प्रकाश

प्रकाश ऊर्जा का वह रूप है, जो हमें वस्तुओं को देखने में मदद करता है।

प्रकाश एक प्रकार की विकिरण ऊर्जा है, जो अन्य ऊर्जाओं की तरह नजर नहीं आती। अत: हम केवल उन वस्तुओं को ही देख पाते है, जिन पर प्रकाश ऊर्जा पड़ती है।

विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम का वह भाग, जिसके लिए मानव नेत्र संवेदी होते हैं, दृश्य प्रकाश कहलाता है।

ये विद्युत चुम्बकीय तरंगों में एक स्थान से दूसरे स्थान तक गति करता है।

इन दृश्य प्रकाश तरंगों की तरंगदैर्ध्य लगभग 3800 Ao – 7600 Ao होती है।

प्रकाश की गति के दौरान इसकी गति की दिशा के लम्बवत् विद्युत एवं चुम्बकीय घटक पाए जाते हैं।

प्रकाश की प्रकृति के बारे में सर्वप्रथम ‘डेकार्ट’ ने बताया कि ‘प्रकाश छोटी-छोटी द्रव्यमान विहीन कणिकाओं से मिलकर बना होता है’।

डेकार्ट के बाद ‘न्यूटन’ ने भी प्रकाश को द्रव्यमान विहीन कणिकाओं से मिलकर बना माना तथा इसे सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया, जिसे ‘प्रकाश का कणिका सिद्धांत (Particle theory of light)’ कहा गया।

यंग तथा हाइगेन्स जैसे वैज्ञानिकों ने माना प्रकाश तरंगों के रूप में पाया जाता है, इसे प्रकाश का तरंग सिद्धांत (Wave theory of light) कहा गया।

दोनों ही सिद्धांत सही थे लेकिन प्रकाश अलग-अलग परिघटनाओं के दौरान कभी तरंग के  समान तो कभी कण के समान व्यवहार करता है, इसे ही प्रकाश की द्वैत प्रकृति (Dual Nature of light) कहा गया।   

 

प्रकाश का तरंग के रूप में व्यवहार

प्रकाश का कण के रूप में व्यवहार

(1)

परावर्तन

(1)

प्रकाश विद्युत प्रभाव

(2)

अपवर्तन

(2)

कॉम्पटन प्रभाव

(3)

ध्रुवण

(3)

छाया का बनना।

(4)

व्यतिकरण

(5)

विवर्तन

     

प्रकाश तरंगों के गुण –

  • प्रकाश की चाल निर्वात में सर्वाधिक 3×108 m/s होती है।
  • विभिन्न माध्यमों में प्रकाश की चाल भी अलग-अलग होती है।
  • जिस माध्यम में प्रकाश की चाल अधिक हो, विरल माध्यम कहलाता है जबकि जिस माध्यम में प्रकाश की चाल कम हो, सघन माध्यम कहलाता है।
  • प्रकाश की चाल माध्यम के अपवर्तनांक पर निर्भर करती है।
  • जिस माध्यम का अपवर्तनांक जितना अधिक हो उसमें प्रकाश की चाल उतनी ही कम होती है।

  • प्रकाश सीधी रेखा में ही गति करता है, जब तक की उसके मार्ग में कोई अवरोधक न आए।

  • दृश्य श्वेत प्रकाश किरण 7 घटक रंगों से मिलकर बनी होती है। [VIBGYOR]
  • किसी वस्तु को देखने के लिए 2 शर्तें पूरी होना आवश्यक है –

(i) प्रकाश की उपस्थिति

(ii) प्रकाश तरंगों का वस्तु से टकराकर हमारी आँखों तक पहुँचाना।    

प्रकाश का परावर्तन  –

 

  • जब कोई प्रकाश किरण किसी माध्यम में गति करते हुए अपारदर्शक अवरोध (परावर्तक पृष्ठ) से टकराती है तो टकराने के बाद वह प्रकाश किरण उसी माध्यम में लौट जाती है, इसे प्रकाश का परावर्तन कहते है।
  • माध्यम में परिवर्तन न होने से परावर्तन के बाद प्रकाश की चाल अपरिवर्तित रहती है।
  • Note: समतल दर्पण प्रकाश का सबसे अच्छा परावर्तक होता है।

परावर्तन के नियम  –

प्रकाश का परावर्तन दो नियमों पर आधारित होता है-

(i) आपतित प्रकाश किरण (i), अभिलम्ब तथा परावर्तित किरण (r) तीनों एक ही तल में पाए जाते हैं।

