

B.    थायरॉक्सिन के अधिक स्त्राव के कारण थायरॉइड  ग्रंथि में जगह-जगह गांठें बन जाती है। ऐसे रोगियों में BMR अधिक होती है।

2.    कैल्शिटोनिन/थाइरोकैल्सिटोनिन :-

  • यह हॉर्मोन्स रक्त में Ca+2 की मात्रा को कम करता है।
  • यह हॉर्मोन्स PTH के विपरीत कार्य करता है।
  • यह हॉर्मोन्स Vitamin-D के विपरीत कार्य करता है।
  • कैल्सिटोनिन हॉर्मोन्स की कमी से हाइपर कैल्शिमिया तथा अधिकता से हाइपो कैल्शिमिया रोग होता है।
  • पैराथायरॉइड ग्रंथि :-
  • खोज – रेनार्ड              
  • विस्तृत अध्ययन – सेन्ट्रॉल
  • संख्या – 4 (कई बार – 6)
  • स्थिति – थायरॉइड ग्रंथि के पृष्ठ भाग में
  • भार – 150 mgm
  • हॉर्मोन्स – PTH (पैराथायरॉइड हॉर्मोन्स)/ पैराथार्मोन्स/ कोलिप हॉर्मोन्स (सबसे पहले पृथक करने वाले कोलिप थे।)

    कार्य :

  • ये रक्त में Ca+2 का अवशोषण बढ़ा देता है तथा फॉस्फेट का अवशोषण बढ़ा देता है।
  • यह कैल्शिटोनिन के विपरीत कार्य करता है।
  • एक स्वस्थ व्यक्ति में 1 किग्रा कैल्शियम पाया जाता है।
  • 100 ml Blood = 12 mgm Ca+ होता है।

    PTH की कमी से होने वाले रोग :-

टिटेनी रोग :-

 इस रोग में माँसपेशियों का स्वत: ही संकुचन तथा शिथिलन होता है, जिससे कई बार मांसपेशियों में ऐंठन जाता है।

  • यदि Ca+2 की कमी डायफ्राम पेशियाँ तथा अन्तरा पर्शुक पेशियाँ में हो जाए तो श्वसन की क्रिया रूक जाएगी, जिससे तुरन्त मृत्यु हो जाएगी।
  • PTH की अधिकता से Ca++ की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे हड्डियाँ भंगुर तथा कोमल हो जाती हैं, जिसे ऑस्टियोपोरोसिस रोग कहा जाता है।
    थाइमस ग्रंथि :-

 

  • यह ग्रंथि वक्ष गुहा में पाई जाती है।
  • बाल्यावस्था में थाइमस ग्रंथि अत्यधिक सक्रिय होती है तथा उम्र बढ़ने के साथ थाइमस ग्रंथि का आकार छोटा एवं धीरे-धीरे निष्क्रिय हो जाती है।
  • थाइमस ग्रंथि द्वारा स्त्रावित थाइमोसिन हॉर्मोन्स शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र का विकास करता है।

NOTE :- एड्स रोग में T-helper कोशिकाओं की संख्या में कमी जाती है।

एड्रीनल ग्रंथि :-

  • एड्रीनल ग्रंथि किडनी(Kideny) के ऊपर स्थित होती है।
  • इनकी संख्या 2 होती हैं।
  • एड्रीनल ग्रंथि के 2 भाग होते हैं-

         1. कॉर्टेक्स भाग

         2. मेडूला भाग

1.    कॉर्टेक्स भाग :-

  • यह एड्रीनल ग्रंथि का 80-90% भाग हैं।
  • कॉर्टेक्स भाग से निकलने वाले हॉर्मोन्स :-

A.    ग्लुकोकार्डियस :- कार्टिसॉल

  • इसे जीवन रक्षक हॉर्मोन्स कहा जाता है।
  • यह ग्लूकोज के उपापचय का नियंत्रण करता है।
  • ये ग्लूकोज प्रोटीन वसा के नियंत्रण का कार्य करता है।
  • वर्तमान में कार्टिसॉल का उपयोग अंग प्रत्यारोपण तथा गठिया रोग में किया जाता है।

B.    मिनरलोकार्डियस :- एल्डोस्ट्रिरॉन

  • यह सोडियम तथा पोटेशियम आयनों का नियंत्रण करता है।
  • यह सोडियम का अवशोषण बढ़ाता है तथा पोटेशियम का उत्सर्जन बढ़ाता है।
  • यदि एड्रीनल ग्रंथि के कॉर्टेक्स भाग को हटा दिया जाए तो व्यक्ति की तुरंत मृत्यु हो जाती है क्योंकि सोडियम (Na+) का पूरा उत्सर्जन हो जाता है।

