उत्सर्जन तंत्र (Excretory System)

उत्सर्जन तंत्र (Excretory System)

  • नाइट्रोजन युक्त अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर त्यागना उत्सर्जन कहलाता है।

  • नाइट्रोजन युक्त पदार्थ जैसे प्रोटीन, अमीनो अम्ल आदि से नाइट्रोजनी भाग (NH2/अमीनो समूह) को यकृत में पृथक कर लिया है, इस क्रिया को विऐमीनीकरण (deamination) कहते हैं।

  • नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों में वृक्क (kidney) द्वारा उत्सर्जित किया जाता है।

  • उत्सर्जन से अलग मल त्याग (Defaecation) की क्रिया में अपचित भोजन को शरीर से बाहर त्याग दिया जाता है।

  • उत्सर्जी पदार्थों के आधार पर जीवों को मुख्यतया 3 वर्गों में बाँटा गया है-

(i)  अमोनोटेलिक

(ii)  यूरियोटेलिक

(iii) यूरिकोटेलिक

  1. अमोनोटेलिक

  • इन जन्तुओं में उत्सर्जी पदार्थ ‘अमोनिया’ होता है।

  • अमोनिया अत्यधिक विषाक्त पदार्थ होता है।

  • अत्यधिक विषाक्त के कारण इसके उत्सर्जन के लिए जल की अत्यधिक आवश्यकता होती है।

उदाहरण- अमीबा, पैरामिशियम, स्पंज, निडेरियन्स, अस्थिल मछलियाँ (Bony fishes), मेढ़क का टेडपोल लार्वा तथा पूंछ वाले उभयचर जैसे सेलामेण्डर, एस्केरिस, केंचुआ व मगरमच्छ

ii 
यूरियोटेलिक:-

  • इन जन्तुओं में उत्सर्जी पदार्थ ‘यूरिया’ होता है।

  • यूरिया अपेक्षाकृत कम विषाक्त पदार्थ होता है अत: उत्सर्जन के लिए कम जल की आवश्यकता होती है।

उदाहरण- स्तनधारी (मनुष्य), उभयचर (मेढ़क), जलीय सरीसृप जैसे कछुआ, घड़ियाल, उपास्थिल मछलियाँ, शार्क, एस्केरिस व केंचुआ।

iii 
यूरिकोटेलिक:-

  • इसमें उत्सर्जी पदार्थ ‘यूरिक अम्ल’ होता है।

  • सबसे कम विषाक्त पदार्थ यूरिक अम्ल होता है।

  • इनमें उत्सर्जन के लिए न्यूनतम जल की आवश्यकता होती है।

उदाहरण- पक्षी वर्ग के जन्तु, कीट (Insects), सरीसृप तथा स्थलीय घोंघा

उत्सर्जन से संबंधित महत्त्वपूर्ण तथ्य-

  • एस्केरिस व केंचुआ दोहरे उत्सर्जी जीव हैं, क्योंकि ये दोनों जल की अधिकता में अमोनिया तथा जल की कमी में यूरिया का उत्सर्जन करते हैं।

  • मेढ़क का टेडपोल लार्वा अमोनिया का उत्सर्जन करता है लेकिन वयस्क मेढ़क यूरिया का उत्सर्जन करता है।

  • इकाइनोडर्मेटा के सदस्य जैसे एस्टेरियस तथा मोलस्का के सदस्य जैसे यूनियो, लिम्निया अमीनोटेलिक हैं, जो अमीनो अम्ल का उत्सर्जन करते हैं।

  • मकड़िया गुआनोटेलिक है, जो गुआनीन का उत्सर्जन करती है।

  • समुद्री पक्षियों जैसे ‘सीगल (seagull)’ के उत्सर्जी पदार्थ मल में यूरिक अम्ल अत्यधिक मात्रा में होता है, इसके मल को ग्वानो (Guano) कहते हैं, जो कि फसलों के अच्छे खाद के रूप में कार्य करता है।

  • मानव उत्सर्जन तंत्र में ‘वृक्क’ मानव का प्रमुख उत्सर्जी अंग है, इसके अलावा मानव उत्सर्जन तंत्र में निम्न संरचनाएँ शामिल हैं-

