विद्युतधारा

  • विद्युतधारा- आवेश प्रवाह की दर का विद्युत धारा कहते हैं।
  • स्थिर विद्युत –घर्षण से प्राप्त विद्युत को घर्षण विद्युत या स्थिर विद्युत कहा जाता है।
  • स्थिर विद्युतिकी भौतिकी विज्ञान की एक शाखा है, जिसमें किसी वस्तु पर स्थित स्थिर आवेशों का अध्ययन किया जाता है।
  • किसी चालक के अनुप्रस्थ काट में इकाई समय में आवेश प्रवाह की दर को धारा-I से व्यक्त किया जाता है।

   \(I=\frac{Q}{T}\)

  • विद्युत आवेश का SI मात्रक कुलाम(C) है, जो लगभग 6×1018 इलेक्ट्रोनों में समाएं आवेश के समान होता है।

1 कुलाम = 6 x 1018 e

1 इलेक्ट्रॉन = -1.6×10-19C

  • विद्युत धारा का मात्रक एम्पीयर (A) होता है।
  • परिपथो की विद्युत धारा मापने के लिए ऐमीटर का उपयोग करते है एवं इसे सदा परिपथ में श्रेणीक्रम में संयोजित करते हैं।
  • परिपथ में विद्युत धारा धन टर्मिनल से ऋण टर्मिनल की ओर प्रवाहित होती है।
  • यदि किसी परिपथ में धारा का प्रवाह सदैव एक ही दिशा में होता रहता है, तो हम इसे दिष्ट धारा(Direct Current) कहते हैं।
  • यदि धारा का प्रवाह एकांतर क्रम में समानान्तर रूप से आगे और पीछे होता हो, तो ऐसी धारा प्रत्यावर्ती धारा(Alternating Current- A.C) कहते है।
  • विभवान्तर:- एकांक आवेश को एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक ले जाने में किया गया कार्य विभवान्तर कहलाता है।
  • इसका मात्रक जूल/कूलाम या वोल्ट होता है।
  • विद्युत-धारिता:- किसी चालक को आवेश देने पर उसके विभव में वृद्धि होती है, उस आवेग को ही उस चालक की धारिता कहते हैं।
  • q आवेश देने से चालक की वोल्टता v में वृद्धि होती है, तो इसकी धारिता (c) होगी।

    \(c=\frac{q}{v}\)       

  • विद्युत धारिता का मात्रक फैराडे है।
  • चालक की धारिता निम्न बातों पर निर्भर करती है-
  1. चालक के पृष्ठ क्षेत्रफल पर।
  2. चालक के चारों ओर के माध्यम पर।
  3. आस-पास में अन्य चालकों की उपस्थिति पर।
  • प्रतिरोध:- चालक का वह गुण जो प्रवाहित होने वाली धारा का विरोध करे, प्रतिरोध कहलाता है।
  • प्रतिरोध का कारण, चालक में गतिशील इलेक्ट्रॉन अपने मार्ग में आने वाले इलेक्ट्रॉनों, परमाणुओं एवं आयनों से निरन्तर टकराते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप प्रतिरोध होता है।

  • प्रतिरोध का S.I. मात्रक ओम है, जिसका संकेत  (\( \Omega\)) है।
  • ओम का नियम:- स्थिर तापमान पर, चालक के सिरों के मध्य विभवान्तर, प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा के समानुपाती होता है।
    • V  I  या V = RI
  • R यहाँ प्रतिरोध नियतांक है।
  • प्रतिरोध स्थिर ताप पर सीधी रेखा में प्राप्त होता है।

 

  • प्रतिरोध की निर्भरता:-
  1. लंबाई पर- तार की लंबाई बढ़ने पर प्रतिरोध बढ़ता है।

          \(R \propto l\)         

