जनन Reproduction

  • सजीवों का विशिष्ट लक्षण, जिसके द्वारा वे अपने समान नई संतानें उत्पन्न करते हैं, जनन कहलाता है।

  • जनन किसी भी जैविक प्रजाति के अस्तित्त्व को बनाए रखने के लिए आवश्यक क्रिया है।

  • जनन के द्वारा ही किसी प्रजाति (Species) की विशेषताएँ वंशागति/Inhoritance के कारण लम्बे समय तक उस प्रजाति के सदस्यों में बनी रहती है।

  • जीवों में दो प्रकार से जनन पाए जाते हैं।

(i)  अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction)

(ii) लैंगिक जनन (Sexual Reproduction)

अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction) की विधियाँ –

  • अलैंगिक जनन सामान्यतया निम्न कोटि के जंतुओं में तथा पौधों में पाया जाता है। इसमें एक ही जीव से, बहुत कम समय में अधिक संख्या में संतानें उत्पन्न होती हैं।

  • ये संतानें आपस में तथा अपने जनक (Parent) से समानता दर्शाती है।

  • उद्विकास (Evolution) की दृष्टि से जनन की विधि कम विकसित।

  • पौधों में अलैंगिक जनन को 'कायिक प्रवर्धन' (Vegetative Propagation) भी कहते हैं।

उदाहरण : पीलोमिक्सा व ओपेलाइना

I. द्वि-विभाजन (Binary Fission)

  • एक कोशिकीय जीवों में सरलतम जनन विधि, जिससे जनक जीव समसूत्री विभाजन (Mitosis) से विभाजित हो अपने समान दो नए जीव उत्पन्न करता है।

  • यह तीन प्रकार का होता हैं –

(1) सरल द्वि-विभाजन – अमीबा

(2) अनुप्रस्थ द्वि-विभाजन – पैरामिशियम

(3) अनुदैर्ध्य द्वि-विभाजन – यूग्लीना

 

II. बहुखण्डन (Multiple Fission) – अमीबा व पैरामिशियम

III. मुकुलन (Budding)

मुकुलन (Budding) दो प्रकार का होता है –

1.   बाह्य मुकुलन (External Budding) – हाइड्रा में शरीर की सतह पर उभार के रूप में मुकुल (Bud) का निर्माण, जो कि जनक हाइड्रा से अलग होकर नए संतति हाइड्रा के रूप में विकसित होता है।

2.   आंतरिक मुकुलन (Internal Budding) – स्पंज (स्पांजिला, साइकॉन आदि में शुष्क परिस्थितियों में जेम्यूल्स/gemules का निर्माण होता है।

  • प्रत्येक जेम्यूल नम परिस्थितियों में नए स्पंज का निर्माण करता है।)

IV. खण्डन (Fregmentation)

  • चपटे कृमि जैसे – माइक्रोस्टोमम में खण्डन प्रकार का अलैंगिक जनन होता है।

  • इनमें शरीर के अनेक टुकड़े (Fregments) हो जाते हैं तथा प्रत्येक टुकड़े से नए जीव का निर्माण।

पुनरुदभवन (Regeneration) –

  • जीवों में खोए हुए/टूटे हुए अंगों का पुन: विकास या पुन: निर्माण पुनरुद्भवन कहलाता है।

  • अब्राहम टेन्सले ने सर्वप्रथम इसके बारे में बताया।

  • स्टारफिश, कवक, शैवाल आदि में पुनरुद्भवन की क्षमता भी पाई जाती हैं।

1.   मॉफोरलेक्सिस – स्पंज, हाइड्रा, स्टारफिश आदि में टूटे हुए अंग से ही संपूर्ण नए जीव का विकास होता है।

2.   एपिमॉफोर्सिस – छिपकली में टूटी हुई पूँछ के स्थान पर नई पूँछ विकसित होना।

 

अलैंगिक जनन की अन्य विधियाँ

            (a) बीजाणु निर्माण (Spore formation) – जीवों में अलैंगिक जनन इकाइयों का निर्माण इन इकाइयों से नए जीव विकसित। जैसे –

1.   जूस्पोर्स – शैवाल व कवक में (जूस्पोर्स – गतिशील, कशाभ/Fiagrella मुक्त)