(ii) आपतन कोण (\(\theta\) i) एवं परावर्तन कोण (\(\theta\)r) का मान सदैव बराबर होता है।           \(\theta i=\theta r\) 

प्रकाश के परावर्तन के प्रकार  –

(Type of Reflection of light)

  • प्रकाश का परावर्तन दो प्रकार का होता है।

(1) नियमित परावर्तन
(2) विसरित परावर्तन

(1)   नियमित परावर्तन (Regular Reflection)

 

  • समतल परावर्तक पृष्ठ से परावर्तन के बाद परावर्तित प्रकाश किरणें समान दिशा में ही गति करती है।
  • परावर्तित प्रकाश किरणें समान दिशा में ही गति करती है।
  • परावर्तित प्रकाश किरणों की तीव्रता में कमी नहीं आती है।  

(2)   विसरित परावर्तन (Diffused Reflection) –

  • खुरदरी पृष्ठ से परावर्तन के बाद परावर्तित प्रकाश किरणें अलग-अलग दिशाओं में विसरित अथवा फैल जाती है।
  • परावर्तित प्रकाश किरणों की तीव्रता में कमी नहीं आती है।       

Note :

  • सामान्यत: काँच अथवा पारदर्शी पदार्थ के पीछे वाले भाग पर परावर्तक आवरण (चाँदी या एल्युमिनियम) की परत लगाकर उन्हें दर्पण या परावर्तक पृष्ठ की तरह उपयोग में लिया जाता है।

समतल दर्पण में प्रतिबिम्ब का निर्माण

        

  • समतल काँच की पटि्टका की एक सतह पर सिल्वर नाइट्रेट (AgNo3) का लेपन करके इसे समतल दर्पण में बदला जा सकता है।          
  • समतल दर्पण में वस्तु का प्रतिबिम्ब सीधा आभासी एवं वस्तु के बराबर होता है।
  • समतल दर्पण से वस्तु जितनी दूरी पर होता है, दर्पण में प्रतिबिम्ब भी उतनी ही दूरी पर बनता है।
  • समतल दर्पण में अपना पूरा प्रतिबिम्ब देखने हेतु समतल दर्पण की ऊँचाई न्यूनतम व्यक्ति की लम्बाई की आधी होनी चाहिए।
  • सामने रखे दर्पण में पीठ के पीछे की ओर दीवार को

पूरा रखने हेतु दर्पण की न्यूनतम लम्बाई दीवार की एक तिहाई \(\frac{1}{3}\) होनी चाहिए।

  • यदि दो समतल दर्पण किसी कोण पर रखे हो तो उनके मध्य स्थिति वस्तु के एक से अधिक प्रतिबिम्ब बनते है, जिसकी संख्या दर्पणों के बीच कोण पर निर्भर करती है।
  • यदि वस्तु समतल दर्पण की ओर u वेग से गति करे तो प्रतिबिम्ब भी दर्पण के सापेक्ष वेग से गति करता है, लेकिन वस्तु के सापेक्ष प्रतिबिम्ब का वेग 2u  होता है।
  • समतल दर्पण के लिए वक्रता त्रिज्या (R) तथा फोकस दूरी का मान \(\infty\) होता है।
  • समतल दर्पण के लिए आवर्धन क्षमता का मान +1 होता है।
  • पनडुब्बियों में प्रयुक्त किए जाने वाले पेरिस्कोप में दो समतल दर्पण का प्रयोग किया जाता है जो कि तल के सापेक्ष एक समान कोण बनाते हुए समानान्तर स्थित होते हैं।
  • पेरिस्कोप परावर्तन के सिद्धांत पर कार्य करता है।

प्रकाश का अपवर्तन –

अपवर्तन का चित्र

  •  जब कोई प्रकाश किरण एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करती है, तो वह किरण अपने मूल पथ से विचलित हो जाती है, जिसे अपवर्तन कहा जाता है।
  • जब प्रकाश किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करती है, तो ये अभिलम्ब से दूर हट जाती है तथा विरल से सघन माध्यम में प्रवेश करने पर ये अभिलम्ब की ओर झुक जाती है।
  • अलग-अलग माध्यमों में प्रकाश का वेग भी अलग-अलग होता है, इसके कारण ही हमें अपवर्तन की परिघटना प्रतीत होती है।

अपवर्तन के नियम –

(1) आपतित प्रकाश किरण (i) अभिलम्ब (h) तथा अपवर्तित प्रकाश किरण (r) तीनों एक ही तल में होते हैं।