C.    Sex Harmon :-

नर-एन्ड्रोजन

महिला-एस्ट्रोजन

  • यह हॉर्मोन्स जन्म हॉर्मोनों के विपरीत कार्य करता है।
  • यह हॉर्मोन्स यौन व्यवहार को प्रेरित करता है।

विरलिज्म :- महिलाओं में पुरुषों के लक्षण जाते हैं जिससे महिलाओं का मासिक धर्म बंद हो जाता है।

गायनेकोमेस्ट्रीज्म :- पुरुषों में महिलाओं के लक्षण जाते हैं।

  • जैसे – आवाज पतली होना।
  • स्तनों का विकास होना।
  • कमर के नीचे वाला भाग चौड़ा होना।

मेक्रोजाइनेटोसोमिया : जब पुरुषों में एन्ड्रोजन हॉर्मोन्स की अधिकता हो जाए तो शिशन की लम्बाई बढ़ जाती है।

  1. मेडूला भाग :-
  • एड्रीनल ग्रंथि का यह भाग 10-20% होता है।

    मेडूला भाग – 1. एपिनेफ्रीन à एड्रीनलिन

नॉर एपिनेफ्रीन à नॉर एड्रीनलिन

  • इन हॉर्मोनों को संकटकालीन हॉर्मोन्स कहा जाता है।
  • इन हॉर्मोनों के प्रभाव में रक्त का हृदय धड़कन, श्वसन दर बढ़ जाती हैं।
  • इन हॉर्मोनों के प्रभाव में पुतलियों का आकार बढ़ जाता है तथा रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
  • मेडूला से स्त्रावित हॉर्मोन्स संकट से बचाते हैं।

एड्रीनल ग्रंथि के अन्य नाम –

  • संकटकालीन ग्रंथि
  • 3F ग्रंथि : Fear, First, Flight
  • 4S ग्रंथि : Sugar, Salt, Storid/stoty, Sex

 एड्रीनल हॉर्मोन्स की कमी से होने वाला रोग :-

  1. एडीसन रोग :-
  • इस रोग में कार्टिसॉल की कमी हो जाती है।
  • निर्जलीकरण (जल की कमी)
  • रक्त दाब, BMR तथा ताप कम हो जाता है।

 एड्रीनल हॉर्मोन्स की अधिकता से होने वाला रोग:-

  1. कुशिग रोग :-
  • इस रोग में शरीर चौड़ा हो जाता है।
  • इस रोग में वसा की मात्रा बढ़ जाती है।
  • शरीर में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है।
  • सोडियम तथा जल की मात्रा बढ़ जाती है।
  • इस रोग से Blood Presser बढ़ जाता है।
  1. कॉन्स रोग :- इस रोग में मिनरलोकॉर्डियस की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे सोडियम पोटेशियम के आयनों की गड़बड़ी हो जाती है, जिससे तंत्रिका कोशिका प्रभावित होती है।
  2. अग्न्याशय ग्रंथि :-

 

  • यह एक मिश्रित ग्रंथि है।
  • यह अन्त:स्त्रावी बहिस्त्रावी दोनों की तरह कार्य करती है।
  • अग्न्याशय ग्रथि के अन्त: भाग में लैंगर हैन्स द्वीपिकाएँ पाई जाती हैं।
  • लैंगर हैन्स द्वीपिकाओं में तीन प्रकार की कोशिकाएँ पाई जाती हैं।

         i. α-cell

         ii. β-cell

         iii. ∂-cell                                                          

  1. α-कोशिका :-
  • यह ग्लूकागोन का स्त्रावण करती है।
     यह ग्लाइकोजन को ग्लूकोज में बदलने का कार्य करती है।
  • ग्लूकागॉन रक्त में ग्लूकोज का स्त्रावण बढ़ाता है।

ii.    β-कोशिका :-

         β-कोशिकाएँ इन्सुलिन का स्त्रावण करती है, इन्सुलिन ग्लूकोज को ग्लाइकोजन में बदलता है। अर्थात् रक्त में शर्करा की मात्रा को कम करता है।