  1. अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल या मोटाई – तार की मोटाई बढ़ने पर प्रतिरोध का मान घटता है।
    \(R \propto \frac{l}{A}\)
  2. ताप पर निर्भरता:-
    1. भिन्न धातुओं के प्रतिरोध पर ताप का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, जैसे- फ्यूज तार का गलनांक व प्रतिरोध दोनों ही कम होते हैं 2. चालक का तापमान बढनें पर प्रतिरोध बढता है।
    3. अर्द्धचालक का तापमान बढ़ने पर, अर्द्धचालकों का प्रतिरोध घटता है।
  • अर्द्धचालकों के उदाहरण- सिलिकन, जर्मेनियम, गेलियम व ऑर्सेनाइड है।
  • इसी कारण मोबाईल, टी.वी. व अन्य उपकरणों में अर्द्धचालक प्लेटों का उपयोग करते हैं।
  • विशिष्ट प्रतिरोध- किसी चालक का प्रतिरोध उसके लम्बाई के समानुपाती तथा अनुप्रस्थ काट के व्युत्क्रमानुपाती होता है।                 \(\begin{array}{l} R \propto \frac{l}{A} \\ R=\rho \frac{l}{A} \end{array}\)                         
  • \(\rho \) इसे विशिष्ट प्रतिरोध कहते है- विशिष्ट प्रतिरोध वह मान है, जहां प्रतिरोध का मान स्थिर कर दिया जाता है।
  • जैसे कि यदि तार की लंबाई 1 मीटर व चौड़ाई 1m2 हो तो प्रतिरोध 1\(\Omega\) होगा।
    Note- घरों में मोटे तारों का उपयोग किया जाता है क्योंकि   मोटे तार प्रतिरोध कम करते हैं।
     
  • ओम के नियमानुसार प्रतिरोधों का संयोजन-

1. श्रेणीक्रम- विद्युत धारा का मान सभी प्रतिरोधो में समान, लेकिन विभवांतर का मान अलग-अलग होता है।

                        श्रेणीक्रम संयोजन

Q. तीन प्रतिरोध 10\(\Omega\),100\(\Omega\),1000\(\Omega\) श्रेणीक्रम में व्यवस्थित है तो कुल प्रतिरोध होगा?

 

    Rs = R1 + R2 +R3

            10\(\Omega\)+ 100\(\Omega\)+ 1000\(\Omega\)

            1110\(\Omega\)

  • फ्यूज तार, अमीटर, सेल तथा स्विच श्रेणीक्रम में जोड़े जाते है।
  • आदर्श अमीटर का प्रतिरोध शून्य होता है।

2. समान्तर क्रम या पार्श्व क्रम विद्युत धारा का मान अलग-अलग परंतु विभवांतर का मान समान होता है।

                     समांतर क्रम संयोजन

 

Q. तीन प्रतिरोध 10,100,1000 समान्तर क्रम में व्यवस्थित हो तो कुल प्रतिरोध का मान बताइए?

            \( \frac{1}{\mathrm{Rp}}=\frac{1}{10}+\frac{1}{100}+\frac{1}{1000} \\ \frac{1}{\mathrm{Rp}}=\frac{100+10+1}{1000}=\frac{111}{1000} \\ \mathrm{Rp}=\frac{1000}{111} \\ =9 \Omega \)

  • वोल्टमीटर तथा घरों के परिपथ समांतर क्रम में जोडे जाते है, क्योंकि समान्तर क्रम में जोड़ने से प्रतिरोध का मान न्यूनतम होता है, जिससे विद्युत धारा का प्रवाह आसानी से होता है।
  • वोल्ट मापने के लिए प्रतिरोध(R) का मान उच्च होना चाहिए, क्योंकि प्रतिरोध का मान उच्च होने से दो बिन्दुओं के विभव में अंतर होगा।
  • घरेलू वायरिंग में –
  • लाल रंग का तार(Live wire या phase) कहलाता है, जिसे फ्यूज या स्विच से जोड़ते है।
  • काला रंग का तार उदासीन तार कहलाता है, जो कि मीटर में जोड़ा जाता है।
  • हरा तार अर्थ/भूसंपर्कित होता है।