(2) स्नेल का नियम \(\frac{\sin \theta_{i}}{\sin \theta_{r}}=\mu\) (अपवर्तनांक) अर्थात् आपतन कोण की ज्या (sini) तथा अपवर्तन कोण की ज्या (sinr) का अनुपात किन्ही दो माध्यमों के लिए एक नियतांक होता है, जिसे दूसरे माध्यम का पहले माध्यम को सापेक्ष अपवर्तनांक कहते हैं।

अपवर्तनांक ( \(\mu\)) –

  • माध्यम का अपवर्तनांक इसकी सघनता को दर्शाता है, जिस माध्यम का अपवर्तनांक अधिक होता है, वह माध्यम उतना ही सघन होता है तथा ऐसे माध्यमों में प्रकाश की चाल भी कम होती है।
  • सघनता माध्यम में प्रकाश की चाल कम व विरल माध्यम में प्रकाश की चाल अधिक होती है।
  • अपवर्तनांक का क्रम –

\(\mu\) (काँच) > \(\mu\)  (जल) > \(\mu\)  (वायु)

अपवर्तनांक की निर्भरता –

(1) माध्यम पर –

\(\mu_s>\mu_1>\mu_g\) 

(2) माध्यम के तापमान पर –
\(\mu\)गर्मजल \(\mu\)ठंडजल

(3) प्रकाश के रंग पर –
\(\mu_v>\mu_R\) 

दैनिक जीवन में अपवर्तन –

(i) तारों का टिमटिमाते हुए प्रतीत होना।

(ii) जल में आधी डूबी हुई वस्तु का मुड़ा हुआ दिखाई देना।

(iii) पानी से भरी बाल्टी के पेंदे का ऊपर उठे हुए दिखाई देना।

(iv) सूर्योदय से पूर्व तथा सूर्यास्त के बाद भी कुछ समय तक सूर्य का दिखाई देना।

(v) लेंस से अपवर्तन की घटना

(vi) पानी से भरे काँच के ग्लास में रखा नीबू पार्श्व से देखने पर अपने वास्तविक आकार से बड़ा दिखाई पड़ता है।

कांच के आयताकार स्लैब से अपवर्तन

Note :-

  • किसी सघन माध्यम में वह विशेष आपतन कोण जिसके लिए विरल माध्यम में अपवर्तन कोण 900 हो, क्रांतिक कोण कहलाता है।
  • सघन माध्यम का अपवर्तनांक ज्यादा होने पर क्रांतिक कोण का मान कम होता है।
  • विरल माध्यम में विचलन कोण \(\rm{\theta_i-\theta_r}\) तथा सघन माध्यम में विचलन कोण \(\rm{\theta_i=\theta_r}\)  होता है।

पूर्ण आन्तरिक परावर्तन –

  • जब कोई प्रकाश किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करती है तथा आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से अधिक हो तो वह प्रकाश किरण पुन: उसी सघन माध्यम में लौट जाती है, जिसे प्रकाश का पूर्ण आन्तरिक परावर्तन कहते है।

पूर्ण आंतरिक के लिए आवश्यक दो शर्तें –

(i) प्रकाश का सघन से विरल माध्यम में प्रवेश करना। (सघन →विरल)

(ii) आपतन कोण का मान क्रांतिक \(\rm{(\theta i)}\) कोण \(\rm{(\theta c)}\)  से अधिक \(\rm{(\theta i>\theta c)}\)

 

Example :

  • हीरे का चमकना
  • गर्म प्रदेशों में गर्मी के मौसम में सड़क पर जल का आभास होना (मृग मरीचिका कहा जाता है)
  • किसी काँच में दरार पड़ने पर दरार का अधिक चमकदार  दिखाई   देना।
  • प्रकाशिक तन्तु में

मरीचिका –

(1) रेगिस्तान की मरीचिका –

(2) ठंडे प्रदेशों में मरीचिका – इटली के दक्षिणी किनारे पर एक गाँव ऐसा भी है, जहाँ के लोगों को अक्सर पास ही सिसली द्वीप में एक उलटा नगर बना हुआ नजर आता है, यह फैटा मोरगाना कहलाता है।

प्रकाशिक तन्तु (Optical Fibers) –

 

  • चिकित्सा, प्रकाशीय सिग्नल के संचरण, विद्युत सिग्नलों को भेजने व प्राप्त करने में प्रकाशिक तंतु का उपयोग किया जाता है।
  • प्रकाशिक तन्तु पूर्ण आंतरिक परावर्तन पर आाधारित है।
  • प्रकाशिक तन्तु का आविष्कार  नरिन्दर कृपानी ने  किया था।