2.   कोनिडीया – पेनीसिलियम कवक में (अगतिशील)

3.   ओइडिया – एगैरिकस में (कवक जाल में उपस्थित)

4.   स्पोरेंजियोस्पोर्स – राइजोपस व म्यूकर में

            (b) कायिक प्रवर्धन (Vegetative propagation) – पौधों के कायिक भागों में नए पौधों का निर्माण।

ये दो प्रकार का होता हैं – प्राकृतिक एवं कृत्रिम

1.   प्राकृतिक कायिक जनन – जड़ (शकरकंद, डहेलिया, शीशम), तना (बल्ब, कंद, प्रकंद, धनकंद), पत्ती (पत्थरचट्‌टा, बिगोनिया आदि)

2.   कृत्रिम कायिक प्रवर्धन – कृत्रिम रूप से पौधों के कायिक भागांे की सहायता से नए पौधे विकसित करना।

      विधियाँ

(i) कर्तन (cutting)

(ii) दाब लगाना

(iii) ग्राफटिंग / रोपण सूक्ष्म प्रवर्धन (Micropropagation)

      कर्तन (Cutting)

  • पौधे के तने का छोटा भाग, जिससे नए पौधे का विकास। उदाहरण – गुलाब, बोगेनविलिया, गन्ना।

  • ये दो प्रकार की विधियों द्वारा होता है।

(i) स्तम्भ कर्तन

(ii) मूल कर्तन

(i) स्तम्भ कर्तन

  • स्तम्भ कर्तन में पौधे के स्तम्भ भाग को छोटे टुकड़ों में काटकर जमीन में रोप दिया जाता है। जैसे – गन्ना, अंगूर, गुलाब, बोगेनविलिया।

(ii) मूल कर्तन

  • इस विधि के अंतर्गत जड़ों के टुकड़ों को सामान्यत: ऊर्ध्व स्थिति में लगाया जाता है ताकि शीर्ष पर उपस्थित अपस्थानिक कलिकाएँ प्रस्फुटित हो सके। जैसे – सेव, चेरी, अमरूद, नीबू।

दाब लगाना (Layering) –

  • इस विधि में स्तंभ या शाखा को मुख्य पादप से बिना अलग किए हुए उसमें अपस्थानिक जड़ों के निर्माण को प्रेरित किया जाता है, जिनसे नए प्ररोह उत्पन्न होते हैं।

  • इसके अंतर्गत तीन विधियाँ शामिल हैं –

(i) टीला दाब विधि

(ii) वायु दाब

(ii) रोपण विधि

(i) टीला दाब विधि

  • इस विधि में तने की झुकी हुई शाखा को जमीन में दबा दिया जाता है। जैसे – चमेली, मोगरा आदि।

(ii) वायु दाब

  • इस विधि का प्रयोग उन पौधों में किया जाता है जिनकी शाखाएँ सामान्यत: मोटी होती हैं। इस विधि को गुट्टी लगाना भी कहते है।

(ii) रोपण विधि

  • अच्छे गुणों वाले अलग-अलग पौधों के जड़युक्त (Stock) व तने वाले (Scion) भागों को आपस में जोड़कर नए पौधे का विकास।

  • इस विधि की कई प्रमुख विधियाँ जैसे – जिह्वारोपण, फच्चर रोपण, किरीट रोपण, कलिका रोपण आदि हैं।

सूक्ष्मप्रवर्धन (Micropropagation)

  • प्रयोगशाला में संवर्धन माध्यम (culture media) पर कृत्रिम रूप से अविभेदित पादप कोशिकाओं का निर्माण करना।

  • इन अविभेदिक कोशिकाओं को 'कैलस' भी कहते हैं। इस कैलस से नए पौधे का विकास होता है।

  • इसे ऊतक-संवर्धन (Tissue culture) भी कहते हैं। उदाहरण – क्राइसेंथेमम, गुलदाऊदी, कारनेशन, ग्लेडियोलस आदि में।

  • क्रायिक प्रवर्धन के दाैरान जड़ों के विकास को प्रेरित करने के लिए IBA (इण्डोल ब्यूटाइरिक अम्ल) तथा NAA (नेफ्थलीन एसीटिक अम्ल) का प्रयोग करते हैं।