Note: 1. फ्यूज तार या MCB हमेशा श्रेणी क्रम में जोड़ी जाती है।

2. रोड़ लाईट्स समांतर क्रम में जोड़े जाते हैं।

3. विद्युत प्रेषण हमेशा निम्न धारा व उच्च विभव पर होता है।

4. घरों में 220-240 v बिजली आती है। जिसकी आवृति 50 Hz होती है।

5. विद्युत प्रेषण में अधिक संख्या में पतले तार लेते हैं।
 

     विद्युत सेल-

  • सेल का आविष्कार “एलेक्जेण्ड़र वोल्टा” ने किया।
  • प्राथमिक सेल- ये सेल रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलते हैं।
  • प्राथमिक सेल चार्ज नहीं किए जा सकते हैं, अत: यह अनुत्क्रमणीय होते हैं।
  • उदाहरण- प्राथमिक क्षारीय सेल, बटन सेल, शुष्क सेल, लेक्लांशी सेल, वोल्टा सेल आदि।
  • प्राथमिक क्षारीय सेल/मर्करी सेल का उपयोग घड़ी, केलकुलेटर व छोटे-छोटे खिलौनों में करते हैं।
  • इन सेलों में ऋणाग्र(कैथोड़) के रूप में जस्ते का पात्र तथा धनाग्र (ऐनोड़) के रूप में पारा ऑक्साईड व ग्रेफाईट का उपयोग करते हैं।
  • शुष्क सेलों में अमोनियम क्लोराइड़(NH4Cl) का पेस्ट मैगनीज डाइऑक्साईड(MnO2) व कार्बन चूर्ण का उपयोग करते हैं।
  • ऋणाग्र के रूप में जस्ते का पात्र एवं धनाग्र(ऐनोड) के रूप में पीतल की टोपी लगी कार्बन छड़ का उपयोग करते हैं।
  • वोल्टीय सेल में जस्ते की छड़ एवं ताँबे की छड़ काँच के बर्तन में रखे सल्फयूरिक अम्ल(H2SO4) में डूबी रहती है।
  • तांबे की छड़ एनोड व जस्ते की छड़ कैथोड का कार्य करती है।
  • लैक्लांशी सेल में (NH4Cl) अमोनियम क्लोराइड का विलयन भरा रहता है, कैथोड के रूप में जस्ते की छड़ तथा ऐनोड के रूप कार्बन की छड़ मैग्नीज डाई ऑक्साईड एवं कार्बन के मिश्रण के बीच में रखी होती है।

    द्वितीयक सेल- द्वितीयक सेल विद्युत ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में तथा रासायनिक ऊर्जा को पुन: विद्युत ऊर्जा में बदलते है।
  • द्वितीयक सेल चार्ज किये जा सकते है, ये उत्क्रमणीय होते है।
  • उदाहरण- सीसा संचायक सेल या लोह निकल सेल।
  • सीसा संचायक सेल में लिथार्ज या लैड ऑक्साईड़ (PbO) तथा सल्फ्यूरिक अम्ल(H2SO4) अम्ल का प्रयोग करते है।
  • इन सेलों में कैथोड़ के रूप में Pb  का उपयोग व ऐनोड़ के रूप में (PbO) लैड ऑक्साईड का प्रयोग करते है।

विद्युत शक्ति/सामर्थ्य (Electronic Power)- विद्युत परिपथ में ऊर्जा के क्षय होने की दर को विद्युत शक्ति कहते हैं।

  • इसका SI मात्रक वाट है, इसके अन्य बड़े मात्रक किलोवाट व मेगावाट होते हैं।

विद्युत शक्ति(P) = धारा(I) x  विभवान्तर(V)

वाट = एम्पियर x वोल्ट

विद्युत खर्च- किलोवाट घंटा अथवा 1 यूनिट  विद्युत ऊर्जा की वह मात्रा है, जो किसी परिपथ में 1 घंटे में व्यय होती है।

यूनिट या किलोवॉट घण्टा(K.W.H)-
         

1 K.W.H = 3.6 x 106 जूल

1 Horse Power = 746 वॉट

Q.1     एक हीटर प्रतिदिन 6 घण्टे जलता है, माह के अंत में विद्युत खर्च ज्ञात करो, यदि हीटर 100 वाट का हो।

           वाट = 100

           समय = 6 घण्टे, 30 दिन तक = 180 घंटे

           विद्युत खर्च = \(\frac{100 \times 180}{1000}=\frac{18000}{1000}=\) 18 यूनिट

Q.2     एक छात्रावास में 2, 100 वाट के बल्ब 5 घंटे तक तथा 4, 250 वाट के पंखे 10 घंटे तक चलते है तो एक दिन में ये कितनी               यूनिट खर्च करेगें तथा महीने का कितना खर्चा आएगा, यदि प्रति यूनिट 5 रूपये है तो?