  1. वृक्क (Kidney)

  2. मूत्राशय (Urinary Bladder)

  3. मूत्र वाहिनियाँ (Ureters)

  4. मूत्रमार्ग (Vrethra)

    i वृक्क (Kidney)

  • मनुष्य में वृक्क प्रमुख उत्सर्जी अंग है।

  • इनकी संख्या 1 जोड़ी अर्थात् 2 होते हैं, जिसमें दाएँ वृक्क की तुलना में बायाँ वृक्क थोड़ा ऊपर स्थित होता है।

  • ये गहरे लाल-भूरे रंग के, सेम के बीज के समान होते हैं।

  • इनका आकार 12cm X 6cm X 3cm होता है।

  • इनका वजन मादा की तुलना में नर का वजन अधिक होता है अर्थात‌्        

150-180 gm (नर)

135-150 gm (मादा)

  • वृक्क आखिरी थोरेसिक एवं तीसरी कटि मेरुदण्ड के बीच स्थित होते हैं।

  • वृक्क का निर्माण भ्रूणीय मीसोडर्म से होता है।

  • वृक्क मेटानेफ्रिक (पश्चवृक्क) प्रकार के होते हैं।

  • वृक्क के ऊपरी छोर को एड्रीनल ग्रंथि टोपीनुमा आकार में ढ़के रहती है।
    ii 
    मूत्राशय (Urinary bladder)

  • ये थैलेनुमा, त्रिकोणीय संरचना (नाशपती के आकार का), जिसमें मूत्र वाहिनियाँ मूत्र को पहुँचाती है।

  • इसमें ड्रिटेसर पेशियाँ पाई जाती है तथा ये आयतन में प्रसार कर सकता है।
    iii 
    मूत्र वाहिनी (Ureter)

  • प्रत्येक किडनी से एक मूत्र वाहिनी मूत्र को लेकर मूत्राशय में खुलती है।

  • इनकी लम्बाई 25 से 30 सेमी होती है।

  • इसका वृक्क में स्थित प्रारंभिक भाग चौड़ा व कीपनुमा होता है, जिसे वृक्क श्रोणि कहते हैं।
    iv 
    मूत्रमार्ग (Ureter)

  • मूत्राशय से मूत्रमार्ग से होता होता हुआ, मूत्र शरीर से बाहर उत्सर्जित किया जाता है।

  • मूत्र मार्ग पर अवरोधिनी पेशियाँ (Spnincter muscle) पाई जाती है, जो सामान्यत: मूत्र मार्ग को कसकर बंद रखती है, इनके शिथिलन होने पर मूत्र त्याग किया जाता है।

  • नर में मूत्रमार्ग अधिक लम्बा (लगभग 20 सेमी) होता है, जिसमें से होकर मूत्र व वीर्य दोनों ही बाहर निकलते हैं।

  • स्त्रियों में मूत्रमार्ग की लम्बाई कम (लगभग 4 सेमी) होती है।

  • नर में मूत्र मार्ग तीन भागों से बना होता है-

  1. प्रोस्टेट/यूरिथ्रल भाग

  2. झिल्लीनुमा

  3. शिश्नी भाग
    • 
    मानव में वृक्क मुख्य उत्सर्जन का कार्य करते हैं परन्तु कुछ अन्य अंग भी उत्सर्जन का कार्य करते हैं, जो निम्न है-

  1. त्वचा (skin) – यूरिया, लवण, पसीना

  2. फेफड़े (Lungs) – CO2

  3. यकृत (Liver) – पित्त रस तथा कोलेस्ट्रॉल

वृक्क के कार्य (Functions of Kidney)

  1. जल तथा लवण का संतुलन बनाना।

  2. परासरणीय क्रियाओं का नियमन

  3. यह इरिथ्रोपोएटीन का स्त्रावण करती है, जो अस्थिमज्जा में RBC के निर्माण को प्रेरित करती है।

  4. यह रेनिन का स्त्रावण करती है, जो एन्जियोटेन्सीन-2 को एन्जियोटेन्सिन-1 में परिवर्तित करती है, जिससे रुधिर का दाब बढ़ जाता है।

  5. रुधिर PH का नियमन।

वृक्क की संरचना (Structure of Kidney)