    इन्सुलिन :-

  • इन्सुलिन को सर्वप्रथम शुद्ध रूप में बेंटिग बेस्ट ने प्राप्त किया।
  • इन्सुलिन के आण्विक संरचना की खोज सेगर ने की थी इसलिए सेगर को जीव विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार दिया गया।
  • इन्सुलिन की प्रथम प्रोटीन, जिसके रवे बनाये गए तथा प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से तैयार किया गया।
  • इन्सुलिन में पेप्टाइड श्रृंखलाएँ  पाई जाती है।
  • यह पेप्टाइड श्रृंखलाएँ आपस में डाई सल्फाइड बंधों द्वारा जुड़ी रहती है।

इन्सुलिन की कमी –

         इन्सुलिन की कमी होने पर रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ जाएगी, जिससे व्यक्ति को बार-बार मूत्र का त्याग करना पड़ेगा, जिससे व्यक्ति को प्यास अधिक मात्रा में लगेगी, जिससे पॉलीडिप्सिया अवस्था जाएगी, जिससे व्यक्ति को डायबिटीज मेलाइटस रोग हो जाता है।

इन्सुलिन की अधिकता-

इन्सुलिन की अधिकता होने पर रक्त में शर्करा की मात्रा कम हो जाती है, जिससे हाइपोग्लाइसिनिया अवस्था जाती है।

डेल्टाकोशिका (Δ -Cell)-

यह सोमेटोस्टेनिन का स्त्रावण करती है।

यह सोमेटोस्टेनिन वृद्धि हॉर्मोन्स को संदमित करता है।

8.    अण्डाशय

 

गर्भाशय के ऊपर तीन झिल्लियाँ पाई जाती हैं-

            (i)   पेरीमेट्रियम (बाह्य)

            (ii) मायोमेट्रियम (मध्यम)

            (iii) एण्डोमेट्रियम (आंतरिक)

फैलोपियन नलिका (अण्डवाहिनी नलिका) – इस नलिका में निषेचन की प्रक्रियाँ होती है।

निषेचन:- शुक्राणुओं अण्डाणुओं के संलयन की प्रक्रियाँ।

महिलाओें के हॉर्मोन्स:- ग्रेफियन फोलिकल के थीका इन्टना से एस्ट्रोजन हॉर्मोन्स निकलता है।

1.    एस्ट्रोजन:- ये स्टेरॉइड हॉर्मोन्स

कार्य:-

(i) महिलाओं के द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का विकास

(A) स्तनों का विकास

(B) आवाज का पतला होना।

(C) महिलाओं के द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का विकास

(D) जननांगों का विकास।

(ii) कंकाल पेशियों का निर्माण करना।

(iii) ये जंतुओं में लैंगिक जननांगों में परिवर्तन करता है अर्थात् मादा को नर की ओर आकर्षित करता है।

मिनापॉज अवस्था में एस्ट्रोजन हॉर्मोन्स की कमी हो जाती है, जिससे हडि्डयों में छेद होना प्रारम्भ हो जाता है। इसे ऑस्टियोपोरोसिस रोग कहा जाता है।

उपचार:- H.R.T (Hormon Replacement Theory)

2.  प्रोजेस्ट्रॉन हॉर्मोन्स :-कार्पस ल्यूटियम से स्त्रावित

कार्य:-

(i)   ये दुग्ध ग्रंथियों में दुग्ध का निर्माण को प्रेरित करता है।

(ii)  ये प्रेग्नेंसी को बनाए रखता है, इसलिए इसे प्रेग्नेंसी हॉर्मोन्स कहते हैं।

(iii) ये गर्भाशय पेशियों में संकुचन कम करता है, इसलिए इसे एंटी एबर्सन हॉर्मोन्स कहा जाता है।

(iv) ये M.C. का नियंत्रण करता है।

3.  रिलेक्सिंन हॉर्मोन्स :-

यह गर्भाशय में संकुचन को पैदा करता है।

अपरा (प्लेसेंटा)-इस संरचना का निर्माण गर्भवती महिला के अंदर होता है।

कार्य:-(i) यह भ्रूण को पोषण देने का कार्य करती है।

(ii)  यह भ्रूण को ऑक्सीजन देने का कार्य करती है।

(iii) भ्रूण द्वारा त्यागे गए उत्सर्जित/त्यागे गए पदार्थों को शरीर से बाहर निकालती है।

