नाभिकीय भौतिकी एवं रेडियो एक्टिविटी

– किसी परमाणु के नाभिक में प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन कण उपस्थित होते हैं।

– प्रोटॉन की प्रकृति धनावेशित होती है, जबकि न्यूट्रॉन की प्रकृति उदासीन होती है, इसी कारण नाभिक को धनावेशित का मान जाता है।

– परमाणु में नाभिक धनावेशित होता है जिसके चारों तरफ ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन घूमता है।

– नाभिक के भीतर उपस्थित न्यूट्रॉन व प्रोटॉन के योग को न्यूक्लिऑन कहते हैं।

तत्त्व का प्रतीक:-

          A – द्रव्यमान संख्या

          Z – परमाणु क्रमांक/परमाणु संख्या

द्रव्यमान संख्या (Mass Number):-

–  किसी परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटोनों की संख्या (P) व                  न्यूट्रॉनों की संख्या (n) का योग, द्रव्यमान संख्या कहलाती है।
     द्रव्यमान संख्या (A) = n + 

परमाणु क्रमांक (Z):-
           नाभिक में उपस्थित प्रोटॉन की संख्य
           
परमाणु क्रमांक (Z) = प्रोटॉन की संख्या (P)
उदाहरण:-

तत्त्व

प्रतीक

परमाणु क्रमांक

द्रव्यमान संख्या

न्यूट्रॉन की संख्या

कार्बन

6C12

6

12

6

हाइड्रोजन

1H1

1

1

0

सोडियम

11Na23

11

23

12

समस्थानिक (Isotops):-

– दो या दो से अधिक तत्त्व जिसके परमाणु क्रमांक तो समान हो लेकिन          द्रव्यमान संख्या अलग-अलग हो, समस्थानिक कहलाते हैं। उदाहरण—       हाइड्रोजन समस्थानिक:-

                        1H1      1H2      1H3

          न्यूट्रॉन       0          1          2

          प्रोटॉन       1          1          1

– कार्बन समस्थानिक-

                        6C12     6C13     6C14

          न्यूट्रॉन     6          7          8

          प्रोटॉन     6          6          6         

नाभिक का स्थायित्व:-
-अभी तक ज्ञात लगभग 120 तत्त्वों के 1500 नाभिकों में से केवल               260 नाभिक ही स्थायी है अन्य नाभिक अस्थायी होते हैं, जिनसे                   लगातार विकिरणों का उत्सर्जन होता है।
– हल्के तत्त्वों में न्यूट्रॉन तथा प्रोटॉन का अनुपात (n/p) बढ़ने पर                   स्थायित्व में कमी आती है।
– भारी तत्त्वों में न्यूट्रॉन तथा प्रोटॉन का अनुपात (n/p) बढ़ने पर                     स्थायित्व में वृद्धि होती है।
– प्रति न्यूक्लिऑन बंधन ऊर्जा ज्यादा होने पर नाभिक का स्थायित्व               अधिक होता है।
– जब कोई नाभिक अस्थायी होता है तो वह अधिक स्थायी नाभिक का           निर्माण करने के लिए नाभिकीय संलयन एवं नाभिकीय विखण्डन               जैसी क्रियाएँ दर्शाता है।

नाभिकीय विखण्डन (Nuclear Fission):-

-जब कोई अस्थायी रेडियोसक्रिय नाभिक दो या दो से अधिक छोटे-छोटे नाभिकों में टूटता है तो इसे नाभिकीय विखण्डन कहते हैं।

– नाभिकीय विखण्डन के दौरान अत्यधिक ऊर्जा उत्सर्जित होती है, साथ ही तीव्रगामी न्यूट्रॉन मुक्त होते हैं।

-ऑटोहॉन व स्ट्रॉसमैन ने नाभिकीय विखण्डन के बारें में सर्वप्रथम बताया।

– जब यूरेनियम 235 पर न्यूट्रॉन की बमबारी की जाती है, तब निम्नलिखित अभिक्रिया प्राप्त हुई-


-जब नाभिकीय विखण्डन होता है तो विखण्डन में उत्पन्न 3 न्यूट्रॉन पुन: विखण्डन क्रिया करते हैं इस प्रकार सतत् चलने वाली क्रिया ‘शृंखला अभिक्रिया’ कहलाती है।

 