  • IBA तथा NAA दोनों कृत्रिम ऑक्सिन हाॅर्मोन्स हैं।

 

अलैंगिक जनन का महत्त्व

लाभ

  • केला, गन्ना जैसे बीजरहित पौधों में केवल अलैंगिक जनन संभव।

  • कम समय में अधिक संख्या में संतानें प्राप्त की जा सकती हैं।

  • विशेष लाभदायक गुणों को अनेक पीढ़ियों तक बनाए रख सकते हैं।

  • निम्न कोटि के जंतुओं में जनन इसी विधि से होता है।

हानि –

  • अलैंगिक उत्पन्न जीवों में नए लक्षण उत्पन्न नहीं होते, जिससे संतानें बदलते हुए वातावरण मंे अधिक जीवन क्षम नहीं होती है।

  • अलैंगिक जनन संरचनाएँ शीघ्र ही नष्ट हो जाती है।

  • उद्विकास(Evolution) की दृष्टि से अलैंगिक जनन विधि कम विकसित होता है।

 

लैंगिक जनन (Sexual Reproduction)

  • जनन की विकसित एवं जटिल विधि, जिसमें नए एवं मादा युग्मक निषेचन की क्रिया के द्वारा एक कोशिकीय युग्मनज (Zygote) का निर्माण करते हैं तथा इस युग्मनज भ्रूण (Embryo) का विकास होता है।

  • लैंगिक जनन चार चरणों में पूरा होता हैं –

(i)   युग्मक निर्माण(Gametogenesis)

(ii)  युग्मक संलयन/निषेचन (Fertilisation)

(iii) भ्रूण का निर्माण एवं विकास

(iv) भ्रूण से जीव का निर्माण

लैंगिक जनन की विशेषताएँ –

  • भिन्न-भिन्न युग्मकों के कारण उत्पन्न होने वाली संतान में भी नए लक्षण पाए जाते हैं।

  • लैंगिक जनन में अर्धसूत्री विभाजन/Meiosis (युग्मक निर्माण में) एवं समसूत्री विभाजन/Mitosis (भ्रूण का विकास) दोनों प्रकार के विभाजन होते हैं।

  • लैंगिक जनन सभी प्रकार के जंतुओं में पाया जाता है।

  • अमीबा व यूग्लीना में अलैंगिक जनन अनुपस्थित होता है।

  • निम्न कोटि के अकशेरुकी जंतुओं मेें लैंगिक व अलैंगिक जनन दोनों पाए जाते हैं।

लैंगिक जनन के प्रकार (Types of Sexual Reproduction) –

  • लैंगिक जनन को एम्फीमिक्सिस या सिनजेनेसिस भी कहते हैं।

  • लैंगिक जनन मुख्यतया दो प्रकार का होता हैं-

1.   युग्मक संलयन (Syngamy) – नर व मादा युग्मक पूर्ण रूप से एक-दूसरे से मिलकर युग्मनज (Zygote) का विकास करते हैं।

2.   संयुग्मन (Conjugation) – पैरामिशियम में एक पैरामिशियम से नर केंद्रक का स्थानांतरण दूसरे पैरामिशियम में व नए जीव का विकास होता है।

लैंगिक संलयन(Syngamy)

स्वनिषेचन(Endogamy)

परनिषेचन(Exogamy)

  • उभयलिंगी/द्विलिंगी(Bisexual/Hermaphrodite) जीवों में नर व मादा युग्मकों/gametes का निर्माण एक ही जीव में।

  • इस एक ही जीव के नर व मादा युग्मक आपस में निषेचन/Fertilisation कर संतति निर्माण करते हैं। उदाहरण – टीनिया सोलियम(Tape-worm)

  • एकलिंगी(Unisexual/dioecious) जीवों में नर व मादा युग्मकों का निर्माण अलग-अलग जीवों में।

  • इनमें परनिषेचन(Cross fertilisation) के द्वारा संतति उत्पन्न। उदाहरण – अधिकांश जंतु

