आहार एवं पोषण

आहार एवं पोषण

• जीवों में विभिन्न कार्य करने हेतु आवश्यक पोषक पदार्थों को आहार कहा जाता है।
पोषण –
• जीवों में पोषक पदार्थों को प्राप्त करना ही पोषण कहलाता है।
• पोषण जीवों को ऊर्जा प्रदान करने, शारीरिक वृद्धि एवं विकास में, रोगों से सुरक्षा में, शारीरिक मरम्मत में तथा उपापचयी क्रियाओं में सहायक है।
• पोषण की विधि के आधार पर जीव दो प्रकार के होते हैं-
(1)  स्वपोषी
(2)  विषमपोषी 
स्वपोषी :
• ऐसे जीव, जो अपना भोजन स्वयं ही संश्लेषित करते हैं,जिसे स्वपोषी कहते है। 
• हरे पेड•पौधे, प्रकाश संश्लेषी जीवाणु, रसायन संश्लेषी जीवाणु, स्वपोषी जीव है।
विषमपोषी :
• ऐसे जीव जो अपना भोजन किसी अन्य जीव से प्राप्त करते है।
• जन्तु वर्ग के सदस्य, कवक, रोगजनक बैक्टीरिया विषमपोषी जीव है।
• विषमपोषी तीन प्रकार के होते हैं•
(i) प्राणिसमभोजी
(ii) मृतोपजीवी
(iii) परजीवी
प्राणिसमभोजी (Holozoic) 
• ये जीव भोजन को अपने शरीर के अन्दर ग्रहण कर उसका अन्त:कोशिकीय पाचन करते हैं। जैसे• अधिकांश जन्तु
मृतोपजीवी (Saprophytes) 
• ये जीव मृत कार्बनिक पदार्थों से पोषण प्राप्त करते है तथा इनमें बाह्य कोशिकी पाचन पाया जाता है।
• कवक तथा बैक्टीरिया मृतोपजीवी जीव है।
परजीवी (Parasites) 
• ये जीव किसी दूसरे शरीर पर या शरीर में रहकर अपना पोषण प्राप्त करते है।
• जोंक, जूँ, प्लाज्मोडियम आदि परजीवी है।
कार्यों के आधार पर पोषक पदार्थ के प्रकार है- 
(1) ऊर्जा प्रदान करने वाले – कार्बोहाइड्रेट, वसा। 
(2) शारीरिक वृद्धि एवं विकास में सहायक – प्रोटीन।
(3) उपापचयी क्रियाओं में सहायक – विटामिन, खनिज लवण, जल, रेशे।  
(4)वंशागतिमेंसहायक – DNA,RNA  
कार्बोहाइड्रेट 
• कार्बोहाइड्रेटस हमारे भोजन में मुख्य रूप से अनाजों (गेहूँ, चावल, मक्कों) दूध, फल, शर्करा, शहद तथा दालों में पाए जाते हैं।
• कार्बोहाइड्रेट का मुख्य कार्य हमें ऊर्जा प्रदान करना  है।
• कार्बोहाइड्रेट से प्राप्त होने वाली ऊर्जा 4 Kcal प्रति ग्राम है।
• कार्बोहाइड्रेटस को सामान्यतया शर्कराएँ (Sugars) भी कहा जाता है क्योंकि अधिकांश कार्बोहाइड्रेटस स्वाद में मीठे, जल में घुलनशील एवं सरल शर्कराओं के आपस में जुड़ने से बने होते हैं।
• कार्बोहाइड्रेट C, H व O से मिलकर बने यौगिक है।
• कार्बोहाइड्रेट का सामान्य सूत्र CnH2nOn या Cn(H2O) है।
• इन यौगिकों के अंतिम सिरे पर एल्डिहाइड समूह (CHO→एल्डोज शर्करा) समूह   कीटोज शर्करा) उपस्थित होती है।
​• रासायनिक संगठन के आधार पर कार्बोहाइड्रेट के प्रकार –
(1) सरल कार्बोहाइड्रेटस 
   (i) मोनोसैकेराइड
   (ii) ओलिगोसैकेराइड
(2) जटिल कार्बोहाइड्रेटस 
   (i) पॉलीसैकेराइड 
मोनोसैकेराइड –
• इसमें शर्करा का केवल 1 अणु पाया जाता  है।
• ये सरलतम कार्बोहाइड्रेटस हैं, जो स्वाद में मीठे, रंगहीन एवं जल में घुलनशील होते हैं।
• कार्बन की संख्या के आधार पर मोनोसैकेराइड निम्न प्रकार के होते हैं
(i)  ट्राईओज शर्करा –
• 3 कार्बन युक्त शर्कराएँ ट्राईओज शर्कराएँ कहलाती हैं।
• डाई हाहड्रॉक्सी एसीटोन, ग्लिसरेल्डिहाइड ट्राईओज शर्करा है।
(ii) टेट्रोज शर्करा –
• 4 कार्बन युक्त शर्करा, टेट्रोज शर्करा कहलाती है।
• इरिथ्रोज, थ्रियोज शर्करा टेट्रोज शर्करा है।
(iii) पेण्टोज शर्करा –
• 5 कार्बनयुक्त शर्करा, पेण्टोज शर्करा कहलाती है।
• राइबोज, डी•ऑक्सीराइबोज शर्करा पेण्टोज शर्करा है।
• डी-ऑक्सी राइबोज शर्करा का सूत्र C5H10O4 होता है।
(iv) हेक्सोज शर्करा –
• 6 कार्बन युक्त हेक्सोज शर्करा कहलाती है।
• ग्लूकोज, गैलेक्टोज, फ्रक्टोज तथा मैनोज हेक्सोज शर्कराएँ हैं।
(v) हेप्टोज शर्करा –
• 7 कार्बन युक्त हेप्टोज शर्करा कहलाती है। 
• सीडोहेप्टुलोज हेप्टोज शर्करा है।
• सीडोहेप्टुलोज का सूत्र C7H14O7 है।