           वाट = 100 x 2 = 200

                    250 x 4 = 1000

बल्ब का विद्युत खर्च = = 1 यूनिट

 

पंखे का विद्युत खर्च = = 10 यूनिट

रोज की कुल यूनिट = 11 यूनिट

रोज का खर्च = 11 x 5 = 55 ₹

महीने का खर्च = 55 x 30 = 1650 ₹

 

AC प्रत्यावर्ती धारा

(Alternating Current)

DC दिष्टधारा

(direct current)

1.  समय के साथ दिशा बदलती है।

1. समय के साथ दिशा नहीं बदलती एक समान रहती है।

2. ट्रांसफॉर्मर में काम आती है।

2. ट्रांसफॉर्मर में काम नहीं आती है।

3. बैटरी चार्ज नहीं कर सकते हैं।

3. बैटरी चार्ज कर सकते हैं।

4. इसकी आवृति छोटी होती है, क्योंकि ये दिशा बदल सकती है। 50Hz होती है।

4. इसकी आवृत्ति 0-20 Hz होती है।

 

विद्युत धारा के प्रभाव-

A. विद्युतधारा के चुम्बकीय प्रभावचालक में विद्युत धारा, प्रवाहित करने पर चालक के चारो तरफ चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है, जिसे विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव कहते हैं।

  • इसे ऑरस्टेड ने प्रस्तुत किया था।
  • चुंबकीय क्षेत्र का मात्रक टेसला व गॉस होता है।
  • चुंबकीय क्षेत्र की दिशा दक्षिण हस्त अंगुष्ठ नियम व दक्षिणावृत पेंच की सहायता से देते है, इसमें

(i) अंगूठा या पेच के नोक की दिशा- विद्युत धारा की दिशा।

(ii) मुड़ी हुई अंगुलियाँ/पेच कसने की दिशा- विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा बताती हैं। अर्थात् चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा, चालक के चारों तरफ लंबवत् वृत्ताकार होती है।

विद्युत चुंबकीय प्रेरण–  चालक या कुण्ड़ली तथा चुंबक के बीच सापेक्ष गति के कारण चालक में विद्युत धारा का प्रवाह होना, विद्युत चुंबकीय प्रेरण कहलाता है।

  • विद्युत चुंबकीय प्रेरण को फैराडे ने प्रस्तुत किया।
  • विद्युत चुंबकीय प्रेरण से प्रेरित विद्युत वाहक बल की दिशा फ्लेमिंग के दांये हाथ नियम के अनुसार दी जाती है।
  • विद्युत चुंबकीय प्रेरण में प्रेरित विद्युत वाहक बल की दिशा फ्लेमिंग के दांये हाथ व बांये हाथ के नियम के अनुसार दी जाती है।
    जिसके अनुसार-
  • तर्जनी- चुंबकीय क्षेत्र की दिशा
  • मध्यमा- विद्युत धारा की दिशा
  • अंगूठा- प्रेरित विद्युत वाहक बल की दिशा को बतलाएगा।
     
  • ट्रांसफार्मर (अन्योन्य प्रेरण), माइक्रोफोन, लाउडस्पीकर, विद्युत घंटी, विद्युत क्रेन, कृत्रिम पेसमेकर आदि विद्युत चुंबकीय प्रेरण के सिद्धान्त पर कार्य करते हैं।
  • ट्रांसफॉर्मर- ट्रांसफॉर्मर अन्योन्य प्रेरण के सिद्धान्त पर आधारित है।
  • ट्रांसफॉर्मर के द्वारा बिना विद्युत शक्ति नष्ट किए प्रत्यावर्ती धारा के विद्युत वाहक बल का मान बढ़ाया जा सकता है।
  • ट्रांसफार्मर दो प्रकार के होते हैं-

1. उच्चायी ट्रांसफॉर्मर (Step up Transformer)-  ये कम वोल्टेज को अधिक में बदलता है।

  • द्वितीयक कुंडली में घेरों की संख्या प्राथमिक कुंडली की तुलना में अधिक होती है।

2. अपचयी ट्रांसफार्मर(Step down)- इसमें प्राथमिक कुंडली में घेरों की संख्या अधिक होती है जबकि द्वितीयक कुंडली में घेरों की संख्या कम होती है।

