परमाणु एवं अणु

–        महर्षि कणाद के अनुसार प्रत्येक पदार्थ सरल एवं अपरिवर्तनीय कणों से बना है, ये कण परमाणु है।

–        परमाणु (Atom) जो कि ग्रीक भाषा के शब्द Atomio तथा लैटिन भाषा के शब्द Atomos से बना है जिसका अर्थ है अविभाज्य कण।

–        डॉल्टन के अनुसार प्रत्येक पदार्थ अविभाज्य कणों से बना है ये अविभाज्य कण परमाणु है।

डॉल्टन का परमाणुवाद:-

–        प्रत्येक पदार्थ छोटे-छोटे अविभाज्य कणों से बना होता है, ये अविभाज्य कण परमाणु कहलाते हैं।

–        एक ही तत्त्व के समस्त परमाणु गुणों में समान होते हैं। जैसे- रंग, आकार, रासायनिक क्रिया, द्रव्यमान आदि।

–        भिन्न-भिन्न तत्त्वों के परमाणुओं के गुण भिन्न-भिन्न होते हैं।

–        जब दो या अधिक परमाणु परस्पर संयोग करते हैं तो अणु अथवा यौगिक का निर्माण होता है।

–        परमाणु को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है।

डॉल्टन की परिकल्पना में संशोधन:-

–        परमाणु के अवपरमाणिक कण (इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन, प्रोटोन) की खोज से स्पष्ट हुआ कि परमाणु को विभाजित किया जा सकता है।

–        समस्थानिक के अस्तित्व के कारण एक ही तत्त्व के समस्त परमाणु गुणों में समान हो यह आवश्यक नहीं है।

समस्थानिक:-

–        ऐसे तत्त्व जिनके परमाणु क्रमांक तो समान हो परन्तु द्रव्यमान संख्या भिन्न-भिन्न हो, समस्थानिक कहलाते हैं। उदाहरण- हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक होते हैं, प्रोटियम (H), ड्यूटीरियम     (H), ट्राइटियम (H)

परमाणु की आधुनिक परिभाषा:-

–        परमाणु पदार्थ का वह सबसे छोटा कण है जो, रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेता है तथा स्वतंत्र अस्तित्व में नहीं रहता है।

          अपवाद- उत्कृष्ट गैसें रासायनिक अभिक्रिया में भाग

          नहीं लेती एवं स्वतंत्र अस्तित्व में पाई जाती है।

          उदाहरण- हीलियम, निऑन, ऑर्गन, रेडॉन आदि।

परमाणु के अवपरमाण्विक कण:-

–        परमाणु में मुख्य रूप से तीन अवपरमाण्विक कण

          पाए जाते हैं-

  1. इलेक्ट्रॉन
  2. प्रोटोन
  3. न्यूट्रॉन

–        इन मूल तत्त्वों के अतिरिक्त अन्य अवपरमाण्विक कण पॉजिट्रॉन, न्यूट्रिनो, एंटीन्यूट्रिनों, मेसॉन, इत्यादि पाए जाते हैं।

1. इलेक्ट्रॉन:-

–        इलेक्ट्रॉन के खोजकर्ता जे.जे. थॉमसन (टॉमसन) है।

–        यह ऋणावेशित प्रकृति के कण है।

–        इन पर आवेश का मान -1.6 × 10-19 कूलाम होता है।

–        इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान 9.1 × 10-31 Kg या 9.1 × 10-28 g होता है।

2. प्रोटोन:-

–        प्रोटोन के खोजकर्ता गोल्डस्टीन है।

–        इसकी प्रकृति धनावेशित होती है।

–        इसके आवेश का मान + 1.6 × 10-19 कूलाम होता है।

–        प्रोटोन का द्रव्यमान 1.67262 × 10-27 Kg होता है।

न्यूट्रॉन:-

–        न्यूट्रॉन के खोजकर्ता जेम्स चैडविक है।

–        न्यूट्रॉन उदासीन प्रकृति का कण है।

–        इसके आवेश का मान शून्य होता है।

–        न्यूट्रॉन का द्रव्यमान 1.67493 × 10-27 Kg होता है।

परमाणु के अन्य परमाण्विक कण:-

1. पॉजिट्रॉन:-

–        इसकी खोज एन्डरसन ने की थी।

–        इसकी प्रकृति धनावेशित है।

–        इसका आवेश एवं द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के समान होता है किन्तु इसकी प्रकृति धनात्मक होती है।