ओलिगोसैकेराइड :
• 2 से 9 मोनोसैकेराइड आपस में ग्लाइकोसाइडिक बंध के द्वारा जुड़कर निर्जलीकरण संश्लेषण के द्वारा ओलिगोसैकेराइड का निर्माण करते हैं।
• सभी डाईसैकेराइड क्रिस्टलीय ठोस, मीठे तथा जल में विलय होते हैं।
• सुक्रोस, माल्टोज, लैक्टोज, डाईहाइड्रॉक्सी एसीटोन, ग्लिसरेल्डिहाइड आदि डाईसैकेराइड है।
ट्राईसैकेराइड –
• रेफिनोज एक ट्राईसैकेराइड है।
• ग्लूकोज + फ्रक्टोज + गैलेक्टोज = रेफिनोज
Note –
1) स्टेकियोज एक ट्रेटासैकेराइड है।
2) कुछ कवकों की कोशिका भित्ति में तथा कीटों के हीमोलिम्फ में ट्रीहैलोज शर्करा पायी जाती है।
सुक्रोस :
• सुक्रोस एक महत्वपूर्ण डाईसैकेराइड है।
• सुक्रोस को इक्षु शर्करा (Cane Sugar) तथा सामान्य टेबल शर्करा भी कहा जाता है।
• सुक्रोस का मुख्य स्त्रोत गन्ने का रस तथा चुकन्दर है।
• गन्ने के रस में 15•20% तथा चुकन्दर में 10•17% सुक्रोस होता है।
• सुक्रोस का अणुसूत्र C6H22O11 है।
• यह सफेद, क्रिस्टलीय, स्वाद में मीठा तथा जल में घुलनशील डाईसैकेराइड है।
• सुक्रोस का जल अपघटन करवाने पर यह ग्लूकोज (एल्डोज शर्करा) तथा फ्रक्टोज (कीटोज शर्करा) में टूटता है।
• यह एक अनअपचायी शर्करा है।
माल्टोज :
• यह एक डाईसैकेराइड है, जो स्टार्च पर माल्ट की क्रिया से प्राप्त होता है, इसलिए इसे माल्ट शर्करा (Malt Sugar) भी कहते हैं।
• यह अंकुरित बीजों में विशेषकर अनाजों में स्टार्च के रूप में उपस्थित होता है।
• माल्टोज का अणुसूत्र C12H22O11 है।
• माल्टोज एक सफेद क्रिस्टलीय, जल में विलेय तथा एल्कोहॉल व ईथर में अविलेय डाईसैकेराइड है।
• माल्टोज का जल अपघटन करने पर ग्लूकोज के दो अणु प्राप्त होते हैं।
• माल्टोज अपचायी शर्करा है।
लेक्टोज शर्करा :
• इसे दुग्ध शर्करा (Milk Sugar) भी कहते हैं।
• यह सभी स्तनधारियों के दूध में उपस्थित होती है।
• लेक्टोज औद्योगिक रूप से दूध से पनीर बनाने की क्रिया में सहउत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।
• लेक्टोज एक श्वेत क्रिस्टलीय पदार्थ है, जो जल में विलेय तथा एल्कोहॉल व ईथर में अविलेय होता है।
• लेक्टोज का अणुसूत्र C12H22O11  है।
• लेक्टोज का जल अपघटन करवाने पर ग्लूकोज तथा गैलेक्टोज का समअणुक मिश्रण प्राप्त होता है।
• लेक्टोज एक अपचायी शर्करा है।
Note –
• कुछ शर्कराएँ मुक्त ऐल्डिहाइड तथ कीटोन समूह के कारण अन्य पदार्थों का अपचयन कर सकती हैं, इन्हें अपचायक शर्करा कहा जाता है।
• अपचायक शर्कराएँ फेहलिंग या बेनेडिक्ट विलयन में उपस्थित Cu+2 (क्युप्रिक आयन) का अपचयन कर इन्हें Cu+2 (क्यूप्रस आयन) में बदल देती है, जिससे विलयन का नीला रंग गहरे भूरे, लाल रंग में परिवर्तित हो जाता है।
• वे शर्कराएँ जो फेहलिंग विलयन तथा टॉलेन अभिकारक द्वारा अपचयित नहीं होती है, उसे अनअपचायी शर्कराएँ कहते हैं।
अपचायी व अनअपचायी शर्करा को तालिका में व्यवस्थित किया गया है, जो इस प्रकार है•
अपचायी शर्करा अनअपचायी शर्करा
ग्लूकोज सुक्रोस
लेक्टोज गैलेक्टोज
माल्टोज सेल्युलोज
फ्रक्टोज

जटिल कार्बोहाइड्रेटस :
पॉलीसैकेराइड्स –
• जब मोनोसैकेराइड इकाइयाँ 10 से हजारों की संख्या में आपस में ग्लाइकोसाइडिक बंध के द्वारा निर्जलीकरण संश्लेषण की क्रिया कर जुड़ जाते हैं, तो पॉलीसैकेराइड का निर्माण होता है।
• पॉलीसैकेराइड स्वादहीन, जटिल, जल में घुलनशील यौगिक है।
• पॉलीसैकेराइड प्राकृतिक बहुलक है।
• इनका सामान्य सूत्र (C6H10O5)n होता है।
• यह दो प्रकार के कार्य करते हैं•
A. भोजन संग्रहण
B. संरचनात्मक
A. भोजन संग्राहक पॉलीसैकेराइड :
I. स्टार्च (Starch) :
• स्टार्च कार्बोहाइड्रेट का मुख्य स्त्रोत है।
• ये पौधों में भोजन संग्रहण का कार्य करते हैं।
• स्टार्च का अणुसूत्र (C6H10O5)n है।
• स्टार्च दो यौगिकों एमिलोस तथा ऐमिलीपेक्टिन से मिलकर बना होता है।
• स्टार्च के मुख्य स्त्रोत –
• गेहूँ
• मक्का
• चावल
• जौ
• आलू
• कंद
• कुछ सब्जियाँ
II. ग्लाइकोजन :
• जन्तुओं में संचित भोजन ग्लाइकोजन के रूप में होता है।
• यह पॉलीसैकेराइड है।
III. इनुलिन :
• यह भी भोजन संग्राहक पॉलीसैकेराइड है।
• यह डहेलिया पौधे की जड़ों में उपस्थित होता है।
• इनुलिन किडनी (Kidney) में संक्रमण का पता लगाने में सहायक है।

B. संरचनात्मक पॉलीसैकेराइड :
I. सेल्युलोज –
• यह पॉलीसैकेराइड है।
• इसका अणुसूत्र (C6H10O5)n होता है।
• यह केवल पौधों में पाया जाता है, जो पौधों में कोशिका भित्ति का प्रमुख अवयव है।
• यह वस्त्र आदि के स्त्रोत की तरह मानव के लिए उपयोगी है।
• रुई में सेल्युलोज की मात्रा 90•95% तथा सूती कपड़े में 90% होती है।
• सेल्युलोज अनअपचायी शर्करा है।
• सेल्युलोज का जल अपघटन करवाने पर यह केवल D•ग्लूकोज देता है यानि यह D•ग्लूकोज का रेखीय बहुलक है।
II. हेमीसेल्युलोज
III. पेक्टिन
IV. काइटिन – कवकों की कोशिका भित्ति काइटिन से बनी होती है।
महत्वपूर्ण तथ्य :
ग्लाइकोजेनेसिस :
1) कार्बोहाइड्रेट Liver   ग्लाइकोजन
ग्लोइकोजेनोलाइसिस :
1) ग्लाइकोजन   Liver   सरल कार्बोहाइड्रेट