  • ये अधिक वोल्टेज को कम वोल्टेज में बदलने का कार्य करता है।
  • ट्रांसफार्मर केवल प्रत्यावर्ती धारा पर काम करते है।

डायनेमो या .सी. जनरेटरयह यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित कर देता है।

  • यह विद्युत चुंबकीय प्रेरण के सिद्धान्त पर कार्य करता है।
  • चुम्बक से विद्युत का निर्माण किया जाता है।

Note-   1. माइक्रोफोन विद्युत चुंबकीय प्रेरण के सिद्धान्त पर कार्य करता है।

            2. लाउडस्पीकर द्वारा माइक्रोफोन द्वारा प्रेषित विद्युत तरंगों को पुन: ध्वनि तरंगों में परिवर्तित किया जाता है।

            3. विद्युत मोटर, चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा किसी चालक में उत्पन्न गति के सिद्धान्त पर कार्य करती है। विद्युत मोटर  द्वारा विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदला जाता है।

विद्युत धारा के ऊष्मीय प्रभाव चालक तार से धारा प्रवाहित होने पर प्रतिरोध के कारण तार गर्म हो जाता है (आवेशों के आपस में टकराव के कारण) ऊष्मीय प्रभाव उत्पन्न होता है।

ऊष्मीय प्रभाव पर आधारित उपकरण विद्युत हीटर, विद्युत प्रेस, बल्ब, ट्यूब लाईट आदि।

  • हीटर का तार नाइक्रोम का बना होता है, जिसका उच्च प्रतिरोध व उच्च गलनांक होता है।
  • विद्युत प्रेस में अभ्रक काम में ली जाती है, अभ्रक विद्युत का कुचालक होता है, परंतु ऊष्मा का सुचालक है।
  • ट्यूबलाइट/फ्लोरोसेन्ट लाईट/ CFC(Compact Fluroscent lamp)- इसमें अक्रिय गैस आर्गन को कुछ पारे के साथ भरते हैं, दोनों सिरों पर बेरियम ऑक्साईड के तंतु लगे होते है।
  • ट्यूबलाईट की दीवारों पर प्रतिदीप्त शील पदार्थ का लेप चढ़ा होता है, जब विद्युत धारा इनमें बहती है तो इलेक्ट्रान ट्यूबलाईट में भरी गैस को आयनित कर देते हैं।
  • विद्युत उत्सर्जन से पराबैंगनी किरणें उत्पन्न होती हैं, जो कि प्रदीप्तिशील पदार्थ पर पड़ती है,  तो वह चमक उठता है।
  • ट्यूबलाईट 36w पर ही प्रकाश देती है एवं बल्ब की तुलना में 7-8 गुना ज्यादा प्रकाश देती है।
  • बल्ब में टंगस्टन का फिलामेण्ट लगा होता है, जिसका प्रतिरोध उच्च व गलनांक भी उच्च होता है।

Note- नीली लौ का तापमान ज्यादा होता है, जबकि पीली लौ का कम।

विद्युत रासायनिक प्रभावशुद्ध जल विद्युत का कुचालक होता है, परंतु जब इसमें धातु के लवण, अम्ल या क्षार मिला दिए जाते हैं, तो ये विद्युत का सुचालक हो जाता है, ऐसे घोल में विद्युत धारा गुजर सकती है, विद्युत अपघट्य कहलाता है।

  • जब इस घोल में विद्युतधारा प्रवाहित की जाती है तो विलयन का धनात्मक व ऋणात्मक आयनों में अपघटन हो जाता है, इस घटना को विद्युत धारा का रासायनिक प्रभाव कहते हैं।
  • विद्युत धारा के प्रवेश के लिए ऐनोड(+)  व बाहर निकलने के लिए कैथोड़(-) लगे होते हैं।

 

विद्युत धारा के  रासायनिक प्रभाव के अनुप्रयोग-

विद्युत लेपन या कलई करना इस प्रक्रिया में किसी धातु की पतली परत दूसरी धातु पर चढ़ाई जाती है। जिस धातु पर परत चढ़ानी है, उसे कैथोड तथा जिस धातु की परत चढानी है उसे ऐनोड बना दिया जाता है।