प्रकाशिक तंतु के उदाहरण –

(i) जल में पड़ी हुई परखनली चमकीली दिखाई देना।

(ii) काँच में आयी दरारें चमकना।

(iii) कालिख से पुते हुए गोले का जल में चमकना।

प्रकाश का वर्ण विक्षेपण –

 

  • जब श्वेत प्रकाश किरण को प्रिज्म से गुजारा जाता है तो ये श्वेत प्रकाश किरण अपने 7 घटक रंगों में विभक्त हो जाती है, जिसे प्रकाश का वर्ण विक्षेपण कहते है।
  • 7 घटक रंग – VIBGYOR (नीचे से ऊपर की ओर रंगों का क्रम)
  • लाल रंग की तंरगदैर्ध्य तथा वेग सर्वाधिक होता है।
    \(\lambda_R>\lambda_V\)
  • बैंगनी रंग के प्रकाश की तरंगदैर्ध्य तथा वेग सबसे कम होता है।
  • प्रकाश के अलग-अलग रंगों के लिए माध्यम का अपवर्तनांक भी अलग-अलग होता है इसी कारण से हमें वर्ण विक्षेपण की परिघटना  दिखाई   देती है।
  • बैंगनी रंग का विचलन सर्वाधिक होता है।
    \((S v)=(U v-1) A\)
  • लाल रंग का विचलन सबसे कम होता है।
    \((S r)=(U r-1) A\)
  • प्रकाश के वर्ण विक्षेपण से दिखने वाले सात रंगों में माध्य रंग ‘पीला (Yellow)’ होता है।

कोणीय विक्षेपण – \((\theta)=S r-S r =(U v-U R) A \)  

प्रिज्म की वर्ण विक्षेपण क्षमता (w) =

Note :

  • प्रकाश की तरंगदैर्ध्य को ‘एंग्स्ट्रम’ में मापा जाता है।

लेंस (Lens) –

  • वह पारदर्शी माध्यम जिसकी कम से कम एक सतह वक्रित हो, लेंस कहलाता है।
  • लेंस दो प्रकार के होते हैं।

(i) उत्तल लेंस (convex)

(ii) अवतल लेंस (concave)

(1) उत्तल लेंस (convex lens) –

  • वह लेंस जो बाहर की ओर उभरे दो गोलीय पृष्ठों से घिरा हो, उत्तल लेंस कहलाता है।
  • यह किनारों की अपेक्षा बीच में मोटा होता है।  
  • यह प्रकाश किरणों को अभिसरित करता है अत: इसे अभिसारी लैंस भी कहते है।
  • उत्तल लेंस की फोकस दूरी धनात्मक होती है।
  • उत्तल लेंस की शक्ति (p) भी धनात्मक होती है।
  • उत्तल लेंस का उपयोग दूर दृष्टि दोष के निवारण में किया जाता है।
  • उत्तल लेंस से बनने वाला प्रतिबिम्ब वास्तविक होता है।

वस्तु की स्थिति

प्रतिबिम्ब की स्थिति

प्रतिबिंब की प्रकृति

∞ (अनंत पर)

F(फोकस बिंदु पर)

वस्तु से बहुत छोटा, उल्टा+वास्तविक

∞-2f के मध्य

F-2F के मध्य

वस्तु से छोटा, उल्टा+वास्तविक

2F पर

2F पर

वस्तु के बराबर, छोटा,उल्टा+वास्तविक

2F-F के मध्य

2F-∞ के मध्य

वस्तु से बड़ा, उल्टा+वास्तविक

F पर

वस्तु से बहुत बड़ा, उल्टा+वास्तविक

F एवं प्रकाशिक केन्द्र के मध्य

वस्तु की ओर ही, वस्तु के पीछे बनता है।

वस्तु से बड़ा, आभासी एवं सीधा

(2)    अवतल लेंस (concave lens) –

  • वह लेंस जो अन्दर की ओर वक्रित दो गोलीय पृष्ठों से घिरा हो, अवतल लेंस कहलाता है।
  • यह किनारों की अपेक्षा बीच में पतला होता हैं।
  • यह प्रकाश किरणों को अपसारित करता है अत: इसे अपसारी लेंस भी कहते है।
  • अवतल लेंस के लिए फोकस दूरी ऋणात्मक होती है।
  • अवतल लेंस के लिए शक्ति (P) भी ऋणात्मक होती है।
  • अवतल लेंस से बनने वाला प्रतिबिम्ब सदैव आभासी सीधा व छोटा होता है।
  • अवतल लेंस के लिए आवर्धन (m) का मान 1से कम होता है।
  • अवतल लेंस का उपयोग निकट दृष्टि दोष (Myopia) के निवारण में किया जाता है।