वसा (Lipids) :
• ये भी C, H एवं O से मिलकर बने यौगिक हैं।
• वसा में ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है।
• वसायें कार्बनिक विलायकों जैसे – बेंजीन, ईथर, क्लोरोफॉर्म में विलयशील होती है।
• वसायें जल में अविलेयशील होती है, लेकिन जल के साथ यह इमल्शन का निर्माण करती है।
• भोजन के अवयवों में प्रति ग्राम पदार्थ से सर्वाधिक ऊर्जा वसाओं से प्राप्त होती है।
• वसा की प्रति ग्राम मात्रा से लगभग 9Kcal ऊर्जा प्राप्त होती है।
• वसाओं के मुख्य स्त्रोत – घी, तेल, मक्खन, चर्बीयुक्त माँस है, इसके अलावा स्टीरॉयडस, गाजर, लाइकोपीन, विटामिन (A, E, K), प्राकृतिक रबर, टर्पीन्स, यूकेलिप्टस का तेल, प्रीस्टाग्लैडिन्स है।
• 3 अणु वसीय अम्लों एवं ग्लिसरॉल का एक अणु आपस में क्रिया कर एस्टर यौगिकों के रूप में साधारण वसा का निर्माण करते हैं, जो इस प्रकार है•
1 अणु ग्लिसरॉल   3 अणु वसीय अम्ल =  एस्टर यौगिक (वसा)
वसीय अम्ल :
• ये 16•24oC से युक्त कार्बनिक यौगिक है, जिसके अंतिम सिरे पर कार्बोहाइड्रेट समूह (•COOH) समूह पाया जाता है।
• वसीय अम्लों का निर्माण जीवों के शरीर में होता है, लेकिन कुछ वसीय अम्ल मनुष्य के शरीर में नहीं बन पाते हैं।
• ऐसे वसीय अम्ल ‘आवश्यक वसीय अम्ल’ कहलाते हैं तथा पौधों में इनका निर्माण होता है, जैसे• लिनोलिक अम्ल, लिनोलिनिक अम्ल, एरेकिडॉनिक अम्ल।
• ऐसे वसीय अम्ल जिसमें C के परमाणुओं के बीच केवल एकल बंध (C•C) पाया जाए तो, उसे संतृप्त वसीय अम्ल कहते हैं।
• संतृप्त  वसीय अम्ल से संतृप्त वसाओं (घी, मक्खन) का निर्माण होता है।
• असंतृप्त वसीय अम्लों में कार्बन परमाणुओं के बीच एक या एक से अधिक द्विबंध उपस्थित होते हैं।

वसीय अम्ल :
1. संतृप्त वसीय अम्ल
• इनका सामान्य सूत्र CnH2nO2 है।
• हाइड्रोजन द्वारा संतृप्त रहने के कारण, इन्हें  संतृप्त वसा कहा जाता है।
• संतृप्त वसायें हमारे शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ाती हैं, जिससे वजन बढ़ने लगता है तथा रक्त नलिकाओं में कोलेस्ट्रॉल का जमाव होने से हृदय•वाहिका रोग की संभावना बढ़ जाती है।
• ये कमरे के तापमान पर ठोस होती है।
• पामिटिक अम्ल व स्टिएरिक अम्ल दोनों संतृप्त वसीय अम्ल है।
2. असंतृप्त वसीय अम्ल
• इनका सामान्य सूत्र CnH2nO2 है।
• असंतृप्त वसीय अम्लों से असंतृप्त वसाओं का निर्माण होता है जैसे – तेल
• असंतृप्त वसीय अम्ल पोषण एवं रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को नियमित बनाए रखते हैं, जो कि हृदय के लिए स्वास्थ्यवर्धक होते हैं।
असंतृप्त वसीय अम्लों के उदाहरण :
I. ओलिक अम्ल
II. लिनोलिक अम्ल
III. लिनोलिनिक अम्ल
IV. एरेकेडॉनिक अम्ल
Note – 
•  ओमेगा – 3 वसीय अम्ल स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक है तथा यह मेकेरेल एवं अन्य मछलियों के तेल, अलसी के बीजों में भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
•  वर्तमान में बाजारों में उपलब्ध खाद्य तेलों में PUFA (बहु असंतृप्त वसीय अम्ल) अधिक मात्रा में होते हैं।
वसाओं के प्रकार :
A. सामान्य वसा
B. संयुग्मित वसा
C. व्युत्पन्न वसा

A. सामान्य वसा : 
• साधारण वसाओं का निर्माण वसीय अम्लों के 3 अणुओं एवं एक अणु ग्लिसरॉल के आपस में क्रिया करने से होता है, इसमें तीन एस्टर बंध का निर्माण होने से इसे ‘ट्राईग्लिसराइडिस’ भी कहते हैं।
• घी, वनस्पति तेल, मक्खन आदि सामान्य वसायें हैं।
• सामान्य वसाओं के अन्य उदाहरण –
I. मोम
II. क्यूटिन
III. सुबेरिन

I. मोम :
• मानव के कर्ण में ‘सिरुमिन’ मोम पाया जाता है।
• पेट्रोलियम पदार्थों में ‘पैराफिन’ मोम पाया जाता है।
• पशु•पक्षियों के फरों में ‘लिनोलिन’ मोम उपस्थित होता है।
• मधुमक्खियों की उदर ग्रंथियों से Bees•Wax प्राप्त होता है।
• Wax•D नामक मोम बैक्टीरिया से प्राप्त होता है।

II. क्यूटिन :
•  ये पत्तियों की सतह पर क्यूटिकल का निर्माण करते हैं, जो कि पत्तियों को जलरोधी बनाते हैं।

III. सुबेरिन :
• यह पादप कोशिकाओं की कोशिका भित्ति में पाया जाता है, जो इन्हें जलरोधी बनाता है।
 +3H2O
ट्राइग्लिसराइडस   ट्राइहाइड्रिक वसीय अम्ल   एल्कोहॉल (ग्लिसरॉल)
NOTE –
• NaOH या KOH जैसे क्षारों की क्रिया साधारण वसा से की जाती है, तो साबुन का निर्माण होता है, जिसे साबुनीकरण कहते हैं।
• असंतृप्त वसाओं जैसे तेल के हाइड्रोजनीकरण से हमें वनस्पति घी प्राप्त होता है, इस क्रिया में Ni(निकल) उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है।

B. संयुग्मित वसा :
साधारण वसायें और क्रियात्मक समूह या अन्य यौगिक से संयुग्मित वसा का निर्माण होता है।
संयुग्मित वसायें निम्न हैं –
फॉस्फोलिपिड्स –
• वसा और फॉस्फेट  से मिलकर फॉस्फोलिपिड्स का निर्माण होता है।
• यह वसा कोशिका झिल्ली के निर्माण में सहायक है।
स्फींगोलिपिड्स –
• स्फिंगोसीन अमीनो अम्ल और वसा से मिलकर स्फींगोलिपिड्स का निर्माण होता है।
• यह वसा तंत्रिका तंत्र के विकास में सहायक है।
लिपोप्रोटीन्स (वसा + प्रोटीन)
ग्लाइकोप्रोटीन्स (कार्बोहाइड्रेट + प्रोटीन)