–        पॉजिट्रॉन को एंटीइलेक्ट्रॉन भी कहते हैं।

2. एंटीप्रोटोन:-

–        इसके खोजकर्ता सेगरे हैं।

–        ये एक ऋणावेशित कण है।

–        इसका आवेश व द्रव्यमान प्रोटोन के समान होता है।

3. मेसॉन:-

–        इसकी खोज युकावा ने की थी।

–        यह धनावेशित, ऋणावेशित या उदासीन प्रकृति का होता है।

–        इसका द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान का लगभग 200 गुणा होता है।

4. न्यूट्रिनो एवं एंटीन्यूट्रिनो:-

–        इसकी खोज पोलिंग ने की थी।

–        ये कण उदासीन होते हैं।

–        इनका द्रव्यमान नगण्य होता है किन्तु निश्चित नहीं होता है।

परमाणु क्रमांक:-

–        किसी परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटोनों की संख्या, परमाणु क्रमांक कहलाती है।

–        इसे Z से प्रदर्शित करते हैं।

–        वैद्युत उदासीन परमाणु में इलेक्ट्रॉन एवं प्रोटोन की संख्या समान होती है।

          परमाणु क्रमांक = प्रोटोनों की संख्या या इलेक्ट्रॉनों की संख्या

–        उदाहरण- सोडियम के नाभिक में प्रोटोन की संख्या 11 होती है अत: इसका परमाणु क्रमांक 11 है।

आयन:-

–        किसी उदासीन परमाणु द्वारा इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने या त्यागने पर प्राप्त आवेशित स्पीशीज, आयन कहलाती है या आवेशित कण आयन कहलाते हैं।

–        आयन दो प्रकार के होते हैं-

1. धनायन:-

–        परमाणु द्वारा इलेक्ट्रॉन त्यागने पर प्राप्त स्पीशीज धनायन होते हैं। उदाहरण- Li+, Na+, Zn+2, Al+3 आदि।

–        धनायन में उपस्थित आवेश यह दर्शाता है परमाणु द्वारा कितने इलेक्ट्रॉन का त्याग किया गया है।

2. ऋणायन:-

–        वह परमाणु जो इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं, ऋणायन का निर्माण करते हैं अर्थात् ऋणावेशित कण या स्पीशीज ऋणायन है। उदाहरण- F, Cl, O2-, N3- आदि।

–        विशेष:- आयनों का निर्माण, परमाणु द्वारा अष्टक पूर्ण करने के लिए किया जाता है।

 

द्रव्यमान संख्या या परमाणु द्रव्यमान:-

–        किसी परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटोनों की संख्या एवं न्यूट्रॉनों की संख्या का योग, द्रव्यमान संख्या कहलाता है।

          द्रव्यमान संख्या = प्रोटोनों की संख्या + न्यूट्रॉनों की संख्या

–        द्रव्यमान संख्या को A से दर्शाते हैं।

          A = P + n

–        न्यूट्रॉनों की संख्या (n) = A-P

परमाणु का संकेतन:-

–        परमाणु को X से, परमाणु क्रमांक को Z से तथा परमाणु द्रव्यमान को A से निरूपित किया जाता है।

–        परमाणु का प्रतीकात्मक रूप = X

परमाणु की संरचना:-

थॉमसन का परमाणु मॉडल:-

–        सर्वप्रथम दिया गया परमाणु मॉडल थॉमसन का परमाणु मॉडल था, इसे प्लम-पुडिंग या रेजिन-पुडिंग मॉडल के नाम से भी जाना जाता है।

–        भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस मॉडल को तरबूज मॉडल कहते हैं। जिसके अन्तर्गत परमाणु धनावेशित गोला है जिसमें समान रूप से ऋणावेश वितरीत रहते हैं अर्थात् परमाणु वैद्युत रूप से उदासीन होता है।