 

  • मानव में प्रत्येक वृक्क चारों तरफ से दृढ़ संयोजी ऊतक के खोल से घिरा रहता है, जिसे वृक्क सम्पुट कहते हैं।

  • वृक्क सम्पुट (Renal Capsule) दो भागों में विभेदित होता है-

  1. वल्कुट (cortex)

  2. मध्यांश (medula)

  1. वल्कुट (cortex)

  • यह सम्पुट के नीचे स्थित होता है तथा मैलपीघी कायों के कारण कणिकामय दिखाई देता है।

  • इसमें वृक्क नलिकाओं के मैलपीघी काय, समीपस्थ कुण्डलित भाग तथा दूरस्थ कुण्डलित भाग पाए जाते हैं।
    ii 
    मध्यांश (Medulla)

  • यह वृक्क का भीतरी भाग होता है।

  • इसमें वृक्क नलिकाओं के हेनले के लूप तथा संग्रह नलिकाएँ पाई जाती है।

  • किडनी के इस भाग में त्रिभुजाकार संरचनाएँ पाई जाती है, जिन्हें पिरैमिड कहा जाता है।

  • इन पिरैमिडों के मध्य नलिकाकार संरचनाएँ पाई जाती है, जिसे बर्टिनी के स्तंभ कहते है।

  • इस बर्टिनी के स्तंभ से छोटी-छोटी नलिकाएँ मिलकर एक मुख्य नलिका का निर्माण करती है, जिसे बेलिनाई नलिका कहा जाता है।

  • ये बेलिनाई नलिका, मूत्र वाहिनी नलिका से जुड़ी रहती है।

वृक्काणु (Nephrons):-

  • वृक्क नलिकाएँ/नेफ्रॉन्स वृक्क की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई है।

  • प्रत्येक वृक्क में लगभग 10-12 लाख महीन, लम्बी तथा कुंडलित नलिकाएँ पाई जाती है, जिसे नेफ्रॉन्स कहते हैं।

  • वृक्क नलिका के भाग निम्न हैं-

  1. मैलपीघीकाय

  2. हेलने का लूप

  3. दूरस्थ कुंडलित नलिका

  4. संग्रह नलिकाएँ

मैलपीघी काय (Malpiguian Body)

  • प्रत्येक वृक्क नलिका का अग्रभाग मैलपीघी काय कहलाता है।

  • यह दो भागों बोमन सम्पुट व केशिका गुच्छ से बना होता है।

बोमन सम्पुट

  • यह एक प्यालेनुमा संरचना है, जिसमें केशिका गुच्छ धंसा रहता है।

  • इनकी भित्ति द्विस्तरीय एवं महीन होती है, जो शल्की उपकला से बने होते हैं।

  • इसमें पोडोसाइट‌्स (Podocytes) कोशिकाएँ पाई जाती है, जो सूक्ष्म छिद्रों की सहायता से बोमन सम्पुट की झिल्ली को पारगम्य बना देती है।

केशिका गुच्छ (Glomerulus)

  • बोमन सम्पुट की गुहा में केशिका गुच्छ पाया जाता है।

  • इसमें रुधिर को ले जाने वाली नलिका को अभिवाही धमनी तथा वापस ले जाने वाली धमनी को अपवाही धमनी कहते हैं।

  • अभिवाही धमनी का व्यास अपवाही धमनी की अपेक्षा अधिक होता है।

ग्रीवा

  • इसकी भित्ति रोमाभी उपकला (ciliated epithelium) से बनी होती है।

समीपस्थ कुंडलित नलिका (PCT)

  • यह नलिका घनाकार उपकला ऊतकों से निर्मित होती है।

  • इसके किनारों पर अनेक सूक्ष्मांकुर पाए जाते हैं, जिसे ब्रुश बॉर्डर (Brush Border) कहते हैं।

  • ब्रुश बॉर्डर (Brush Border) PCT का सतही क्षेत्रफल (अवशोषण का तल) बढ़ाते हैं।

  • PCT में सक्रिय अवशोषण हेतु ऊर्जा प्रदान करने के लिए अधिक मात्रा में माइटोकॉन्ड्रिया पाए जाते हैं।