C. व्युत्पन्न वसा : 
• सामान्य एवं संयुग्मित वसाओं के अपघटन से प्राप्त वसा व्युत्पन्न वसा कहलाती है।
व्युत्पन्न वसायें :
• सरल एवं संयुग्मित वसाओं के अपघटन से प्राप्त वसाऐं व्युत्पन्न वसाऐं कहलाती है।
स्टीरॉयडस :
• रासायनिक रूप से चक्रीय कार्बनिक यौगिक साइक्लोपेन्टेनो पर हाइड्रो•फीनेन्थ्रीन  की संरचना दर्शाते हैं।
• ये वसीय अम्ल की अनुपस्थिति के कारण साबुनीकरण की क्रिया नहीं दर्शाते हैं।
• लैंगिक हॉर्मोन्स, इर्गोस्टीरॉल, कॉप्रोस्टीराल, लेनास्टीराल आदि स्टीरॉयडस के प्रकार है•
(1) लैंगिक हॉर्मोन्स (sexual Harmones):• टेस्टोस्टीरान, एस्ट्रोजन, प्रोजेस्ट्रेरान आदि स्टीरॉयडस है।
(2) इर्गोस्टीराल:• कवकों में पाये जाने वाले स्टीरॉयडस को इर्गोस्टीराल कहते हैं।
(3) कॉप्रोस्टीरॉल:• मल में पाया जाने वाला स्टीरॉयडस कॉप्रोस्टीरॉल कहलाता है।
(4) लेनोस्टीरॉल:• ऊन देने वाले जन्तुओं में उपस्थित स्टीरॉयडस लेनोस्टीरॉल कहलाता है।
• टर्पीन्स:• ये वसायें पौधों में पत्तियों, फूलों एवं फलों में विशेष गंध उत्पन्न करते हैं।
• प्रौस्टाग्लैण्डिन्स:• ये स्थानीय हॉर्मोन्स के रूप में मानवों के वीर्य में, चोट ग्रस्त स्थानों पर प्रदाह में सहायक हैं।
• प्रदाह (Inflammation) के लक्षण –
(1) त्वचा का लाल होना
(2) सूजन, दर्द एवं तापमान में वृद्धि

वसा के कार्य –
(1) ये ऊर्जा के संचित स्त्रोत की तरह कार्य करते हैं।
(2) ये त्वचा के नीचे जमा होकर शरीर को प्रतिरोधक परत उपलब्ध कराते हैं।
(3) ये आघात प्रतिरोधक परत के रूप में जमा होकर जीवों के विभिन्न अंगों का बचाव करते हैं।

प्रोटीन (Protein) –
• प्रोटीन शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द प्रोटियोज से हुई है, जिसका अर्थ प्राथमिक अथवा अधिक महत्त्वपूर्ण  होता है।
• प्रोटीन शब्द की खोज मूलर (1838) ने की थी तथा बर्जीलियस द्वारा नाम दिया गया।
• ये C, H व O के अलावा N, P, S युक्त होते हैं।
• प्रोटीन से 4 किलो कैलोरी प्रति ग्राम ऊर्जा प्राप्त होती है।
• दालों, सोयाबीन, अण्डे, मछली आदि में प्रोटीन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
• प्रोटीन की सर्वाधिक मात्रा सोयाबीन में पायी जाती है।
• प्रोटीन का मुख्य कार्य हमारे शरीर में वृद्धि एवं विकास करना है तथा चोट ग्रस्त अंगों की मरम्मत इन्हीं से होती है।
• प्रोटीन की संरचनात्मक इकाई अमीनो अम्ल है।
• ये अमीनो अम्ल आपस में पेप्टाइड बंध से जुड़कर पेप्टाइडस का निर्माण करते हैं। इन पेप्टाइड के आपस में जुड़ने से पॉलीपेप्टाइडस या प्रोटीन का निर्माण होता है।
• प्रोटीन निर्माण से संबंधित कुल 20 अमीनो अम्ल मानव शरीर में पाये जाते हैं।
• इन अमीनो अम्लों के अलावा भी मानव शरीर में अन्य अमीनो अम्ल भी पाए जाते हैं जैसे•
(1) ऑनिर्थीन
(2) सिटुलीन
(3) GABA
• यूरिया चक्र में ऑनिर्थीन एवं सिटुलीन अमीनो अम्ल उपयोगी है।
• GABA (गामा अमीनो ब्यूटाइरिक अम्ल) न्यूरोट्रांसमीटर के रूप में कार्य करता है।
• यकृत ऑनिर्थीन द्वारा ही अमोनिया को यूरिया में बदलता है।
• अमीनो अम्ल में ऐमीनो तथा कार्बोक्सिलिक दोनों समूह होते हैं।
• ऐमीनो क्षारीय समूह है तथा कार्बोक्सिलिक अम्लीय प्रवृत्ति के होते हैं। अत: ये दोनों समूह परस्पर क्रिया करके आन्तरिक लवण बनाते हैं जिसकी द्विधुवीय संरचना होती है इसलिए अमीनो अम्ल को द्विध्रुवक आयन, ज्विटर आयन या ऐम्फोलाइट आयन भी कहते हैं।
• अमीनो अम्ल रंगहीन तथा क्रिस्टलीय ठोस होते हैं।
• अमीनो अम्ल जल, अम्ल तथा क्षार में विलेयशील होते हैं।
• रासायनिक रूप से अमीनो अम्ल, प्राथमिक ऐमीन तथा कार्बोक्सिलिक अम्ल दोनों के महत्वपूर्ण लक्षण दर्शाते हैं।
• अमीनो अम्ल समविभव बिन्दु वाले होते हैं।
Note: –
• विलयन का वह PH जिस पर विद्युत विभव लगाने पर अमीनो अम्ल किसी भी इलेक्ट्रोड की ओर गमन नहीं करता हैं, समविभव बिन्दु (Iso Electric Point) कहलाता है।
•   समविभव बिन्दु पर विलेयता, चालकता, श्यानता तथा परासरण दाब न्यूनतम होता है।
• अमीनो अम्ल का वर्गीकरण (Classification of Amino Acid):•
(1) उदासीन अमीनो अम्ल
1. ग्लाइसीन
2. एलेनिन
3. वेलीन
4. ल्यूसीन
5. आइसोल्यूसीन
(2) अम्लीय अमीनो अम्ल
1. एस्पार्टिक अम्ल
2. एस्पार्जिन
3. ग्लूटेमीन
4. ग्लूटैमिक अम्ल
(3) क्षारीय अमीनो अम्ल
1. आर्जिनिन
2. लाइसीन
(4) OH समूह युक्त अमीनो अम्ल
1. सेरीन
2. थ्रिऑनीन
(5) सल्फर युक्त अमीनो अम्ल
1. सिस्टीन
2. मैथिऑनीन
(6) एरौमेटिक अमीनो अम्ल
1. टायरोसीन
2. ट्रिप्टोफेन
3. फेनिल ऐलानीन
(7) विषमचक्रीय अमीनो अम्ल
1. प्रोलीन
2. हिस्टीडीन

Note: –
1. प्रोलीन एक अपवाद है यहाँ द्वितीयक ऐमीनो समूह (•NH) a• कार्बन से जुड़े होते है। इस प्रकार यह एक अमीनो कार्बोक्लिक अम्ल होता है।
2. प्रथम सदस्य –  ग्लाइसीन को छोड़कर बाकी सभी अमीनो अम्ल में असममित कार्बन परमाणु होता है, अत: ये प्रकाश सक्रिय होते हैं।