  • केंचुआ उभयलिंगी जीव है, लेकिन इसमें परनिषेचन (Cross-Fertilisation) होता है।

  • समयुग्मकी (Isogamy) – निषेचन में भाग लेने वाले युग्मक यदि आकारिकी(Morphology) में एक समान दिखाई दे तो उसे समयुग्मकी कहते हैं। उदाहरण – प्रोटोजोआ में (फोरामिनिफेरा, मोनोसिस्टिस)

  • विषमयुग्मकी (Anisogamy) – निषेचन में भाग लेने वाले युग्मक यदि आकारिकी में असमान दिखाई दे तो उसे विषमयुग्मकी कहते हैं। उदाहरण – कशेरुकी जंतु(vertebrates), (मत्स्य वर्ग, उभयचर/Amphobians, सरीसृप/Reptiles, पक्षी/Aves, स्तनधारी/Mammals)

  • पीडोजेनेसिस (पीडोमॉफोर्सिस) – जब जीव की लार्वा अवस्था वयस्क के समान जनन करने लग जाए, पीडोजेनेसिस कहलाती है। उदाहरण – सेलामेण्डर का लार्वा, एक्सोलोटल लार्वा।

  • चिरभ्रूणता (Neotany) – जब लार्वा के लक्षण वयस्क जीव में भी दिखाई दें, तो इसे चिरभ्रूणता कहते हैं। उदाहरण – सेलामेण्डर।

बहुभ्रूणता (PolyEmbryony) –

  • निषेचन के बाद जब एक से अधिक भ्रूण का विकास हों तो इसे 'बहुभ्रूणता' (PolyEmbryony) कहते हैं। उदाहरण – मनुष्य में एक समान जुड़वां बच्चे।

  • पौधों में भी जब एक ही बीज (Seed) में एक से अधिक भ्रूणों (Embryos) का विकास हो तो इसे भी बहुभ्रूणता कहते हैं। उदाहरण – नीबू, संतरा, आम आदि।

  • वैज्ञानिक ल्यूवेन हॉक ने एन्जियोस्पर्म पादप संतरे में बहुभ्रूणता की खोज की थी।

  • बहुभ्रूणता का पाया जाना जिम्नोस्पर्म पादपों का मुख्य लक्षण है।

अनिषेक जनन (Parthenogenesis) –

  • जब बिना निषेचन के ही अण्डे से भ्रूण (Embryo) का विकास हो तो इसे अनिषेक जनन (Parthenogenesis) कहते हैं।

  • मधुमक्खी (Honey bee) में नर मधुमक्खी बिना निषेचन के उत्पन्न, जबकि रानी मधुमक्खी निषेचन से उत्पन्न। उदाहरण – कुछ अकशेरुकी जीव जैसे क्रस्टेशियन वर्ग के जंतु, रोटीकर्स।

  • कुछ कशेरुकी जीवों जैसे – मेंढ़क, मुर्गी आदि के अण्डों मंे अनिषेक जनन को प्रेरित किया जा सकता है। (तापमान में परिवर्तन कर, सुई चुभाकर आदि।)

अनिषेक फलन (Parthenocarpy) –

  • पौधों में बिना निषेचन के ही फल का निर्माण अनिषेक फलन कहलाता है। उदाहरण – केला, अंगूर, पपीता, अन्नानास आदि।

  • नेफ्थलीन एसीटिक एसिड, जिब्बरेलिन आदि से पौधों में अनिषेक फलन को प्रेरित कर बीजरहित फल प्राप्त करते हैं।

असंगजनन (Apomixsis) –

  • बिना निषेचन के बीज निर्माण असंगजनन कहलाता है। उदाहरण – एस्टोर्सिया व घास कुल के पौधे।

जनन-तंत्र (Reproductive System)

  • नर जनन तंत्र (Male Reproductive System) :-

– वृषण कोश

– वृषण (प्राथमिक जनन अंग)

– शुक्रवाहिकाएँ

– शुक्राशय

– ग्रंथियाँ

– शिश्न

– अधिवृषण

– शुक्रवाहिनियाँ

वृषण कोश (Scrotal Sac)

  • ये उदर गुहा के नीचे, दोनों पैरों में मध्य, अत्यधिक वलित त्वचा से बनी थैलेनुमा संरचना है, जिसमें वृषण पाए जाते हैं।