थॉमसन के मॉडल की कमियाँ:-

–        यह मॉडल रेखीय स्पेक्ट्रम की व्याख्या नहीं कर सका।

–        रदरफोर्ड के प्रकीर्णन प्रयोग की व्याख्या नहीं कर सका।

रदरफोर्ड का स्वर्ण पत्र प्रयोग:-

–        इसे एल्फा प्रकीर्णन प्रयोग भी कहा जाता है।

–        रदरफोर्ड के सहयोगी गीगर तथा मार्सडेन थे।

–        स्वर्ण पत्र की मोटाई 10-7 मीटर थी।

–        रदरफोर्ड ने स्वर्ण पत्र को ही चुना क्योंकि सोने की आघातवर्धनीयता अधिक होती है अर्थात् सोने की पतली सीट बनाई जा सकती है।

–        उसने एल्फा कण के रूप में हीलियम का उपयोग किया क्योंकि हीलियम सबसे हल्की उत्कृष्ट गैस है।

रदरफोर्ड के प्रेक्षण:-

        अधिकांश एल्फा कण सोने की परत को चीरते हुए सीधे निकल गए।

 

–        कुछ एल्फा कण q कोण से विचलित हुए।

–        लगभग 20000 कणों में से एक एल्फा कण पुन: अपने पथ पर लौट आता है।

एल्फा कण प्रकीर्णन प्रयोग के निष्कर्ष:-

        अधिकांश एल्फा कण सीधे निकल गए क्योंकि परमाणु का अधिकांश भाग खाली होता है।

–        कुछ कणों का विक्षेपण प्रतिकर्षण के कारण हुआ अर्थात् परमाणु संपूर्ण धनावेश संकेन्द्रित होता है। इस संपूर्ण धनावेश वाले भाग को नाभिक कहते हैं।

–        इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों तरफ वृताकार पथ में चक्कर लगाते हैं, इन वृताकार पथों को कक्षा या कक्षक कहा जाता है।

रदरफोर्ड मॉडल की कमियाँ:-

        यह परमाणु मॉडल परमाणु के स्थायित्व की व्याख्या नहीं कर सका, क्योंकि मैक्सवेल की तरंग समीकरण से यदि इलेक्ट्रॉन सर्पिल पथ में गति करता है तो ऊर्जा क्षय के आधार पर अंत में इलेक्ट्रॉन नाभिक में गिर जाएगा एवं परमाणु नष्ट हो जाएगा।

–        रदरफोर्ड का मॉडल रेखीय स्पैक्ट्रम की व्याख्या नहीं कर सका।        

बोहर का परमाणु मॉडल

–        रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल में संशोधन करके बोहर ने परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया

–        बोहर के परमाणु मॉडल के विकास में 2 महत्त्वपूर्ण बिंदु-

1.      विद्युत चुम्बकीय विकिरण का व्यवहार द्वैत प्रकृति का होता है अर्थात विद्युत चुम्बकीय तरंग की प्रकृति कणीय एवं तरंग दोनों प्रकार की होती है।

2.      परमाणु में इलेक्ट्रॉनिक ऊर्जा स्तर क्वांटीकृत होता है।

विद्युत चुम्बकीय विकिरण की तरंग प्रकृति:-

–        जेम्स मैक्सवेल ने सर्वप्रथम आवेंशित पिण्डों के मध्य अन्योन्य क्रियाएँ करवाई एवं स्थूल स्तर पर विद्युत एवं चुम्बकीय क्षेत्रों की व्याख्या की।

–        जब विद्युत आवेशित कणों की त्वरित गति कराते हैं तो एकांतरित विद्युत एवं चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होते हैं यह क्षेत्र तरंगीय रूप में होते हैं, इन्हें ही विद्युत चुम्बकीय विकिरण कहते हैं।

–        प्रकाश भी विकिरण के रूप में होता है किंतु पूर्व में न्यूटन ने प्रकाश की कणीय प्रकृति बताई, न्यूटन ने बताया कि प्रकाश, कणों के रूप में संचरित होता है इन कणों को क्वाण्टा या फोटोन कहते हैं।

–        सर्वप्रथम मैक्सवेल ने प्रकाश की तरंग प्रकृति बताई अर्थात् प्रकाश तरंगों का दोलायमान विद्युत एवं चुम्बकीय तरंगों से संबंधित है।