  • दोनों इलेक्ट्रोडों को रासायनिक अपघट्य में डूबा दिया जाता है एवं विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, जिससे धातु एनोड से कैथोड पर चढ जाती है।

धातुओं का शुद्धिकरण सर्वोत्तम शुद्ध रूप से धातु इस विधि द्वारा प्राप्त की जाती है।

  • अशुद्ध धातु से एनोड व शुद्ध धातु से कैथोड बनाया जाता है।
  • अशुद्ध धातु का घोल विद्युत अपघटन के रूप में प्रयुक्त करते हैं तथा जैसे ही विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है शुद्ध धातु कैथोड पर जमा होने लगती है।

अमीटर:-

  • यह युक्ति विद्युत धारा का मापन करती है।
  • अमीटर को परिपथ में श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है।
  • आदर्श अमीटर का प्रतिरोध शून्य होता है।

वोल्टमीटर:-

  • यह युक्ति विभवान्तर का मापन करती है।
  • आदर्श वोल्टमीटर का प्रतिरोध अनन्त होता है।
  • वोल्टमीटर को परिपथ में समान्तर क्रम में जोड़ा जाता है।

गैल्वेनोमीटर:-

  • यह विद्युत धारा में विक्षोभ बताता है।
  • यह अल्प मान की धारा का मापन करता है।

संधारित्र:-

  • ऐसी युक्ति जिसके आकार में परिवर्तन किए बिना पर्याप्त मात्रा में आवेशों का संचय किया जाता है, उसे संधारित्र कहते हैं।
  • संधारित्र द्वारा आवेश संचय की क्षमता को धारिता कहते हैं।

संधारित्र के उपयोग:-

  • यह आवेश तथा ऊर्जा का संचय करते है।
  • रेडियो तथा टेलीविजन में सूचनाओं को ग्रहण करना तथा सूचनाओं को भेजने का कार्य करते हैं।
  • संधारित्र प्रत्यावर्ती धारा को जाने देते हैं तथा दिष्ट धारा को रोक लेते हैं।

जूल थॉमसन का प्रभाव:-

  • जूल थॉमसन ने ऊष्मा (H), प्रतिरोध (R), विद्युत धारा (I) तथा समय के मध्य संबंध स्थापित किया।

\( \begin{array}{l} \text{H} \alpha \text { I }^{2} \end{array}\\ \mathrm{H} \alpha \mathrm{R}\\ \mathrm{H} \alpha \mathrm{t}\\ \mathrm{H} \alpha \mathrm{I}^{2} \mathrm{Rt}\\ \mathrm{H}=\mathrm{I}^{2} \mathrm{Rt} \)

  • किसी परिपथ में ऊष्मा परिपथ में प्रवाहित विद्युत धारा के वर्ग के समानुपाती होती है।
    \(\mathrm{H} \alpha \mathrm{I}^{2}\)
  • किसी परिपथ में ऊष्मा, प्रतिरोध तथा समय के समानुपाती होती है।
    \(\begin{array}{l} \mathrm{H} \alpha \mathrm{R} \\ \mathrm{H} \alpha \mathrm{T} \end{array}\)

फ्यूज तार:-

  • यह एक ऐसी युक्ति है जो विद्युतीय उपकरणों को सुरक्षित रखती है।
  • इसे परिपथ में श्रेणीक्रम में संयोजित किया जाता है।
  • फ्यूज तार सीसा तथा टिन का बना होता है।
  • आदर्श फ्यूज तार का गलनांक निम्न होता है तथा प्रतिरोध उच्च होता है।

धारामापी:-

  • यह एक ऐसा यंत्र है जो गैल्वेनोमीटर को अमीटर में रूपान्तरित करता है तथा गैल्वेनोमीटर को वोल्टमीटर में रूपान्तरित करता है।
  • गैल्वेनोमीटर को अमीटर में रूपान्तरित करने हेतु एक निम्न प्रतिरोध (शंट प्रतिरोध) को परिपथ में समान्तर क्रम में संयोजित किया जाता है।
  • गैल्वेनोमीटर को वोल्टमीटर में रूपान्तरित करने हेतु एक उच्च प्रतिरोध को परिपथ में श्रेणीक्रम में संयोजित किया जाता है।

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