आवश्यक अमीनो अम्ल (8)
• इनका निर्माण हमारे शरीर में नहीं हो पाता है, अत: भोजन में इनका होना जरूरी है।
• आवश्यक अमीनो अम्ल निम्न है –
(1) वेलीन
(2) ल्यूसीन
(3) आइसोल्यूसीन
(4) लाइसीन
(5) मैथिऑनीन
(6) ट्रिप्टोफेन
(7) थ्रिऑनीन
(8) फिनाइल एलेनीन

अर्द्ध आवश्यक अमीनो अम्ल (2)
• इनका निर्माण केवल वयस्कों में होता है।
• अर्ध आवश्यक अमीनो अम्ल निम्न है
(1) आर्जिनीन
(2) हिस्टीडीन
अनावश्यक अमीनो अम्ल (10)
• इनका निर्माण हमारे शरीर में हो जाता है।
• अनावश्यक अमीनो अम्ल निम्न है
(1) ग्लाइसीन
(2) ऐलानीन
(3) ग्लूटैमिक अम्ल
(4) एस्पेराजीन
(5) सेरीन
(6) सिस्टीन
(7) टाइरोसीन
(8) प्रोलीन
(9) ऐस्पार्टिक अम्ल
(10) ग्लूटेमीन

प्रोटीन के प्रकार (Types of Protein)
A. आकार के आधार पर ये दो प्रकार के होते हैं –
(i) रेशेदार – कोलेजन, इलास्टिन, मायोसीन
(ii) गोलाकार – हिस्टोन, एल्बुमिन, ग्लोब्यूलिन
B. कार्य के आधार पर –
(i) एन्जाइम्स के रूप में – पेप्सिन, एमायलेज
(ii) संरचनात्मक – कोलेजन, किरेटिन
(iii) भोजन संग्रहण – एल्बुमिन, ग्लेटेमिनस
C. संगठन के आधार पर –
(i) सरल
(ii) संयुग्मित
(iii) व्युत्पन्न
(1) सरल प्रोटीन:
• ये केवल अमीनो अम्ल से बने होते हैं।
• अधिकांश प्रोटीन जैसे• पेप्सिन, किरेटिन, कोलेजन, हिस्टोन आदि सरल प्रोटीन है।
(2) संयुग्मित प्रोटीन:
• अमीनो अम्ल तथा क्रियात्मक समूह मिलकर संयुग्मित प्रोटीन का निर्माण होता है।
• हीमोग्लोबिन, साइटोक्रोम, ग्लाइको प्रोटीन, लिपो प्रोटीन आदि संयुग्मित प्रोटीन है।
(3) व्युत्पन्न प्रोटीन:
• सरल व संयुग्मित प्रोटीन के अपघटन से निर्मित प्रोटीन व्युत्पन्न प्रोटीन कहलाते हैं।
• पेप्टोन्स तथा पेप्टाइड्स व्युत्पन्न प्रोटीन है।
• हीमोग्लोबिन में क्रियात्मक समूह fe+2 होता है।
• साइटोक्रोम में क्रियात्मक समूह fe होता है।
• ग्लाइको प्रोटीन में क्रियात्मक समूह कार्बोहाइड्रेट होता है।
• लिपो प्रोटीन में क्रियात्मक समूह के रूप में वसा उपस्थित होती है।
• जन्तुओं में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला प्रोटीन कोलेजन है।
• सम्पूर्ण जगत (पादप + जन्तु) में सर्वाधिक पाया जाने वाला प्रोटीन RUBISCO (Ribulose Bisphosphate Carbosylase oxygenase) है।
• लगभग सभी एन्जाइम्स प्रोटीन से बने होते हैं लेकिन सभी प्रोटीन एन्जाइम्स नहीं होते हैं।
Note:• केसीन एक दुग्ध प्रोटीन है, जिसमें सभी आवश्यक अमीनो अम्ल होते हैं।
प्रोटीन के कार्य –
(1) हार्मोन्स की तरह जैसे• इन्सुलिन, थायरॉक्सिन, STH
(2) पौधों एवं जन्तुओं में एन्जाइम्स के रूप में।
(3) यह बाल, माँसपेशियों तथा त्वचा का मुख्य घटक है।
(4) कार्बोहाइड्रेटों तथा वसाओं की कमी होने पर शरीर को त्वरित ऊर्जा प्रदान करते हैं।
(5) हीमोग्लोबिन गैसीय परिवहन में सहायक है।
(6) कुछ प्रोटीन जैसे• एल्बुमिन तथा फेसियोलीन भोजन संग्रहण में सहायक है।
(7) ग्लाइको प्रोटीन कोशिकीय पहचान में सहायक है।

Note :-  जब प्राकृतिक प्रोटीन में भौतिक परिवर्तन जैसे• ताप में परिवर्तन अथवा रायासनिक परिवर्तन जैसे PH में परिवर्तन में करते है, तो प्रोटीन अपनी जैव सक्रियता खो देते हैं। इस प्रक्रिया को प्रोटीन का विकृतिकरण कहते हैं।

विटामिन[vitamins]
• विटामिन वे कार्बनिक यौगिक होते हैं, जिनकी आवश्यकता हमारे भोजन में सूक्ष्म मात्रा में होती है।
• विटामिन की खोज ल्यूनिन ने की थी तथा विटामिन शब्द सी फंक ने दिया था।
• विटामिन सिद्धांत हॉपकिंस एवं फंक ने प्रस्तुत किया था।
• विटामिन सिद्धांत के अनुसार “विटामिन हमारी उपापचयी क्रियाओं को नियमित बनाए रखते है, ये हमें ऊर्जा तो प्रदान नहीं करते लेकिन विभिन्न रोगों से सुरक्षा प्रदान करते हैं”।
• विलेयता के आधार पर विटामिन दो प्रकार के होते हैं•
1. वसा में घुलनशील विटामिन – Vit A,D,E व K
2. जल में घुलनशील विटामिन – Vit B• Complex
    Vit c
    Vit P

नोट –
•  विटामिन – C जल में घुलनशील एकमात्र ऐसा विटामिन है, जो एंटीऑक्सीडेन्ट के रूप में कार्य करता है।
•  विटामिन A व E दोनों वसा में घुलनशील विटामिन है, जो एंटीऑक्सीडेन्ट के रूप में कार्य करते हैं।
•  ऊष्मा के लिए सबसे संवेदी विटामिन  Vit•C है।
•  एविडीन कच्चे अण्डे में उपस्थित होता है, जो  विटामिन B7  के अवशोषण को रोक देता है, अत: कच्चे अण्डे नहीं खाने चाहिए।
•  विटामिन B17 एंटी•कैंसर गुणों से युक्त विटामिन है, जो गेहूँ की फसल की नई पत्तियों में पाया जाता है।
•  विटामिन B17 को लेटेराइल विटामिन भी कहा जाता है।
•  विटामिन मानव शरीर द्वारा संश्लेषित नहीं किये जा सकते है लेकिन विटामिन K तथा विटामिन D इसके अपवाद है।