  • मनुष्य में वृषण शरीर से बाहर वृषण कोश में होते हैं क्योंकि मनुष्य के शरीर का तापमान लगभग 37°C होता है, इतने तापमान पर शुक्राणु उत्पादन संभव नहीं होता। अत: वृषण कोश में तापमान 2 से 3°C कम होने के कारण इनमें शुक्राणु उत्पादन संभव हो पाता है।

  • वृषण कोश में वृषण गुबरनाकुलम नामक संरचना पर स्थित होता है।

Note :

  • शेर, मनुष्य व साँड में वृषण वृषणकोश में ही रहते हैं।

  • लामा, रोडेन्ट्स (चूहा) में वृषण केवल जनन के समय वृषण कोश में आते हैं।

  • ह्वेल व हाथी में वृषण उदर गुहा में ही रहते हैं।

वृषण –

  • नर मनुष्य में वृषण गुलाबी रंग के, 4-5 Cm. लंबे लगभग 3 Cm. चौड़े होते हैं।

  • ये प्राथमिक जनन अंग हैं, जो कि शुक्राणु का निर्माण करते हैं।

  • अधिवृषण लंबी, कुंडलित नलिका समान संरचना जहाँ शुक्राणु का संचयन तथा परिपक्वन होता है।

  • वृषण से शुक्राणुओं को शुक्रवाहिकाओं के द्वारा अधिवृषण में पहुँचाया जाता है।

  • प्रत्येक वृषण की ओर से एक-एक शुक्रवाहिनी शुक्राणुओं को वृषणकोश से उदर गुहा की ओर ले जाती है।

शुक्राशय (Seminal Vesicle) –

  • प्रत्येक शुक्रवाहिनी उदरगुहा में पहुँचकर शुक्राशय के साथ मिलकर ‘स्खलन वाहिनी’ का निर्माण करती है।

  • शुक्राशय से शुक्रद्रव का स्त्रवण होता है, जो कि वीर्य के अधिकांश भाग का निर्माण करता है।

प्रोस्टेट ग्रंथि –

  • यह तरल, चिपचिपे द्रव का स्त्रवण करती है, जो कि वीर्य निर्माण में सहायक है।

  • यह मूत्र मार्ग के आधार पर उपस्थित एक बड़ी ग्रंथि है, जो कई पिण्डों की बनी होती है।

  • इसके स्त्राव में सिट्रिक अम्ल, फाइब्रिनोलाइसिन व स्पर्मिन आदि पदार्थ पाए जाते हैं, जो शुक्राणुओं की गतिशीलता के लिए आवश्यक होते हैं।

काऊपर ग्रंथि –

  • इस ग्रंथि को बल्बोयूरिथ्रल ग्रंथि भी कहा जाता है।

  • इनकी संख्या एक जोड़ी होती हैं जो प्रोस्टेट ग्रंथि के नीचे पाई जाती है।

  • यह एक लसलसा क्षारीय तथा पारदर्शी द्रव स्त्रावित करता है, जो मूत्रमार्ग को स्नेहक तथा क्षारीय बनाती है अर्थात इसका स्त्रवण मूत्रमार्ग की अम्लीयता को समाप्त करता है।

नर जनन तंत्र –

  • शिश्न – यह लंबी, बेलनाकार संरचना है, जिसमें मूत्रमार्ग पाया जाता है।

  • शिश्न में कुछ रिक्त/खाली अवकाश उपस्थित जिनमें लैंगिक उत्तेजना के समय रक्त प्रवाह बढ़ता है।

  • बढ़े हुए रक्त प्रवाह के कारण ही शिश्न के आकार में वृद्धि होती है।

  • शिश्न के अगले फूले हुए भाग ‘ग्लास पेनिस’ पर रूपांतरित तैलीय ग्रंथियाँ पाई जाती हैं, इन्हें ‘टायसन ग्रंथियाँ’ भी कहते हैं।

  • मूत्रमार्ग से ही वीर्य भी बाहर निकलता है, अत: इस मूत्रमार्ग की अम्लीयता को समाप्त करने के लिए काऊपर ग्रंथियों का स्त्रवण निकलता है।