–        विद्युत चुम्बकीय तरंग जटिल प्रकृति की होती है।

विद्युत चुम्बकीय विकिरणों के गुण

–        दोलायमान आवेशित कणों द्वारा उत्पन्न विद्युत विकिरण एवं चुम्बकीय विकिरण परस्पर लम्बवत होती है तथा इनके संचरण की दिशा भी लम्बवत होती है।

–        इन्हें संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है अर्थात ये निर्वात में भी गति कर सकती है।

–        विद्युत चुम्बकीय तरंगें भिन्न-भिन्न प्रकृति की होती है इनके आवृति एवं तरंगदैर्ध्य भी अलग-अलग होते हैं।

–        विद्युत चुम्बकीय तरंग आवृति, तरंगदैर्ध्य, विकिरण की चाल, तरंग संख्या एवं आयाम दर्शाते हैं

1.      आवृति:-

        किसी एक निश्चित बिंदु से प्रति सेकण्ड गुजरने वाली तरंगों की संख्या, आवृति कहलाती है।

          आवृति = 1समय 

          आवृति का मात्रक 1सेकण्ड या सेकण्ड-1 या हर्टज होता है

2.      तरंगदैर्ध्य:-

–        दो समीपस्थ श्रृंगों अथवा गर्तो के मध्य की दूरी तरंगदैर्ध्य कहलाती है।

–        तरंगदैर्ध्य का मात्रक मीटर या सेंटीमीटर या A° होता है।

–        1 A° = 10-10 मीटर या 10-8 सेंटीमीटर होता है।

प्रकाश की चाल:-

–        निर्वात में सभी प्रकार की विद्युत चुम्बकीय तरंगे, एक समान गति दर्शाती है। जो प्रकाश की चाल के समान है, प्रकाश की चाल को C से दर्शाते हैं एवं इसका मान 3×108 मीटर प्रति सेकण्ड होता है।

 

 

3. आयाम:-

–        किसी श्रृंग की अधिकतम ऊँचाई या गर्त की अधिकतम गहराई, आयाम है।

–        इसे a दर्शाते हैं।

–        आयाम एक दूरी है।

–        इसका मात्रक मीटर या सेन्टीमीटर या Ao होता है।

4. तरंग संख्या:-

–        प्रति इकाई लम्बाई में स्थित तरंगदैर्ध्यों की संख्या तरंग संख्या कहलाती है।

          तरंग संख्या = 1तरंगदैर्ध्य        

–        तरंग संख्या का मात्रक 1मीटर या मीटर-1 या सेन्टीमीटर-1

प्लांक का क्वाण्टम सिद्धान्त:-

–        परमाणु या अणु ऊर्जा का अवशोषण या उत्सर्जन विविक्त (Discrete) रूप में करते हैं, सतत् रूप में नहीं करते हैं।

–        विकिरण की क्वाण्टम ऊर्जा उसकी आवृत्ति के समानुपाती होती है।

          E

          E = h

          h = प्लांक स्थिरांक इसका मान 6.626 × 10-34 Js होता है।

–        क्वाण्टम, विद्युत चुम्बकीय विकिरण के रूप में उत्सर्जित या अवशोषित न्यूनतम ऊर्जा होती है।

विद्युत चुम्बकीय विकिरण की द्वैत प्रकृति:-

–        किसी सूक्ष्म कण की ऊर्जा E = h       (समीकरण-1)

–        कणीय प्रकृति के आइन्स्टीन के द्रव्यमान – ऊर्जा समीकरण से E = mc2 (समीकरण-2)

          समीकरण 1 व 2 से

          h = mc2

           =

             h = mc2 

          = mc

          कणीय प्रकृति में चाल को v से दर्शाया जाता है।

          c = v

           = mv

          संवेग = द्रव्यमान × वेग

          = P

          P = 

             P = कणीय प्रकृति

          = तरंगीय प्रकृति

जीमान प्रभाव:-

–        चुम्बकीय क्षेत्र के प्रभाव में स्पेक्ट्रमी रेखाओं का विपाटन, जीमान प्रभाव कहलाता है।

स्टार्क प्रभाव:-

–        विद्युत क्षेत्र के प्रभाव में स्पेक्ट्रमी रेखाओं का विपाटन, स्टार्क प्रभाव कहलाता है।