वसा में घुलनशील विटामिन –
विटामिन – A 
रासायनिक नाम• रेटिनॉल, एंटी जीरोफ्थैलेमिक विटामिन 
स्त्रोत – गाजर, पपीता, टमाटर, हरी सब्जियाँ, आम, कॉड लिवर तेल तथा गोल्डन राइस
कार्य – ये हमारे नेत्रों में दृष्टिरंजक का विकास करता है तथा किरेटीन के जमाव को रोकता है। 
विटामिन A की कमी से होने वाले रोग• कॉर्निया व त्वचा की कोशिकाओं का शल्की भवन, रतौधीं, वृद्धि अवरुद्ध होना, कैरेटोमेलेशिया, जीरो फ्थैलेमिया, निक्टोलोपिया
नोट• 
•  विटामिन – A, β – कैरोटीन जेनेटिक इंजीनियरिंग से तैयार फसल गोल्डन राइस/सुनहरे चावल में भरपूर पाया जाता है।
•  β –  कैरोटीन गाजर में भी पाया जाता है। 
•  पॉल केरेर एवं मैककॉलम ने विटामिन•A की संरचना के बारे में बताया जिसके लिए इन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ।
विटामिन – D 
रासायनिक नाम – कैल्सिफेरॉल, सन-शाईन एंटी रिकेटिक विटामिन
स्त्रोत – कॉड लिवर तेल, धूप की उपस्थिति में हमारी त्वचा में 7•हाइड्रॉक्सी कॉलेस्टेरॉल विटामिन• D का निर्माण करता है।
कार्य – ये विटामिन हमारी आँतों में कैल्शियम एवं फॉस्फोरस के अवशोषण को बढ़ाकर  अस्थियों को मजबूत बनाने में सहायक।
कमी से होने वाले रोग –
1. रिकेट्स (बच्चों में)
2. ऑस्टियोमेलेशिया(वयस्कों में) 
इस रोग को सूखा रोग भी कहा जाता है।  
इस रोग में अस्थियाँ कमजोर पड़ जाती है।
विटामिन – E 
रासायनिक नाम – टोकोफेरॉल, एंटीस्टिर्लिटी विटामिन
स्त्रोत – साबुत एवं अंकुरित अनाज, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, फल आदि
कार्य – 
•  RBC के विकास में सहायक 
•  DNA संश्लेषण में सहायक तथा युग्मकों के निर्माण में आवश्यक 
•  एंटीऑक्सीडेन्ट विटामिन के रूप में
कमी से होने वाले रोग• नपुंसकता, बाँझपन, RBC की कमी, त्वचा पर झुर्रियों का विकास
विटामिन – K
रासायनिक नाम – नेफ्थाक्विनोन, फिल्लोक्विनोन (K1), मेनाक्वनोन (K2), मेनाडाइओन (K3), एंटी – हीमोरेजिक विटामिन 
स्त्रोत – अंकुरित अनाज, पत्तेदार सब्जियाँ, बड़ी आँत में उपस्थित बैक्टीरिया द्वारा विटामिन K का संश्लेषण किया जाता है।
कार्य – यह यकृत में प्रोथ्रोम्बिन के निर्माण में सहायक है, ये प्रोथ्रोम्बिन चोटग्रस्त स्थान पर रक्त का थक्का जमाने में सहायक है। 
कमी – रक्त के थक्का निर्माण की क्रिया प्रभावित होती है।
नोट – डैम ने सन् 1939 में विटामिन K1 को अलग किया था तथा इसी वर्ष डोजी ने विटामिन K2 को अलग किया था। इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए इन्हें रसायन के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार मिला था।

जल  में घुलनशील विटामिन –
विटामिन – B1
•  अन्य नाम – थायमिन, एंटी बेरी•बेरी विटामिन
•  स्रोत – साबुत अनाज, अंकुरित अनाज, पत्तेदार सब्जियाँ, Nuts (मूँगफली, चना, बादाम आदि)।
•  कार्य –
(i) कोशिकीय वृद्धि एवं विकास में सहायक।
(ii) तंत्रिका तंत्र की क्रियाशीलता में सहायक।
(iii) ट्रिप्टोफैन अमीनो अम्ल को नियासिन में परिवर्तित करने में सहायक।
(iv) यह क्रेब चक्र (TCA) में थाइमीन पाइरोफॉस्फेट की तरह व्यवहार करता है।
कमी से होने वाले रोग –
1. बेरी-बेरी (भूख कम लगना, वजन कम)
2. न्यूराइटिस (तंत्रिकाओं का विकास बाधित होना)
3. वरनिक्स व कोरसाकॉफ सिन्ड्रोम – शराबखोरों में ज्यादा एल्कोहॉल के सेवन से विटामिन B1 की कमी से यह सिन्ड्रोम उत्पन्न होता है।
नोट – एल्कोहॉल यकृत में विटामिन•B1 के उपापचय में बाधा पहुँचाता है, जिसकी खोज आइजकमेन ने वर्ष 1897 में की थी।
विटामिन – B2
•  अन्य नाम – राइबोफ्लेविन, पीला एंजाइम्स/Vit•G
•  स्रोत – दूध, पनीर, मक्खन, चीज, दही, अण्डे, माँस आदि।
•  कार्य –
(i) कोशिकीय वृद्धि एवं विकास में सहायक
(ii) श्वसन के दौरान FMN तथा FAD के निर्माण में सहायक
(iii) कोशिकीय वृद्धि एवं विकास में सहायक
कमी से होने वाले रोग –
1. ओष्टविदरक (कीलोसिस) – होठों के किनारों का फटना
2. ग्लासाईटिस – जीभ पर छाले होना
3. किरेटाइसिस – गालों की त्वचा का फटना
नोट – 
1. FMN (फ्लेविन मोनो न्यूक्लियोटाइड) ETC में कार्य करते हैं।
2. FAD (फ्लेविन एडेनिन डाई न्यूक्लियोटाइड), TCA तथा ETC दोनों में कार्य करता है।

विटामिन – B3
•  अन्य नाम – निकोटिनिक अम्ल, नियासिन, PP विटामिन (पेलाग्रा प्रिवेटिंग)
•  स्रोत – साबुत अनाज, काष्ठफल, फली, यीस्ट, यकृत, मछली, माँस और मुर्गियाँ
•  कार्य –
(i) यह TCA चक्र में NAD तथा NADP निर्माण में सहायक है।
(ii) ये विभिन्न प्रोटीन के अवशोषण में तथा ट्रिप्टोफैन अमीनो अम्ल के उपापचय में सहायक है, जिससे कोशिकीय वृद्धि तथा विकास प्रेरित होती है।
कमी से होने वाले रोग –
1. श्वसन क्रिया प्रभावित
2. पेलाग्रा व हार्टनप रोग (4D सिन्ड्रोम) ® डर्मेटाइटिस, डायरिया, डिमेंशिया, डेथ
नोट – 
1. वर्ष 1937 में एल्वीजेम ने निकोटिनिक अम्ल की खोज की थी।