अपरा से निकलने वाले हॉर्मोन्स:-

  1. H.C.G. (ह्यूमन कोटोनिक गोनेडोट्रोपिक हॉर्मोन्स)-
  • इसे प्रैग्नेंसी टेस्ट हॉर्मोन्स कहा जाता है।
  • यह हॉर्मोन्स गर्भवती महिला के मूत्र में पाया जाता है।
  • वर्तमान में इस हॉर्मोन्स का दुरुपयोग लिंग निर्धारण में किया जाता है।

मिनार्की:- M.C. का प्रारंभ होना (12-14 वर्ष की आयु में)

मिनोपॉज- M.C. का बंद होना (50-55 वर्ष की आयु में)

मिस्टोसाइकल (M.C.) 28 दिन का होता है।

निषेचन के 5वें दिन भ्रूण का गर्भ में रोपण होता है।

गर्भनिरोधक युक्तियाँ:-

(1) कंडोम का उपयोग।

(2) 14 वें, 15 वें, 16 वें दिन संभोग करें।

(3) पिल्स (गोलियाँ)-पिनकस द्वारा बनाई गई

  • इन गोलियों में एस्ट्रोजन प्रोजेस्ट्रॉन हॉर्मोन्स भरे जाते हैं, जो Negative Feedback के द्वारा अण्डोत्सर्ग की घटना रोक देते हैं।

  भारत में प्रथम गर्भनिरोधक बनाई गई गोली ‘सहेली’ है।

(4) कॉपर-T :-

  • ये योनि के सर्विक्स भाग में लगायी जाती है।
  • ये कॉपर का वायर शुक्राणुओं का भक्षण कर लेता है।

(5) Permanent (नसबंदी)-

(i) वेसोक्टामी

    • इसमें शुक्रवाहिनी नलिका को काटकर धागे से बाँध दिया जाता है।
    • इसके द्वारा पुरुषों की नसबंदी की जाती है।

(ii) टयूबेक्टॉमी- इसमें अण्डवाहिनी नलिका को काटकर धागे से बाँध दिया जाता है।

  इसके द्वारा महिलाओं की नसबंदी की जाती है।

9.  वृषण:-

 

 

  • यह पुरुषों में पाए जाते हैं।

स्थिति- भ्रूणावस्था में उदरगुहा में पाए जाते हैं एवं माताजी के 7 वें महीने के अंत में या 8 वें महीने के प्रारंभ में वृषण उदरगुहा से बाहर आते हैं।

बाहर आने का उद्देश्य-शरीर के ताप से 2-2.5°C ताप को कम करना क्योंकि कम तापमान पर शुक्राणुओं का निर्माण होता है।

  • वृषणों का पेट में रह जाना ‘क्रिप्टोओरेगेडिज्म’ कहलाता है।
  • वृषण में 2 प्रकार की कोशिकाएँ पाई जाती है-

       (i) सर्टोली कोशिका:- यह शुक्राणुओं को पोषण देती है।

(ii) लीडिग कोशिका- यह टेस्टेस्टेरॉन का स्त्रावण करती है।

टेस्टेस्टेरॉन के कार्य:-

(i) पुरुषों में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का विकास  करना –

(A) पुरुष का आवाज भारी करना अर्थात् मर्दाना आवाज उत्पन्न करना।

(B) यह चेहरे पर दाढ़ी-मूंछों का विकास करता है।

(C) यह त्वचा पर तेलीय ग्रंथियों का विकास करता है, जो मुँह की त्वचा पर कील मुहाँसे उत्पन्न करता है।

(ii) यह कंकाल पेशियों की वृद्धि करता है।

(iii) यह मर्दाना शक्ति उत्पन्न करता है।

(iv) यह शरीर में कोलेस्टेरोल स्तर को बढ़ा देता है।

(v)  यह जन्तुओं में लैंगिक व्यवहार में परिवर्तन लाता है अर्थात् नर को मादा की ओर आकर्षित करता है।

शुक्राणु (Sperm)

 

हिटेरोक्राइन – अन्तस्त्रावी

म्युकोस

किडनी

  • नर में प्रोलेक्टिन पैतृकवाद बढ़ाता है।
  • मादा में प्रोलेक्टिन भावनात्मक लगाव उत्पन्न करता है।
  • नर में ऑडिपस नामक ग्रंथि पाई जाती है, जो माता के प्रति प्रेम उत्पन्न करता है।
  • मादा में इलेक्ट्रा नामक ग्रंथि पाई जाती है, जो पिता के प्रति प्रेम उत्पन्न करता है।

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