डी ब्रोग्ली सिद्धान्त:-

–        सन् 1920 में डी ब्रोग्ली ने बताया कि द्रव्य भी प्रकाश के समान द्वैत प्रकृति दर्शाता है।

–        जब द्रव्य द्वैत प्रकृति दर्शाता है इसका अर्थ है कि द्रव्य के सूक्ष्म कण जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटोन आदि की कणीय एवं तरंगीय दोनों प्रकार की प्रकृति होती है।

–        द्रव्य के छोटे-छोटे कण तरंग के रूप में बहते हैं तथा तरंग का तरंगदैर्ध्य कण के संवेग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

           

              =

          h = प्लांक स्थिरांक

          संवेग = द्रव्यमान × वेग

          P = mv

          =

          यहाँ h व v को नियत करने पर,

         

             अर्थात् अधिक द्रव्यमान वाले कणों पर तरंग गुण लागू नहीं होता।

डी ब्रोग्ली संबंध की व्युत्पत्ति:-

–        प्लांक की ऊर्ज समीकण E = h       (समीकरण-1)

–        आइन्स्टीन के द्रव्यमान – ऊर्जा समीकरण से E = mc2 (समीकरण-2)

          समीकरण 1 व 2 से

          E = E

          h = mc2

           =

          h = mc2 

          = mc

          h = mc

          =

          कण का वेग v रखने पर

          c = v

          =

              =

हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धान्त:-

–        किसी निश्चित क्षण पर किसी कण के लिए स्थिति एवं संवेग का यथार्थ मापन संभव नहीं है।

–        यदि स्थिति में अनिश्चितता =  x

–        संवेग में अनिश्चितता = P

 

 

          x. P  

              x तथा P का गुणनफल प्लांक स्थिरांक की कोटि का होता है।

          P = mv

          x .mv  

          x 

             v =  

बोहर का परमाणु मॉडल:-

–        परमाणु का सम्पूर्ण धनावेश उसके नाभिक में केन्द्रित होता है।

–        बोहर के अनुसार इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों स्थायी वृत्ताकार पथों में चक्कर लगाते हैं। इन पथों की ऊर्जा निश्चित एवं भिन्न-भिन्न होती है।

–        इन स्थायी वृत्ताकार पथों को ऊर्जा स्तर या कक्षा अथवा कोश कहा जाता है।

–        इन ऊर्जा स्रोतों को K, L, M, N या 1, 2, 3, 4 से दर्शाते हैं।

–        जैसे-जैसे नाभिक से दूर जाते हैं, वैसे-वैसे कक्षा की ऊर्जा में वृद्धि होती है अर्थात् सबसे कम ऊर्जा प्रथम कक्षा K की होती है।

–        जब निम्न ऊर्जा स्तर में उपस्थित इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का अवशोषण करता है वह उच्च ऊर्जा स्तर में चला जाता है।

–        जब उच्च ऊर्जा स्तर में उपस्थित इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का उत्सर्जन करता है तो वह निम्न ऊर्जा स्तर में चला जाता है।

–        बोहर ने प्रत्येक कक्षा में अधिकतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या निश्चित की थी उसके अनुसार प्रत्येक कक्षा में अधिकतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या 2n2 होती है। जैसे- n = 3 में इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 2(3)2 अर्थात् 18 होती है।

–        बोहर के अनुसार इलेक्ट्रॉन केवल उन्हीं कक्षाओं में चक्कर लगाता है जिनका कोणीय संवेग का पूर्ण गुणज हो।

          कोणीय संवेग, mvr =

             m = इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान

          v = इलेक्ट्रॉन का वेग

          r = कक्षा की त्रिज्या

          h = प्लांक स्थिरांक

          n = कक्षा की संख्या

बोहर के परमाणु मॉडल की कमियाँ:-

–        बोहर का परमाणु मॉडल एक से अधिक इलेक्ट्रॉनयुक्त स्पीशीज पर लागू नहीं होता।

–        स्पेक्ट्रमी रेखाओं की सूक्ष्म संरचना में उपस्थित दिक् रेखाओं की व्याख्या नहीं कर सका।