  • इस भाग में केशिका गुच्छीय निस्यंद का 2/3 भाग पुन: अवशोषित कर लिया जाता है।

हेनले का लूप (Henle’s Loop)

 

  • यह वृक्क नलिका के मध्य का तथा PCT का अंतिम भाग हेनले का लूप होता है।

  • हेनले का लूप ‘U’ आकार का होता है।

  • यह दो भुजाओं आरोही भुजा व अवरोही भुजा में विभेदित रहता है।

  • अवरोही भुजा शल्की उपकला द्वारा आस्तरित होती है, जो समीपस्थ कुण्डलित नलिका (PCT) में खुलती है।

  • आरोही भुजा घनाकार उपकला द्वारा आस्तरित रहती है, जो दूरस्थ कुण्डलित नलिका (DCT) में खुलती है।

दूरस्थ कुण्डलित नलिका (DCT)

  • ये नलिकाएँ छनाकार उपकला द्वारा आस्तरित रहती है।

  • इन कोशिकाओं में सूक्ष्मांकुर नहीं पाए जाते हैं।

संग्रह नलिका (collecting tubules)

  • दूरस्थ कुण्डलित नलिका संग्रह नलिका में खुलती है।

  • बहुत सी संग्रह नलिकाएँ मिलकर एक मोटी प्रमुख संग्रह नलिका का निर्माण करती है, जिसे बेलिनाई की वाहिनी (Duct of Bellini) कहते हैं।

  • संग्रह नलिकाएँ वृक्क के पिरैमिड में स्थित होती है।

  • संग्रह नलिकाएँ एक स्तरीय ग्रंथि उपकला द्वारा आस्तरित होती है।

मूत्र निर्माण की प्रक्रिया (Formation of Urine)

  • यकृत कोशिकाओं में बने यूरिया को रुधिर द्वारा वृक्कों में लाया जाता है।

  • यकृत में यूरिया युक्त रुधिर यकृत शिरा द्वारा पश्च महाशिरा में डाल दिया जाता है। पश्च महाशिरा से यूरिया को रुधिर से पृथक किया जाता है।

  • वैज्ञानिक कुशनी ने मूत्र निर्माण की क्रिया निम्न तीन चरणों की बताई-

  1. परानिस्यंदन (Ultrafileration)

  2. वरणात्मक पुनरावशोषण (Selective reabsorption)

  3. स्त्रावण (Secretion)

    परानिस्यंदन (Ultrafileration)

  • ग्लोमेरुलस में अभिवाही धमनियाँ रक्त को लेकर आती है तथा यह रक्त ग्लोमेरुलस में एक दाब 70MMHg लगाते हैं, जिसे ग्लोमेरुलस हाइड्रोस्टेटिक दाब कहते हैं।

  • ग्लोमेरुलस में रक्त कणिकाएँ, रुधिर प्रोटीन, रुधिर में उपस्थित कोलाइडी कण नहीं बनते हैं।

  • ग्लोमेरुलस में छना रक्त, ग्लोमेरुलस निस्यंद कहलाता है।

  • यह छना हुआ रक्त बोमन सम्पुट के गुहा में जाता है, जिसे परानिस्यंद कहते हैं।

    ii 
    वरणात्मक पुनरावशोषण (Selective reabsorption)

  • परानिस्यंद क्रिया से उत्पन्न ग्लोमेरुलस निस्यंद के अन्दर यूरिया, यूरिक अम्ल, क्रिएटिनिन आदि उत्सर्जी पदार्थों के साथ साथ ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, कुछ वसीय अम्ल, विटामिन तथा जल पाए जाते है।

  • इसमें उपस्थित लाभदायक पदार्थों को वृक्क में उपस्थित नलिकाओं द्वारा पुन: अवशोषित कर लिया जाता है तथा इसे वापस रक्त में मिला दिया जाता है, जिसे वरणात्मक पुनरावशोषण कहा जाता है।

  • वृक्क नलिका के विभिनन भागों में पुनरावशोषण निम्नानुसार होता है-
    PCT में पुनरावशोषण

  • इसकी आन्तरिक भित्ति पर माइटोकॉन्ड्रिया तथा अनेक सूक्ष्मांकुर पाए जाते हैं, जिसमें पुनरावशोषण की क्षमता 20 गुना बढ़ जाती है।