  • वीर्य का निर्माण शुक्राशय तथा प्रोस्टेट ग्रंथियों के द्रवों से होता है।

  • वीर्य के प्रत्येक स्खलन में इसका आयतन 3-5 ml. होता है व इसमें लगभग 40 करोड़ शुक्राणु उपस्थित होते हैं।

NOTE :-

  • वीर्य का PH – 7.5 से 7.8 अर्थात् यह हल्का क्षारीय होता है।

  • नर मनुष्य के शरीर से वीर्य निकलना स्खलन (Ejaculation) तथा नर से मादा के शरीर में वीर्य का पहुँचना वीर्य सेचन (Insemination) कहलाता है।

  • वीर्य में फ्रक्टोज शर्करा पाई जाती है, जो मनुष्य के शरीर में केवल वीर्य में ही उपस्थित होती है।

  • लैंगिक उत्पीड़न के मामलों में जाँच के दौरान फ्रक्टोज की उपस्थिति देखी जाती है।

  • प्रोस्टेट कैंसर के उपचार के दौरान वृषण को सर्जरी द्वारा हटा दिया जाता है, क्योंकि टेस्टोस्टीरॉन इस कैंसर को बढ़ाता है।

नर जनन तंत्र का हॉर्मोनल नियंत्रण –
 


⇒ FSH – फॉलिकल प्रेरक हॉर्मोन – Áवृषण में सेमिनिफेरस नलिकाओं में शुक्रजनन को प्रेरित करता है।
⇒ LH – ल्यूटीनाइजिंग हॉर्मोन Á – वृषण की लीडिग को टेस्टोस्टीरॉन के स्त्रवण हेतु प्रेरित करता है।


किशोरावस्था में शारीरिक परिवर्तन –
नर में ‘एंड्रोजन्स’ (नर हॉर्मोन्स जैसे – टेस्टोस्टीरॉन) के प्रभाव में 12 से 14 वर्ष की उम्र में लैंगिक लक्षण विकसित होने लगते हैं। जैसे-

  • दाढ़ी-मूँछ आना।

  • शरीर पर बालों का घना आवरण।

  • आवाज भारी होना।

  • चौड़े कंधे व मजबूत माँसपेशियाँ।

  • शुक्राणु निर्माण अधिक होना।

मादा जनन तंत्र (Female Reproductive System)

मनुष्य के मादा जनन तंत्र की प्रमुख संरचनाएँ-

अण्डाशय (प्राथमिक जनन अंग)

  • मादा मनुष्य में एक जोड़ी अण्डाशय पाए जाते हैं।

  • अण्डाशय उदर गुहा में किडनी की पृष्ठ भित्ति से जुड़े रहते हैं, जिसे मिजोवेरियन तन्तु कहते हैं।

  • प्रत्येक अण्डाशय के चारों ओर तीन स्तर पाए जाते हैं –

(i) ट्यूनिका एल्ब्युजिनिया

(ii) जनन उपकला

(iii) ट्यूनिका प्रोफेरिया

अण्डवाहिनी (फैलोपियन नलिकाएँ) –

  • मानव में एक जोड़ी अण्डवाहिनियाँ पाई जाती हैं, जो प्रत्येक अण्डाशय से संबंधित होती हैं।

  • इस वाहनियों का परिवर्धन भ्रूण की मूलेरियन नलिका द्वारा होता है।

गर्भाशय –

  • मनुष्य में सिम्पलेक्स प्रकार के गर्भाशय पाए जाते हैं जिसमें दो गर्भाशय संयुक्त होकर एक हो जाते हैं जिसे बच्चादानी कहते हैं।

  • मनुष्य के गर्भाशय की आंतरिक भित्ति एण्डोमेट्रियल होती हैं।

  • गर्भाशय में तीन मुख्य भाग होते हैं –

(i) फण्डस (गुम्बदाकार)

(ii) काय (मुख्य भाग)

(iii) ग्रीवा (अन्तिम भाग)

योनि –

  • इनका निर्माण दोनों ओर से गर्भाशय के मिलने से होता है।

  • यह मूत्राशय के नीचे एक छोटी थैली के समान संरचना होती है।

  • योनि बाहर की ओर भग के रूप में खुलती है, इस स्थान पर पतली म्यूकस झिल्ली को हाइमन कहते है। यह झिल्ली मादा द्वारा प्रथम मैथून क्रिया करने पर फट जाती है।