–        जीमान प्रभाव और स्टार्क प्रभाव की भी व्याख्या नहीं कर सका।

–        बोहर अपने परमाणु मॉडल के द्वारा परमाणुओं के रासायनिक बंधन से निर्मित अणुओं के निर्माण की व्याख्या नहीं कर सका।

 

क्वाण्टम संख्याएँ:-

–        किसी परमाणु के इलेक्ट्रॉन की स्थिति, कक्षक का आकार, कक्षक की ऊर्जा, कक्षक का अभिविन्यास, कक्षक की स्थिति तथा चक्रण दर्शाने वाली आवश्यक संख्याएँ क्वाण्टम संख्याएँ कहलाती है।

–        क्वाण्टम संख्याएँ चार प्रकार की होती है-

1. मुख्य क्वाण्टम संख्या:-

–        इस संख्या को बोहर ने बताया था।

–        यह संख्या कोश या कक्ष या कक्षक को दर्शाती है एवं कक्षक का आकार और कक्षक की ऊर्जा को भी दर्शाती है।

–        मुख्य क्वाण्टम संख्या का मान 1 से प्रारंभ होकर किसी भी पूर्णांक तक हो सकता है।

–        मुख्य क्वाण्टम संख्या को n से दर्शाते हैं।

–        n का मान बढ़ने पर कक्षकों की संख्या बढ़ती है।

–        किसी कोश में कक्षकों की संख्या = n2

–        मुख्य क्वाण्टम संख्या का मान बढ़ने पर परमाणु का आकार बढ़ता है क्योंकि कोशों की संख्या बढ़ती है।

–        परमाणु का आकार बढ़ने पर या नाभिक से दूर जाने पर ऊर्जा का मान बढ़ता है तथा परमाणु का स्थायित्व घटता है।

2. द्विगंशी क्वाण्टम संख्या:-

–        इस संख्या के बारें में सोमरफील्ड ने बताया।

–        यह संख्या उपकोश को दर्शाती है तथा बहुइलेक्ट्रॉनी स्पीशीज की ऊर्जा को भी दर्शाती है।

–        यह संख्या कक्षक के त्रिविमीय आकृति को दर्शाती है।

–        द्विगंशी क्वाण्टम संख्या को l से दर्शाते हैं।

–        l का मान 0……….(n-1) होता है।

–        l का मान न तो n के बराबर होता है न ही n से बड़ा होता है।

–        इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा कक्षक कोणीय संवेग पर निर्भर करती है।

–        कक्षक, कोणीय संवेग, द्विगंशी क्वाण्टम संख्या पर निर्भर करता है।

          कक्षक कोणीय संवेग =  

–        S कक्षक के लिए कक्षक कोणीय संवेग का मान शून्य होता है क्योंकि S के लिए l = 0

 

3. चुम्बकीय क्वाण्टम संख्या:-

–        इस संख्या के बारें में लेन्डे ने बताया।

–        यह संख्या किसी उपकोश से संबंधित कक्षकों की संख्या का निर्धारण करती है।

–        यह संख्या कक्षक के त्रिविम अभिविन्यास को दर्शाती है।

अभिविन्यास:-

–        जब परमाणु को बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में रखते हैं तो गतिशील इलेक्ट्रॉनों के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र एवं बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र के मध्य अन्योन्य क्रिया से परमाणु में उपस्थित उपकोश अनेक भागों में विभाजित हो जाते हैं, इसे अभिविन्यास कहा जाता है।

चक्रण क्वाण्टम संख्या:-

–        इस संख्या के बारें में उलहैनबैक तथा गाउटश्मिट ने बताया।

–        यह संख्या इलेक्ट्रॉन के चक्रण को बताती है।

–        नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन उसी प्रकार चक्रण करते हैं जैसे विभिन्न ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्रण करते हैं।

–        चक्रण क्वाण्टम संख्या को S से दर्शाते हैं।

          चक्रण कोणीय संवेग =

–        चक्रण क्वाण्टम संख्या के दो मान +  तथा – होते हैं।

–        दक्षिणावर्त चक्रण + तथा वामावर्त चक्रण –  होते हैं।

परमाण्वीय कक्षकों की आकृतियाँ:-

कक्षक:-

–        परमाणु में नाभिक के चारों ओर का वह स्थान जहाँ इलेक्ट्रॉनों के पाए जाने की प्रायिकता अधिकतम हो, कक्षक कहलाते हैं।