विटामिन – B5
•  अन्य नाम – पेन्टाथीनिक अम्ल
•  स्रोत – दूध, यीस्ट, मूँगफली, टमाटर, पनीर, यकृत, मछली, पत्तेदार सब्जियाँ
•  कार्य – (i) स्वस्थ त्वचा और बालों के लिए उपयोगी
(ii) TCA चक्र में को•एन्जाइम्स A के रूप में कार्य करता है।
(iii) यह ऑस्टियो आर्थराइट्स, पर्किसन बीमारी तथा प्रीमेन्सटअल सिन्ड्रोम में मुख द्वारा दिया जाता है।
कमी से होने वाले रोग –
1. डर्मेटाइटिस
2. शारीरिक वृद्धि कम होना
3. बालों का गिरना
4. बालों का सफेद होना
नोट – पेन्टाथीनिक अम्ल को विलियमस और सहयोगियों ने सन् 1933 में ज्ञात किया था।

 विटामिन – B7
•  अन्य नाम – बायोटीन, विटामिन-H
•  स्रोत – अण्डा(पका हुआ), यकृत, माँस, दालें, साबुत अनाज
•  कार्य – कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन व वसा में सहायक
कमी से होने वाले रोग –
1. शारीरिक विकास में कमी
2. बालों का झड़ना
3. डर्मेटाइटिस
नोट – 
1. कोगल और टोनिस में सन् 1936 में बायोटीन की खोज की।
2. कच्चा अण्डा खाना नहीं चाहिए क्योंकि अण्डे के सफेद भाग में एविडीन प्रोटीन होता है, जो बायोटिन (Vit-B7) के अवशोषण को रोक देता है।

 विटामिन – B6
•  अन्य नाम – पायरीडॉक्सिन
•  स्रोत – सोयाबीन, मूँगफली, फलीदार, भोजन, अण्डा, माँस, मछली आदि।
•  कार्य –
(i) प्रोटीन उपापचय में सहायक
(ii) टीबी की वृद्धि को रोकता है।
(iii) तंत्रिका तंत्र की क्रियाशीलता हेतु आवश्यक
कमी से होने वाले रोग –
1. डर्मेटाइटिस
2. शारीरिक वृद्धि कम होना
3. उल्टी दस्त एवं शारीरिक कमजोरी अनुभव करना।
4. तंत्रिका तंत्र का विकास न होना।

विटामिन – B9
•  अन्य नाम – विटामिन•M, फोलेसिन, फॉलिक अम्ल
•  स्रोत – हरी पत्तेदार सब्जियाँ
•  कार्य – (i) RBC के विकास में सहायक 
कमी से होने वाले रोग –
1. RBC का परिपक्व न हो पाने से रक्त में बड़े आकार की अपरिपक्व RBC ज्यादा दिखाई देती है, जिसे मेगालोब्लास्टिक रक्ताल्पता रोग कहते हैं।
नोट – 
1. फॉलिक अम्ल की खोज सन् 1934 में लूसी विल्स ने की थी।

विटामिन –  B12
•  अन्य नाम – सायनेकोबाल्मिन/कोबाल्मिन/कैसल एक्सट्रींसिक कारक
•  स्रोत – स्पाईरुलीना शैवाल (अंतरिक्ष यात्रियों का भोजन), अण्डा, माँस, यकृत (जंतु उत्पाद)
•  कार्य –
(i) RBC उत्पादन में सहायक
(ii) तंत्रिका तंत्र की वृद्धि
(iii) DNA संश्लेषण में सहायक
कमी से होने वाले रोग –
1. इसकी कमी से पर्नीशियस/प्रणाशी/घातक एनीमिया रोग होता है।
नोट• इसमें कोबाल्ट (Co) तत्त्व पाया जाता है।

विटामिन – B17
•  अन्य नाम – लेटेराइल
•  कार्य – B17 प्रतिकेंसर गुणयुक्त
•  स्रोत – गेहूँ, घास, जूस

विटामिन – C
•  अन्य नाम – एस्कॉर्बिक अम्ल, एंटी•स्कर्वी विटामिन
•  स्रोत – खट्टे फल (अमरूद, आँवला, नींबू, संतरा मौसमी, मिर्च)
•  कार्य – दाँतों एवं मसूड़ों की वृद्धि के लिए आवश्यक
(ii) RBC एवं एंटीबॉडी निर्माण/रोग प्रतिरोधक क्षमता के विकास के लिए सहायक
(iii) एंटीऑक्सीडेन्ट विटामिन
कमी से होने वाले रोग –
 स्कर्वी रोग(मसूड़ों में सूजन एवं बार•बार रक्त आना)

विटामिन – P
•  अन्य नाम – हेस्पेरिडीन, सिट्रीन
•  स्रोत – खट्टे फल
•  कार्य – रक्त नलिकाओं की दीवारों को मजबूत बनाना।
कमी से होने वाले रोग –आंतरिक रक्त स्त्रवण
खनिज लवण –
•  ये शरीर के उचित विकास एवं अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होते हैं।
•  हमारे शरीर में अल्प मात्रा में लगभग 20 प्रकार के खनिज आयनों के रूप में मौजूद होते हैं।
•  इसे अल्प पोषक तत्त्व भी कहा जाता है।
•  खनिज तत्त्वों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
(1) लघु/सूक्ष्म पोषक तत्त्व
(2) दीर्घ/गुरू पोषक तत्त्व
1. लघु पोषक तत्व
• आयरन  आयोडीन
• कॉपर कोबाल्ट
• मैंग्नीज क्रोमियम
• जिंक मॉलीब्डेनम
• सेलेनियम फ्लोरीन
2. दीर्घ पोषक तत्व
• फॉस्फोरस मैग्नीशियम
• सल्फर सोडियम
• पोटेशियम क्लोरीन
• कैल्शियम 

 1. गुरूपोषक तत्त्व –
(a) फॉस्फोरस (P)
• कोशिका झिल्ली के निर्माण में सहायक।
• दाँतो एवं अस्थियों के निर्माण के लिए सहायक।
• ATP,DNA,RNA आदि का घटक
(b) सल्फर (S)
• सिस्टीन तथा मैथिऑनीन अमीनो अम्ल का घटक
• प्रोटीन निर्माण (कैरोटीन के संश्लेषण) में सहायक।
(c) पोटेशियम (K)
• अम्ल क्षार संतुलन
• तंत्रिकाओं में सूचनाओं की गति हेतु Na+•K+ पम्प का निर्माण 
(d) कैल्शियम (Ca)
• दाँतों एवं अस्थियों के निर्माण में सहायक 
• रक्त का थक्का जमाने में सहायक माँसपेशियों की गति में सहायक 
(e) मैंग्नीशियम (Mg)
• माँसपेशियों की गति में सहायक 
(f)  सोडियम (Na)
• रक्त दाब का नियमन
• Na+•K+ पोषक तत्त्व की कमी से निम्न रक्तचाप तथा पेशियों में ऐंठन आती है।
(g) क्लोरीन (Cl)
• परासरण नियमन में सहायक 