– इस विखण्डन से लगभग 200 Mev ऊर्जा प्राप्त या 0.8 Mev प्रति न्यूक्लियॉन ऊर्जा मुक्त होती है।

– नियंत्रित शृंखला अभिक्रिया का अनुप्रयोग परमाणु भट्टी/नाभिकीय संयंत्र में करते हैं।

– एनरिको फर्मी ने सर्वप्रथम नाभिकीय विखण्डन की सहायता से न्यूक्लियर रिएक्टर का निर्माण किया।

परमाणु भट्‌टी/परमाणु संयंत्र (Nuclear Reactor):-

– नाभिकीय विखण्डन की क्रिया पर आधारित न्यूक्लियर रिएक्टर ऐसा संयंत्र है जिसमें नियंत्रित शृंखला अभिक्रिया के द्वारा नाभिकीय विखण्डन किया जाता है।

– न्यूक्लियर रिएक्टर की संरचना में विभिन्न भाग दिखाई देते हैं।

 

ईंधन (Fuel):-

– यूरेनियम-235, यूरेनियम-238, प्लूटोनियम-239, प्लूटोनियम-240, प्लूटोनियम-241 आदि का प्रयोग ईंधन के रूप में करते हैं।

मंदक (Moderator):-

– ये न्यूट्रॉनों की गति को मंद कर देते हैं, जिसमें तीव्रगामी न्यूट्रॉनों की संख्या कम हो जाने से विखण्डन क्रिया को नियंत्रित किया जा सकता है।

– एक अच्छा मंदक वह होता है जिसका परमाणु भार कम हो, जो न्यूट्रॉन को अवशोषित किए बिना उनका वेग कम कर दें।

– ग्रेफाइट एवं भारी जल (D2O) को मंदक के रूप में प्रयुक्त करते हैं।

नियंत्रक छड़ें (Controlling rods):-

– नियंत्रक छड़ें न्यूट्रॉन्स को अवशोषित करने में प्रयुक्त होती है।

– ये कैडमियम (cd) की बनी होती है।

शीतलक:-

– शीतलक के रूप में भारी जल /D2O या द्रवित नाइट्रोजन, CO2­ व O2 का प्रयोग करते हैं।

– ये विखण्डन के दौरान उत्पन्न ऊष्मा को अवशोषित करते हैं।

परिरक्षक आवरण:-

– ये सीमेन्ट, कंकरीट आदि से बना मोटा आवरण है जो नाभिकीय विकिरणों से संयंत्र में कार्यरत श्रमिकों को बचाता है।

नोट:-

संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium):-

– जब यूरेनियम में U235 की मात्रा को बढ़ाया जाता है तो ऐसा यूरेनियम ‘संवर्धित यूरेनियम’ कहलाता है।

– U235 ज्यादा विखण्डनीय होता है अर्थात् आसानी से विखण्डित होता है तथा ये अधिक ऊर्जा देता है। इसे तीव्र अथवा मंद गति के न्यूट्रॉन दोनों ही विखण्डित कर सकते हैं।

– प्राकृतिक यूरेनियम में इसकी मात्रा 0.7 प्रतिशत होती है।

– U238 कम विखण्डनीय होता है अर्थात् आसानी से विखण्डित नहीं होता तथा ये ऊर्जा भी कम देता है, इसे विखण्डित करने के पश्चात् तीव्र न्यूट्रॉन भी मंद हो जाता है। इस कारण ये शृंखला बनाने के योग्य नहीं होता है।

– प्राकृतिक यूरेनियम में इसकी मात्रा 99.3 प्रतिशत होती है।

– प्राकृतिक यूरेनियम से U235 को पृथक किया जाता है तत्पश्चात् इसका उपयोग किया जाता है।

– यूरेनियम का आकार क्रांतिक आकार से अधिक आकार का रखना आवश्यक होता है, जिससे कि शृंखला अभिक्रिया चलती रहे।

नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion):-

– जब दो हल्के नाभिक आपस में जुड़ कर किसी भारी नाभिक का निर्माण करते हैं तो इसे नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) कहते हैं।

– संलयित होने वाले छोटे नाभिकों का कुल द्रव्यमान संलयन के बाद बने भारी नाभिक के द्रव्यमान से कम होता है, द्रव्यमान में ये कमी या क्षति ऊर्जा के रूप में मुक्त होती है।