  • मैथून के समय योनि शिश्न से वीर्य प्राप्त करती है, जिसे वीर्य सेचन कहते है।

जनन स्वास्थ्य –

  • शारीरिक, मानसिक, व्यावहारिक तथा सामाजिक रूप से यदि व्यक्ति जनन संबंधी क्रियाओं के लिए स्वस्थ हो तो ऐसे व्यक्ति जननात्मक रूप से स्वस्थ कहलाते हैं।

  • भारत विश्व का प्रथम देश है, जहाँ जननात्मक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए 1951 से “परिवार नियोजन” कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जिसे वर्तमान में ‘परिवार कल्याण’ के नाम से जाना जाता है।

जनसंख्या नियंत्रण

  • जनसंख्या का वैज्ञानिक अध्ययन डेमोग्राफी कहलाता है।

  • विश्व जनसंख्या दिवस 11 जुलाई को मनाया जाता है।

  • विश्व जनसंख्या दिवस 2020 की थीम – कोविड-19 की रोकथाम : महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य और अधिकारों की सुरक्षा कैसे हो।

  • संसाधनों की सीमित मात्रा, बेरोजगारी, कुपोषण आदि समस्याओं से निपटने हेतु तथा जननात्मक स्वास्थ्य की दृष्टि से सभी व्यक्ति स्वस्थ रहें इसके लिए जनसंख्या नियंत्रण आवश्यक है।

  • जनसंख्या नियंत्रण की दो मुख्य विधियाँ हैं –

1. स्थायी विधि

2. अस्थायी विधि

(1)  स्थायी विधियाँ

  • इस विधि में नर एवं मादाओं में स्थायी रूप से संतान उत्पन्न करने की क्षमता को रोक दिया जाता है।

  • इन्हें सामान्यतया ‘नसबंदी’ के रूप में जाना जाता है।

  • पुरुषों में नसबंदी को ‘वैसेक्टॉमी’ कहते हैं, जिसमें ऑपरेशन के द्वारा शुक्रवाहिनियों को ब्लॉक कर दिया जाता है, जिससे वीर्य में शुक्राणु नहीं आ पाते हैं।

  • मादाओं में नसबंदी को ‘ट्यूबैक्टॉमी’ कहते हैं, जिसमें ऑपरेशन के द्वारा अण्डवाहिनियों को ब्लॉक कर दिया जाता है, जिससे निषेचन के लिए शुक्राणु अण्डे तक नहीं पहुँच पाते हैं।

(2)  अस्थायी विधियाँ

(A) सुरक्षित काल विधि

  • मादाओं में अण्डोत्सर्ग (मासिक चक्र के 14वें दिन) से 3 दिन पहले व 3 दिन बाद अर्थात् 11वें से 17वें दिन तक असुरक्षित यौन संपर्क नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसी समय गर्भधारण की संभावना रहती है।

(B) कोइटस इन्टरप्टस

  • संभाग के समय नर के द्वारा वीर्य को मादा के शरीर के बाहर ही स्खलित कर देना।

(C) LAM

  • प्रसव/शिशु जन्म के बाद लगभग 6 माह मादा में मासिक धर्म प्रारंभ नहीं होता है, इस दौरान गर्भधारण की संभावना नहीं रहती है।

(D) अवरोधक युक्तियाँ

  • नर – निरोध –

  • मादा – मादा निरोध (Femidon)

  • निरोध ऐसा अवरोध है, जो वीर्य को मादा की योनि में नहीं जाने देता है।

  • निरोध रबर या लेटेक्स से बनाया जाता है।

कॉपर-T

  • इसे स्वास्थ्य कर्मी/चिकित्सक के द्वारा मादा के गर्भाशय में रोपित किया जाता है।

  • इस कॉपर-टी से Cu आयन्स का स्त्रवण किया जाता है जो कि सर्वाइकल द्रव को गाढ़ा बना देते हैं, ऐसे में शुक्राणु की गतिशीलता कम हो जाती है।