2. लघुपोषक तत्त्व
(1) आयरन (Fe)
• हीमोग्लोबिन तथा मायोग्लोबिन के निर्माण में सहायक।
(2) कॉपर (Cu)
• रक्त में आयरन के अवशोषण को बढ़ाकर इसे हीमोग्लोबिन निर्माण के लिए उपलब्ध कराता है।
• साइटोक्रोम ऑक्सीडेज एन्जाइम्स का सहघटक, लौह उपापचय, संयोजी ऊत्तकों और रूधिर वाहिनियों का विकास तथा त्वचा में मेलानिन पिगमेंट का निर्माण
(3) मैंग्नीज (Mn)
• ये जननाँगों तथा स्तन ग्रंथियों के विकास के लिए आवश्यक।
• यूरिया•संश्लेषण तथा फॉस्फेट समूहों के स्थानान्तरण तथा फॉस्फेट समूहों के स्थानान्तरण से संबंधित अभिक्रियाओं के कुछ एन्जाइम्सों के सहघटक।
(4) जिंक (Zn)
• कई एन्जाइम्सों के Co•Factor में सहायक।
• हृदय की क्रियाशीलता तथा इन्सुलिन की सक्रियता के लिए आवश्यक
(5) सेलेनियम (Se)
• विटामिन E के निर्माण में तथा एंटी ऑक्सीडेन्ट के रूप में उपयोगी।
• संयोजी ऊत्तकों के लोच के लिए आवश्यक
• थायरॉइड ग्रंथि के सुचारु रूप से कार्य करने हेतु जरूरी।
(6) आयोडीन (I)
• ये थायरॉइड हॉर्मोन्स के निर्माण में सहायक।
• थायरॉइड की क्रियाशीलता को बनाए रखने में सहायक।
(7) कोबाल्ट (Co)
• Vit•B12 के निर्माण में आवश्यक।
• RBC के निर्माण में सहायक।
(8) क्रोमियम (Cr)
• ग्लूकोज तथा अपचयी उपापचय में महत्वपूर्ण।
• हृदय की क्रियाशीलता तथा इन्सुलिन की सक्रियता में आवश्यक।
(9) फ्लोरीन (F)
• दाँतों को सड़ने से बचाता है।
नोट•   दाँतों की दूर्बलता तथा फ्लोरीन की अधिकता से फ्लोरासिस नामक रोग होता है।
(10) मॉलीब्डेनम (Mo)
• एन्जाइम्सों के सहायक के रूप में।
• आयरन के अवशोषण को बढ़ाकर हीमोग्लोबिन निर्माण में सहायक।
नोट – मॉलीब्डेनम तत्त्व की कमी से नाइट्रोजनीय अपजात पदार्थों के उत्सर्जन में अनियमितता आती है।

रेशे/Fibers
• ये सामान्यत: पॉलिसैकेराइड्स के बने होते हैं तथा ये अत्यधिक जलावशोषण (Water ebsorption) की क्षमता रखते हैं। 
• ये आहारनाल में भोजन की गति को बनाये रखते हैं तथा पाचन क्रिया को नियमित बनाये रखते हैं।
उदाहरण• सेल्युलोज, हेमी सेल्युलोज, म्यूकोपॉलीसैकेराइड
• ‘डायटरी फायबर्स’ अपाच्य कार्बोहाइड्रेट्स जैसे• सेल्यूलोज आदि के बने होते हैं, इनसे आँत की सफाई का कार्य भी होता है।

संतुलित भोजन
• ऐसा भोजन, जिसमें प्रत्येक पोषक पदार्थ उचित मात्रा एवं अनुपात में मनुष्य की आवश्यकता के अनुसार प्रत्येक पोषक पोषक तत्व से युक्त हो, संतुलित भोजन कहलाता है।
• एक वयस्क मनुष्य हेतु प्रतिदिन के भोजन में लगभग• 500 ग्राम प्रोटीन, खनिज•लवण, विटामिन्स व रेशेदार पोषक पदार्थ पर्याप्त मात्रा में होने चाहिए।

पोषण – असामान्यताएँ
• उपापचयी दर (Metabolic Rate)
मनुष्य में प्रतिदिन उसकी क्रियाशीलता के आधार पर ऊर्जा आवश्यकता को उपापचयी दर के रुप में व्यक्त करते हैं, यह उपापचयी दर 3 प्रकार की होती है
1. आधारी उपापचीय दर (BMR) – कुछ कार्य न करने की दशा में भी व्यक्ति को लगभग 1600 किलो कैलोरी ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसे BMR कहते हैं।
2. दैनिक उपापचयी दर (Daily Metabolic rate) – सामान्य रुप से क्रियाशील व्यक्ति को दैनिक ऊर्जा आवश्यकताएँ इस प्रकार है –
नर – 2800 किलोकैलोरी, मादा 2300 कैलोरी
3. सक्रिय उपापचीय दर (Active Metabolic Rate) –  अत्यधिक परिश्रम करने वाले व्यक्ति की ऊर्जा आवश्यकताएँ इस प्रकार हैं – नर 6000 किलोकैलोरी व मादा – 4500 किलोकैलोरी

असामान्यताएँ
1. मैरस्मस(Marasmus)
•  प्रोटीन एवं अन्य ऊर्जा युक्त पोषक पदार्थों की  कमी के कारण यह रोग होता है।
•  इसे PEM(Protien Energy 
Malnutrition) भी कहते हैं।
•  यह 1 वर्ष तक के बच्चों में पाया जाता है।
•  इस रोग के लक्षण• पूरे शरीर पर वसा स्तर का अभाव, दुबला•पतला शरीर, त्वचा पर झुर्रियाँ, बालों का झड़ना आदि।
2. क्वाशिओरकोर(Quasiorkor)
•  यह रोग केवल प्रोटीन की कमी के कारण होता है
•  यह रोग 1 स 5 वर्ष तक के बच्चों में पाया जाता है।
•  इस रोग के लक्षण• शरीर पर सूजन, गोलाकार चेहरा, फूला हुआ पेट आदि है।
3. मोटापा (Obesity)
• अत्यधिक वसायुक्त भोजन के सेवन तथा शारीरिक श्रम की कमी से शरीर में वसा का स्तर बढ़ने लगता है, रक्त में कॉलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ती है, इससे शरीर का वजन बढ़ जाता है।
• मोटापा के कारण हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, रक्त नलिकाओं में ब्लॉकेज, हाइपरटेंशन, हार्मोनल असन्तुलन आदि समस्याएँ होने लगती हैं।
नोट- “बेरियाट्रिक सर्जरी मोटापे को दूर करने की तकनीक है, जिसमें छोटी आँत को काटा जात है।”
4. कब्ज (Constipation)
• आहारनाल में भोजन की गति धीमी होने, जल की कमी से मल शुष्क और कठोर हो जाता है तथा नियमित रूप से मलत्याग नहीं होता है।
5. फ्लोरोसिस (Fluoroisis)
•  पेयजल में फ्लोराइड की अधिकता से दंतक्षय, दाँतो का पीलापन, हड्डियों की कमजोरी, टेढ़ापन एवं जोडों में दर्द आदि समस्याएँ होने लगती है।
•  जल में फ्लोरीन की अनुकूलतम स्तर (optimum Level) 1PPM होता है।
•  फ्लोरोसिस प्रभावित क्षेत्रों को कुबड़ पट्टी कहा जाता है।

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