अवतल लेंस से प्रतिबिम्ब-

उत्तल दर्पण के उपयोग –

  • वाहनों के पश्च-दृश्य दर्पणों (Side View Mirrors) में
  • स्ट्रीट लेंप्स (Street lamps) में
  • ATM के दर्पण में
  • पहाड़ी क्षेत्रों में घुमावदार सड़कों के मोड़ पर

अवतल दर्पण के उपयोग –

  • शेविंग दर्पण में
  • दंत विशेषज्ञों तथा नाक-कान-गला रोग विशेषज्ञों द्वारा प्रयुक्त
  • सौर भट्‌टी
  • टार्च, सर्चलाइट तथा वाहनों के हेडलाइट्स में
  • सेटेलाइट डिश एन्टेना में
  • परावर्तक टेलिस्कोप में

Note :

  • शेविंग दर्पण की फोकस दूरी अधिक होनी चाहिए।
  • वाहन के अन्दर चालक के पास स्थित दर्पण, जिनका उपयोग चालक द्वारा वाहन के ठीक पीछे देखने में करता है, उसमें समतल दर्पण का उपयोग किया जाता है।

दृष्टिदोष एवं निवारण –

  • एक सामान्यत मनुष्य न्यूनतम 25 सेमी. से अधिकतम दूरी दूरी पर स्थित वस्तुओं को स्पष्ट देख पाता है। 
  • मनुष्य के नेत्र में द्विउत्तल लेंस (Bi Convex lens) पाया जाता है, जिससे नेत्र के रेटिना पर वस्तु का वास्तविक एवं उल्टा प्रतिबिम्ब बनता है।
  • मस्तिष्क की सहायता से वस्तुएँ हमें सीधी  दिखाई   देती हैं।
  • सबसे स्पष्ट प्रतिबिम्ब रेटिना के पीतबिन्दु (Yellow Spot) पर बनता है।                                   
  • यदि सामान्य दृष्टि सीमा (25 cm से अनंत) में मनुष्य किसी वस्तु को स्पष्ट न देख पाए तो इसे नेत्र दोष कहते है। जो इस प्रकार है-

(1)   दूर दृष्टि दोष (Hypermetropia/Long Sightedness)

  • इसमें वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना से दूर/पीछे बनता है, जिसमें निकट बिन्दु दूर चला जाता है। अत: पास की वस्तुएँ स्पष्ट नहीं  दिखाई   देती है।
  • इसमें फोकस दूरी बढ़ने पर लेंस की शक्ति कम हो जाती है।
  • इसके निवारण के लिए उत्तल लेंस से बने चश्में का प्रयोग किया जाता है।

 (2) निकट दृष्टि दोष (Myopia/Short Sightedness)

  • इसमें वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना से पहले बनता है।
  • इस दोष में दूर बिन्दु निकट आ जाता है, जिससे दूर की वस्तुएँ स्पष्ट नहीं दिखती है।
  • इसमें फोकस दूरी घटने पर लेंस की शक्ति बढ़ जाती है।
  • इसके निवारण के लिए अवतल लेंस का प्रयोग किया जाता है। 

(3)   जरा दूरदर्शिता (Press biopia)

  • उम्र बढ़ने के साथ-साथ नेत्र लेंस धीरे-धीरे चपटा होता है, जिससे निकट बिन्दु दूर चला जाता है एवं दूर बिन्दु पास आ जाता है, ऐसी स्थिति में निकट व दूर की वस्तुएँ दोनों ही स्पष्ट नहीं  दिखाई   देती है।
  • इसके निवारण हेतु उत्तल एवं अवतल लेंस के संयोजन से बने चश्में का प्रयोग करते है, जिसे द्विफोकसी लेंस (Bifocal lens) कहते है।
  • द्विफोकसी लेंस में उत्तल लेंस नीचे की ओर पढ़ने के लिए तथा ऊपर अवतल लेंस दूर देखने हेतु लगाते है।

(4)   अबिन्दुकता (Astigmation)

  • नेत्र गोलक एक समान रूप से गोल न होने के कारण वस्तुएँ क्षैतिज या उध्वार्धर तल में अथवा दोनों ही तल में विकृत  दिखाई   देती हैं।
  • इसके निवारण हेतु बेलनाकार लेंस (Cylindrical lens) का प्रयोग किया जाता है।

(5)   मोतियाबिन्द (Cataract)

  • नेत्र लेंस उम्र के साथ कम पारदर्शी होने लगता है, जिससे व्यक्ति को धुंधला  दिखाई   देने लगता है।
  • इसके निवारण हेतु लेंस का प्रत्यारोपण किया जाता है।   