– नाभिकीय संलयन अत्यन्त उच्च तापमान (108 केल्विन) तथा उच्च दाब (106 atm) पर संभव हो पाता है। ऐसी परिस्थितियाँ प्राकृतिक रूप से सूर्य व तारों की सतह पर होती है जहाँ नाभिकीय संलयन की क्रिया होती रहती है।

– हाइड्रोजन बम नाभिकीय संलयन पर आधारित होता है, जबकि परमाणु बम नाभिकीय विखण्डन पर आधारित होते हैं।

– हाइड्रोजन बम के आविष्कारक एडवर्ड टेलर थे।

– परमाणु बम के आविष्कारक ओपेनहाईमर थे।

– नाभिकीय संलयन के दौरान अत्यधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है तथा विखण्डन की क्रिया को नियंत्रित करना संभव नहीं है। जैसे-

– दो ड्यूटीरियम उच्च ताप तथा उच्च दाब पर संलयित होकर हीलियम के नाभिक तथा न्यूट्रॉन का निर्माण करते हैं, साथ ही साथ 3.17 Mev ऊर्जा मुक्त होती है।

 

 

– इसी प्रकार दो ड्यूटीरियम उच्च ताप व उच्च दाब पर संलयित होकर ट्राइटियम के नाभिक तथा प्रोटियम का निर्माण करते हैं साथ ही साथ 4.07 Mev ऊर्जा का मुक्त होती है।

 

– एक ड्यूटीरियम तथ एक ट्राइटियम संलयित होकर एक ही हीलियम के नाभिक का तथा एक न्यूट्रॉन का निर्माण करते हैं साथ ही 17.59 Mev ऊर्जा मुक्त होती है।

रेडियो सक्रियता/रेडियो धर्मिता

(Radioactivity):-

– भारी नाभिकों से स्वत: ही रेडियोधर्मी विकिरणों      ( \(\alpha, \beta\) तथा \(\gamma\)विकिरण) का उत्सर्जन रेडियो सक्रियता कहलाता है।

– अस्थायी नाभिक रेडियोधर्मिता का गुण दर्शाते हैं।

– 1896 में हेनरी बैकुरल ने यूरेनियम के नमूने से रेडियो सक्रियता की खोज की।

– क्यूरी दंपति ने रेडियम की खोज कर इसके रेडियोधर्मी गुणों के बारें में बताया।

– परमाणु क्रमांक 82 से अधिक परमाणु क्रमांक वाले तत्त्व रेडियोसक्रियता दर्शाते हैं, उदाहरण यूरेनियम, थोरियम, प्लूटोनियम, नेपच्यूनियम पोलोनियम आदि।

–  हल्के नाभिकों पर तेज गति के न्यूट्रॉन टकराने पर वे रेडियो सक्रियता दर्शाते हैं इसे कृत्रिम रेडियोसक्रियता कहते हैं।

रेडियो सक्रियता के मात्रक:-

          1 बैकुरल = 1 विघटन/सेकण्ड

          1 रदरफोर्ड = 106 विघटन/सेकण्ड

          1 क्यूरी = 3.7 × 1010 विघटन/सेकण्ड

अर्द्ध आयु (Half life):-

– वह समय जिसमें सक्रिय नाभिकों की संख्या आधी रह जाती है, अर्द्ध आयु कहलाती है।

– रेडियम की अर्द्ध आयु 1950 वर्ष होती है।

– पोलोनियम की अर्द्ध आयु 10-4 सेकण्ड होती है।

 जैसे 100 ग्राम मात्रा का रेडियम 1950 वर्ष बाद 50 ग्राम रह जाता है।

रेडियोसक्रिय समस्थानिकों के उपयोग:-

चिकित्सा के क्षेत्र में:-

– आयोडीन-131 (I131) का उपयोग थायरॉइड कैन्सर के उपचार में किया जाता है।

– फॉस्फोरस-31 का उपयोग त्वचा संबंधी रोगों में किया जाता है।

– कोबाल्ट-60 का उपयोग रक्त कैन्सर में किया जाता है।

पुरातत्त्व में:-

–  C14 कार्बन डेटिंग पद्धति में (जीवाश्मों की आयु निर्धारित में)

–  K40 का उपयोग अंतरिक्ष पिण्डों की आयु ज्ञात करने में किया जाता है।

कृषि में:-

– CO60, P31 तथा AgI का उपयोग किया जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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