नोडल सतह या नोड:-

–        वह क्षेत्र जहाँ इलेक्ट्रॉन घनत्व शून्य हो, नोडल सतह कहलाती है अथवा वह क्षेत्र जहाँ इलेक्ट्रॉन के पाए जाने की प्रायिकता शून्य या न के बराबर हो, नोडल सतह कहलाती है।

 

 

S कक्षक की आकृति:-

–        S कक्षक की आकृति गोलाकार होती है।

–        यह आकृति अदिशात्मक परन्तु सम्मित होती है।

–        S कक्ष में नोडल तल शून्य होते हैं।

–        गोलीय एवं सम्मित आकृति होने के कारण प्रत्येक स्थान पर इलेक्ट्रॉन के पाए जाने की संभावना अधिकतम होती है।

P कक्षक की आकृति:-

–        P कक्षक की आकृति डम्बलाकार होती है एवं P कक्षक तीन भागों में विभक्त होता है, Px, Py, Pz

–        P कक्षक दिशात्मक होते हैं एवं प्रत्येक P कक्षक के दो भाग होते हैं।

–        प्रत्येक भाग को पालि कहा जाता है।

–        इन दो पालियों में इलेक्ट्रॉन के पाए जाने की संभावना समान होती है, ये पालियाँ नाभिक से गुजरने वाले तल के दोनों ओर स्थित होती है।

–        जहाँ ये पालियाँ परस्पर मिलती है, वहाँ इलेक्ट्रॉन घनत्व शून्य होता है।

 
 

 

 

 

–        Px कक्षक के लिए नोडल तल yz होते हैं।

–        Py कक्षक के लिए नोडल तल xz होते हैं।

–        Pz कक्षक के लिए नोडल तल xy होते हैं।

–        P उपकोश में तीन कक्षक Px, Py, Pz हैं। इन तीनों कक्षकों की सम्मिति अक्ष भिन्न-भिन्न है किन्तु ऊर्जा समान होती है।

–        P कक्षक परस्पर लम्बवत् होते हैं।

d कक्षक की आकृति:-

        d कक्षक के लिए l का मान 2 होता है तथा n का न्यूनतम मान 3 होता है।

–        l के मान 2, -1, 0,1, 2 होते हैं।

–        d उपकोश में 5 कक्षक होते हैं dxy, dyz, dxz, dx2y2 तथा dz2

–        यह पाँच कक्षक समभ्रंश होते हैं अर्थात् इनकी ऊर्जा समान होती है।

–        D कक्षकों की आकृति द्विडम्बलाकार होती है।

तत्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:-

        तत्व के इलेक्ट्रॉनों को उपकोशों के ऊर्जा के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करना इलेक्ट्रॉनिक विन्यास कहलाता है।

          कक्षकों की ऊर्जा का क्रम-

1S < 2S = 2P < 3S < 3P < 3d = 4S

कक्षकों में इलेक्ट्रॉन भरने का नियम:-

–        कक्षकों की ऊर्जा एवं स्थायित्व का ध्यान रखते हुए, कक्षकों में इलेक्ट्रॉन भरने के लिए कई नियम दिए गए-

आफबौ (आफबाऊ) का नियम:-

–        आफबौ एक जर्मन शब्द है जिसका अर्थ है कक्षकों में इलेक्ट्रॉन भरना या कक्षकों का निर्माण करना।

–        विभिन्न परमाणुओं के विभिन्न कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों को कक्षकों की बढ़ती ऊर्जा क्रम में व्यवस्थित करते हैं या परमाणु में भिन्न-भिन्न कक्षकों को उनकी ऊर्जा के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करते हैं।

1.      पाउली का अपवर्जन का नियम:-

        किसी परमाणु में उपस्थित दो इलेक्ट्रॉनों के लिए चारों क्वाण्टम संख्याएँ समान नहीं होती हैं अथवा एक कक्षक में अधिकतम विपरीत चक्रण वाले दो इलेक्ट्रॉन, प्रथम इलेक्ट्रॉन के लिए चक्रण क्वाण्टम संख्या + तथा द्वितीय के लिए – है।     