(6)   वर्णान्धता (Colour-bindness)

  • ये आनुवांशिक रोग है।
  • इसमें x- गुणसूत्र पर विकृत जीन होने के कारण व्यक्ति रंगों में (लाल व हरे रंग) विभेद नहीं कर पाता है।
  • इसका उपचार संभव नहीं है।

लेंस सूत्र (Lens-Formula) –
\(\frac{1}{f}=\frac{1}{v}-\frac{1}{u}\)

  • इसमें लेंस दूरियाँ चिह्न (+,-) के साथ रखी जाती है।
  • इसमें प्रकाश की दिशा में दूरी धनात्मक व विपरीत दिशा में दूरी ऋणात्मक होती है।

         लेंस की शक्ति/क्षमता –

  • लेंस की शक्ति/क्षमता, फोकस दूरी का व्युत्क्रम होती है अर्थात् \(\rm{P=\frac{1}{f}}\)
  • इसका मात्रक डायोप्टर/ \(\rm{\frac{1}{meter}}\)  (मी)-1 /(सेमी)-1 होता है।
  • उत्तल लेंस की क्षमता धनात्मक तथा अवतल लेंस की क्षमता ऋणात्मक होती है।
  • 1 मीटर फोकस दूरी वाले लेंस की क्षमता 1 डायोप्टर होती है।
  • निम्न सूत्र द्वारा चश्में में लेंस की प्रकृति तथा उनकी फोकस दूरी/क्षमता ज्ञात कर सकते हैं –

       

विभिन्न माध्यमों में लेंस की क्षमता तथा प्रकृति में परिवर्तन –

(A)   1 < u माध्यम < u लेंस –

  • यदि लेंस को एक ऐसे द्रव में डुबोया जाए, जिसको अपवर्तनांक लेंस से कम हो, तो लेंस की फोकस दूरी बढ़ जाती है, परन्तु लेंस की प्रकृति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

(B)   u माध्यम = u लेंस –

  •  यदि लेंस को समान अपवर्तनांक द्रव में डूबोया जाए, तो लेंस की फोकस दूरी अनन्त होने पर उसकी क्षमता समाप्त हो जाती है अत: लेंस समतल प्लेट की तरह व्यवहार करता है।

(C)   u माध्यम > u लेंस –

  • यदि लेंस को उसके अधिक अपवर्तनांक वाले द्रव में डुबोया जाए तो लेंस की प्रकृति बदल जाती है अर्थात् उत्तल लेंस, अवतल लेंस की तरह तथा अवतल लेंस, उत्तल लेंस की तरह व्यवहार करेगा।  
  • यही कारण है, कि पानी में डूबा हुआ वायु का बुलबुला अवतल लेंस की तरह व्यवहार करने लगता है क्योंकि पानी का अपवर्तनांक वायु से अधिक होता है।

इन्द्रधनुष (Rainbow) –

  • वर्षा के बाद अनुकूल परिस्थितियों में आकाश में बनने वाली सात रंगों की चन्द्राकार आकृति को इन्द्रधनुष कहते है।
  • जब सूर्य का प्रकाश प्रेक्षक की पीठ के पीछे की दिशा से आ रहा हो तथा जल की बूँदे आँखों के सामने वायु में हो तब पूर्ण आंतरिक परावर्तन, वर्ण विक्षेपण तथा अपवर्तन की परिघटनाएँ होने से सामने की ओर इन्द्रधनुष एक साथ  दिखाई   देते हैं।

(1)   प्राथमिक इन्द्रधनुष –

दो बार अपवर्तन तथा 1 बार पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के फलस्वरूप प्राथमिक इन्द्रधनुष बनता है। 

  • सामान्य अवस्था में एकल रूप में, जिसके अन्दर की तरफ बेंगनी रंग  दिखाई   देता है। (कोण )

(2)   द्वितीयक इन्द्रधनुष –

  • दो बार अपवर्तन तथा दो बार पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के फलस्वरूप द्वितीयक इन्द्रधनुष का निर्माण होता है।
  • इसमें अन्दर की तरफ लाल तथा बाहरी चाप की तरह बैंगनी (कोण )  दिखाई   देता है।
  • ये प्राथमिक इन्द्रधनुष के ऊपर/बाहर की ओर बनता है।