  • ये अन्त: गर्भाशयी युक्ति है।

(E) रासायनिक विधियाँ

(i) शुक्राणुनाशक क्रीम

  • बोरिक अम्ल, सिट्रिक अम्ल, KMnO4 आदि अम्लीय क्रीम शुक्राणुनाशक होती हैं।

  • जिंक सल्फेट का प्रयोग भी ऐसी क्रीम्स में करते हैं।

(ii) गर्भनिरोधक रसायन

  • अण्डोत्सर्ग को रोकना।

  • फेलोपियन नलिकाओं की गति कम करके।

  • भ्रूण के आरोपण को रोकना।

सहेली

  • CDRI (सेंट्रल ड्रग रिसर्च इन्स्टीट्यूट) द्वारा तैयार गर्भनिरोधक गोली है।

  • यह विश्व की प्रथम नॉन-स्टीरॉयडल गर्भनिरोधक दवा है।

  • इसमें ‘सेन्टक्रॉमेन’ पाया जाता है।

अन्य स्टीरॉयडल गर्भनिरोधक दवाएँ –

  • इसमें प्रोजेस्टेरॉन (मुख्य) व एस्ट्रोजन पाए जाते हैं।

जैसे – MALA-D, MALA-N इन्हें दैनिक आधार पर लिया जाता है।

  • छायाभी स्टीरॉयडल गर्भनिरोधक गोली है।

Morning After Pills (Emergency Pills) –

  • असुरक्षित यौन संपर्क के बाद 72 घंटे के भी केवल 1 गोली गर्भधारण को रोकती है।

  • उदाहरण : i-pill, Unwanted-72 आदि।

Note –

  • गर्भनिरोधक दवाओं के कारण :-

(i) मासिक चक्र अनियमित होना।

(ii) अधिक रक्त स्त्रवण।

(iii) रक्त के थक्के बनना।

  • हृदय रोग से पीड़ित मादाओं को इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए।

Nor-Plant –

  • त्वचा के नीचे स्थापित किया जाता है। लगभग 4-5 वर्ष तक गर्भधारण से सुरक्षा, इसमें से प्रोजेस्टेरॉन का स्त्रवण।

Depo-Provera –

  • लगभग 3 माह तक गर्भधारण से सुरक्षा।

चिकित्सकीय सगर्भता समापन कानून – 1971

  •  यदि अवांछित गर्भधारण हो जाए तो गर्भपात के द्वारा गर्भ को नष्ट किया जाता है।

  • भारत मेंे ‘चिकित्सकीय सगर्भता समापन कानून’ 1971 (MTP Act) के अनुसार 21 सप्ताह तक के भ्रूण को चिकित्सकों के द्वारा नष्ट किया जा सकता है।

  • ‘हाल ही में इस अवधि को बढ़ाकर 24 सप्ताह किया गया है।’

  • 24 सप्ताह के बाद सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से गर्भपात कराया जा सकता है।

कृत्रिम जनन प्रौद्योगिकी –

  • यदि सामान्य रूप से गर्भधारण न हो तो निम्नलिखित विधियों से कृत्रिम रूप से गर्भधारण करवाया जाता है।

(1) IVF (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन)

  • शुक्राणु व अण्डाणु का निषेचन प्रयोगशाला में तथा निषेचन के बाद तैयार भ्रूण को 8 कोशिकीय / 16 कोशिकीय अवस्था में गर्भाशय में रोपित कर देते हैं।

(2) IUI (इन्ट्रा यूटेराइन इनसेमिनेशन)

  • बड़ी सुईनुमा संरचना के द्वारा वीर्य को गर्भाशय के पास छोड़ा जाता है।

(3) ICSI (Intra-Cytoplasmic Sperm Injection) –

  • शुक्राणु को सीधे अण्डे में प्रवेश कराना।

एम्निओसेंटेसिस (Amnio Centesis)

  • एम्निओसेन्टेसिस एक गर्भलिंग जाँच है, जो गैर कानूनी है।

  • इसमें भ्रूण तरल में गुणसूत्रों की जाँच के अाधार पर गर्भस्थ शिशु के लिंग – पुरुष या महिला की जाँच की जाती है।

  • इस टेस्ट का दुष्परिणाम यह है कि कन्या भ्रूण हत्या की दर में वृद्धि हुई है।

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