           यदि इस कक्षक के लिए n=3 हों तो l का अधिकतम मान 2 एवं m का अधिकतम मान 2 होगा।

           पाउली के अपवर्जन के नियमानुसार s उपकोश में अधिकतम 2 इलेक्ट्रॉन, p में 6, d में 10 एवं f में 14 इलेक्ट्रॉन होते हैं।

2.        हुण्ड की अधिकतम बहुलकता का नियम:-

–        हुण्ड के नियमानुसार, किसी भी कक्षक में इलेक्ट्रॉन का युग्मन तब तक नहीं हो सकता जब तक कि उपकोश के प्रत्येक कक्षक में समान चक्रण वाला एक-एक इलेक्ट्रॉन न भर जाए। उदाहरण- ऑक्सीजन का परमाणु क्रमांक 8 होता है।

          1S2 2S2 2P4

–        हुण्ड का नियम S उपकोश पर लागू नहीं होता क्योंकि S उपकोश में एक ही कक्षक है।

3. (n+l) का नियम या बोरबरी का नियम:-

–        इस नियम के अनुसार इलेक्ट्रॉन पहले उस कक्षक में प्रवेश करता है जिसमें (n+l) का मान कम हो या इलेक्ट्रॉन को कक्षकों में भरने का क्रम (n+l) के बढ़ते क्रम में होता है। उदाहरण-

          n = 3

          l = 1

          n+l = 3+1

          n+l = 4

          तथा

          n = 3

          l = 2

          n+l = 5

          अत: यहाँ इलेक्ट्रॉन पहले n+l = 4 में भरे जाएँगे।

          यदि n = 4 एवं l = 3  हो तो n+l = 7 होगा, यदि n = 5 एवं l = 2 हो तो भी n+l = 7 होगा। इस स्थिति में इलेक्ट्रॉन पहले उस कक्षक में प्रवेश करेगा जहाँ n का मान कम हो।

4. अर्द्धपूरित एवं पूर्णपूरित कक्षकों के स्थायित्व का

नियम:-

–        अर्द्धपूरित कक्षक (P3, d5, f7 विन्यास) एवं पूर्णपूरित (P6, d10, f14 विन्यास) कक्षक अन्य कक्षकों की तुलना में अधिक स्थायी होते हैं इसी कारण क्रोमियम का विन्यास

          24Cr का विन्यास

          1S2 2S2 2P6 3S2 3P6 4S2 3d4 न होकर

          1S2 2S2 2P6 3S2 3P6 4S1 3d5 होता है।

          स्थायित्व को बनाए रखने के लिए समान ऊर्जा वाले कक्षक से इलेक्ट्रॉन का स्थानांतरण हो जाता है।

आयनों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:-

–        धनायन का विन्यास लिखने के लिए पहले उदासीन परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखते हैं फिर धनावेश के बराबर इलेक्ट्रॉन निकाल देते हैं। उदाहरण-

          13Al3+ = 1S2 2S2 2P6 3S0 3P0

          इसी प्रकार ऋणायन का विन्यास लिखने के लिए पहले उदासीन तत्त्व का विन्यास लिखते हैं तत्पश्चात् ऋणावेश के समान और इलेक्ट्रॉन भर देते हैं। उदाहरण-

          Cl = 1S2 2S2 2P6 3S2 3P6                  

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास का महत्त्व:-

–           तत्त्वों के रासायनिक व्यवहार जैसे परमाणुओं से अणु या यौगिक के निर्माण की व्याख्या संभव होती है।

–           इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर तत्त्व के धात्विक व अधात्विक गुणों की व्याख्या संभव है।

–           इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर तत्त्वों की क्रियाशीलता की व्याख्या संभव है।

समभारिक:-

–           समान द्रव्यमान एवं भिन्न-भिन्न परमाणु क्रमांक वाले परमाणु, समभारिक कहलाते हैं। उदाहरण- Ar तथा Ca आपस में समभारिक है।

समइलेक्ट्रॉनिक:-

–           ऐसे स्पीशीज जिनमें इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान हो, समइलेक्ट्रॉनिक कहलाते हैं।

            Na+ में e = 11-1 = 10

            Mg2+ में e = 12-2 = 10

            Al3+ में e = 13-3 = 10

            उपर्युक्त तत्त्व आपस में समइलेक्ट्रॉनिक ह

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