प्रकाश का प्रकीर्णन –

  • जब प्रकाश किसी सघन माध्यम से गुजरता है तो माध्यम के कारण प्रकाश को अवशोषित कर अलग-अलग दिशाओं में फैला देते हैं, जिसे प्रकाश का प्रकीर्णन कहते है।
  • रैले ने बताया कि प्रकीर्णित प्रकाश की तीव्रता (प्रकीर्णन की मात्रा) प्रकाश की तरंगदैर्ध्य की चतुर्थ घात के व्युत्क्रमानुपाती होती है अर्थात् प्रकीर्णन की मात्र \(\alpha\frac{1}{\lambda^4}\)
  • प्रकाश का प्रकीर्णन तरंगदैर्ध्य पर निर्भर करता है अर्थात् जिस रंग में प्रकाश का तरंगदैर्ध्य  होता है, उसका प्रकीर्णन अधिक होता है।
  • बैंगनी रंग की तरंगदैर्ध्य सबसे कम होती है अत: इसका प्रकीर्णन सर्वाधिक होता है।
  • लाल रंग की तरंगदैर्ध्य सबसे ज्यादा होती है अत: इसका प्रकीर्णन सबसे कम होता है।

प्रकाश के प्रकीर्णन के उदाहरण –

(1) सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय आकाश का लाल नारंगी दिखाई   देना।

(2) दिन के समय आकाश का नीला दिखाई देना।

(3) समुन्द्र का नीला दिखाई देना।

(4) खतरे के निशान लाल रंग के बनना।

(5) बादलों का रंग सफेद  दिखाई   देना। (यह रैले नियम का पालन नहीं करता है क्योंकि इसमें \(\alpha>>\lambda\)  आकार की जल की सूक्ष्म बूंदे होती है।)

Note –  

  • वैज्ञानिक सी.वी. रमन तथा उसके सहयोगियों द्वारा 1920 ई. में अणुओं के द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन का गहन अध्ययन किया गया।

प्रकाशीय रंग

(1)   प्राथमिक रंग – लाल, हरा व नीला

(2)   द्वितीयक रंग – प्राथमिक रंगों के मिश्रण से बने रंग द्वितीयक रंग कहलाते है।

(1) हरा+लाल = पीला

(2) नीला+लाल = मैजेन्टा

(3) नीला+हरा = मोरपंखी नीला

(3)   पूरक रंग – दो रंग जो आपस में मिलकर श्वेत प्रकाश उत्पन्न करते है, पूरक रंग कहलाते हैं।

         (1) लाल+मैजेन्टा = सफेद

         (2) हरा+मैजेन्टा = सफेद

         (3) नीला+पीला=सफेद

         Note –

  • जब नीले तथा पीले रंग को मिश्रित किया जाता है, तो वह दूधिया हरा रंग बनाते है।

प्रकाश का व्यतिकरण (Interference of light) –

  • प्रकाश के व्यतिकरण को सर्वप्रथम थॉमस यंग ने समझाया था।
  • यंग के अनुसार जब समान आवृत्ति किन्तु अलग-अलग तीव्रता की प्रकाश तरंगें माध्यम में गति करते हुए एक दूसरे पर अध्यारोपित होती हैं तो कुछ बिन्दुओं पर परिणामी प्रकाश तरंग की तीव्रता बढ़ व घट जाती है, इसे प्रकाश का व्यतिकरण कहते है।
  • व्यतिकरण के लिए आवश्यक शर्त है कि प्रयुक्त प्रकाश स्त्रोत कला सम्बन्ध होने चाहिए।
  • व्यतिकरण दो तरग्रांग के अध्यारोपण का परिणाम है अर्थात् यह तरंगों के अध्यारोपण सिद्धांत पर आधारित है।
  • व्यतिकरण दो प्रकार का होता है –

(1) संपोषी व्यतिकरण (तीव्रता अधिक)

(2) विनाशी व्यतिकरण (तीव्रता कम)

  • संपोषी व्यतिकरण हेतु पथान्तर की शर्त \(\Delta=n\lambda\) तथा विनाशी व्यतिकरण हेतु पथान्तर की शर्त      

(1) \(\Delta=(2 n+1)-\frac{1}{2}\) होती है।

उदाहरण –

(1) साबुन के पानी में बुलबुले का रंगीन दिखाई देना।                    

(2) CD/DVD के एक भाग का रंगीन दिखाई देना।

(3) सड़क पर फैले तेल का रंगीन दिखाई देना।

ध्रुवण –

  • प्रकाश तरंगों की प्रकृति अनुप्रस्थ होती है अर्थात् संचरित हो रही प्रकाश तरंग से सम्बद्ध विद्युत क्षेत्र सदैव तरंग संचरण की दिशा के लम्बवत होता है।
  • जब प्रकाश किसी माध्यम में गति करता है तो, ये अनुप्रस्थ तरंगों के रूप में गति करता है, जिससे माध्यम के कण इसकी गति की दिशा के लम्बवत् अलग-अलग तलों में कम्पन्न करते है, यदि हम पोलेरॉइड (Polaroid) काँच या ग्लास का प्रयोग करे तो ये कम्पन एक ही तल में होने लगते है, ऐसा प्रकाश ध्रुवित प्रकाश कहलाता है तथा ये परिघटना ध्रुवण कहलाती है।
  • मैक्सवेल ने प्रकाश की विद्युत चुम्बकीय तरंग एवं अनुप्रस्थ प्रकृति के आधार पर ध्रुवण की व्याख्या की।
  • ध्रुवित प्रकाश की प्राप्ति हेतु नाइट्रोसेलुलोज तथा हरपेथाइट से बनी फिल्म का प्रयोग किया जाता है।
  • पोलेरॉइडों को धूप के चश्मों, खिड़कियों के शीशों आदि में तीव्रता नियमित करने में उपयोग किया जाता है।
  • फोटोग्राफी कैमरों एवं त्रिआयामी चलचित्र कैमरों में भी प्रयोग किया जाता है।
  • प्रकाश के इस गुण का उपयोग विलयनों की सान्द्रता ज्ञात करने में भी किया जाता है।   

विवर्तन (Diffraction) –

  • प्रकाश का किसी अवरोधक या द्वारक के किनारों के द्वारा मुड़कर उसके ज्यामितीय छायाछिद्र में प्रवेश करने की घटना को विवर्तन कहा जाता है।
  • प्रकाश का विवर्तन केवल तब ही प्रेक्षित होता है जब विवर्तक का मान आपतित प्रकाश के तरंगदैर्ध्य के समान या कम हो।
    विवर्तन की शर्त \(=a \leq \lambda\) 
  • विवर्तन एक ही तरग्रांग के विभिन्न भागों में अध्यारोपण का परिणाम है।
  • प्रकाश का विवर्तन प्रकाश की तरंग प्रकृति को दर्शाता है।
  • प्रकाश के विवर्तन के कारण ही परछाई के किनारे गहरे तथा केन्द्रीय भाग ज्यादा गहरे  दिखाई   देते हैं।

प्रकाश विद्युत प्रभाव (Photo-eletric Effect)   

  • आइन्सटीन ने सर्वप्रथम इसके बारे में बताया था।
  • जब किसी धातु की पृष्ठ पर एक विशिष्ट आवृत्ति (देहली आवृत्ति) के बराबर या इससे अधिक आवृत्ति (एक न्यूनतम ऊर्जा धातु का कार्य फलन के बराबर या इससे अधिक) का प्रकाश डालने पर धातु की सतह से युक्त इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होता है, इन उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन को Photo electron कहते है एवं इसमें उत्पन्न धारा को प्रकाश विद्युत धारा कहते है इसमें ही प्रकाश विद्युत प्रभाव कहते है।
  • प्रकाश विद्युत प्रभाव प्रकाशीय ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है।
  • सर्वाधिक प्रकाश सुग्राही पदार्थ सीजियम होता है, जिसका कार्यफलन \((\phi)\) न्यूनतम (2.14 ev) होता है।

आइन्सटीन की प्रकाश विद्युत समीकरण –   
\(\mathrm{h} v=\phi_{0}+\mathrm{Kmax}\)
\(K m a X=h v-\theta_{\circ}\)
\(\theta_{\circ}\) धातु का कार्य फलन

 

 

hv= आपतित फोटोन की ऊर्जा
v= प्रकाश की आवृत्ति

प्रकाश के स्त्रोत :-

प्राकृतिक स्त्रोत

कृत्रिम स्त्रोत

सूर्य

बल्ब

चन्द्रमा

ट्यूबलाइट

तारे

LED

जुगनू व मछलियाँ

  • वे वस्तुएँ जो स्वयं प्रकाश उत्पन्न करके प्रकाशित  दिखाई   देती है, दीप्त वस्तुएँ कहलाती है। जैसे – सूर्य, तारे, बल्ब, ट्यूबलाइट, जुगनू एवं कुछ मछलियाँ।
  • वे वस्तुएँ किसी अन्य वस्तु के प्रकाश से प्रकाशित  दिखाई   देती है, अदीप्त वस्तुएँ कहलाती है जैसे-चन्द्रमा, टेबल, पत्थर, काँच आदि।

दर्पण सूत्र :- 
\(\frac{1}{f}=\frac{1}{v}+\frac{1}{u} \)

  • यह संबंध सभी प्रकार के गोलीय दर्पणों के लिए तथा बिम्ब की स्थितियों के लिए मान्य होता है।

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