  • इस भाग में ग्लूकोज, विटामिन, अमीनो अम्ल, पोटेशियम, सोडियम तथा फॉस्फोरस का अवशोषण होता है।

  • वृक्क द्वारा पदार्थों का पुनरावशोषण उनके वृक्कीय देहली मान के अनुरुप होता है

    ii 
    हेनले लूप में पुनरावशोषण

  1. अवरोही भुजा में- अवरोही भुजा जल के लिए पारगम्य होती है तथा विद्युत अपघट्य के लिए अपारगम्य होती है।

  • अवरोही भुजा में रुधिर प्लाज्मा एवं निस्यंद की परासरणीयता बराबर होती है, जो Na+, k+ तथा Cl के कारण बराबर होती है।

  • यहाँ निस्यंद अति परासरणीय (Hypertonic) हो जाता है।

  1. आरोही भुजा में- इसकी भुजा Na+ तथा Cl आयनों के लिए पारगम्य तथा जल के लिए अपारगम्य होती है। यहाँ निस्यंद समपरासरणी (Isotonic) हो जाता है।

  2. DCT में पुनरावशोषण-

  • यहाँ Na+ तथा Cl का पुनरावशोषण जारी रहा है।

  • यहाँ जल का लगभग 19% भाग अवशोषित होता है।

  1. संग्रह नलिका में पुनरावशोषण

  • इस भाग द्वारा निस्यंद से जल के अणुओं का पुन: अवशोषण किया जाता है, जिससे निस्यंद अति परासरणी (Hypertonic) हो जाता है।

  • इस नलिका की अग्र भित्ति जल के अणुओं के लिए कुछ पारगम्य तथा अंतिम भाग यूरिया के लिए कुछ पारगम्य होती है।

  1. स्त्रावण

  • रुधिर से कुछ हानिकारक उत्सर्जी पदार्थ जैसे रंगा पदार्थ, कुछ औषधियाँ, यूरिक अम्ल, हिप्यूरिक अम्ल आदि परानिस्यंदन के समय ग्लोमेरुलस निस्यंद में छन नहीं जाते हैं।

  • इसे नलिकीय स्त्रावण भी कहते है क्योंकि इसमें पुन: रुधिर से अपशिष्ट पदार्थ मूत्र में मिलते हैं। यह शरीर का आयनिक संतुलन बनाए रखता है।

उत्सर्जन संबंधी रोग (Disorder Related to exceretion)

  1. पाइयूरिया (Pyurea)- मूत्र में मवाद कोशिकाओं का पाया जाना।

  2. हीमेटोयूरिया (Haematourea)- मूत्र के साथ RBC का निष्कासित होना।

  3. प्रोटीन्यूरिया- मूत्र में प्रोटीन की मात्रा सामान्य से अधिक होना।

  4. यूरेमिया (Uremia)- जब रक्त में यूरिया की मात्रा 10-30mg/100ml से अधिक जाती है।

  5. गॉउट (Gout)

  • यह आनुवांशिक रोग है।

  • इसमें रुधिर में यूरिक अम्ल की मात्रा अधिक हो जाती है।

  • यूरिक अम्ल संधियों तथा वृक्क ऊतकों में जमा हो जाता है।

  • यह रोग निर्जलीकरण, डाईयूरेटिक तथा उपवास से बढ़ता है।

  1. ग्लाइकोसूरिया (Glycosuria)

  • मूत्र में शर्करा की उपस्थिति व उत्सर्जन ग्लाइकोसूरिया कहलाता है।

  • यह रोग इन्सुलिन हॉर्मोन्स की कमी से होता है, जिसे डाइबिटीज मैलिटस कहते है।

  1. डिसयूरिया (Disurea)

मूत्र त्याग के समय दर्द की अवस्था।

  1. पॉलीयूरिया (Polyurea)

यह नेफ्रॉन के द्वारा जल का पुन: अवशोषण न हो पाने से मूत्र का आयतन बढ़ जाता है, जिसे बहुमूत्रता (polyurea) कहते हैं।

  1. सिस्टिटिस (Cystitis)

इसमें जीवाणु के संक्रमण के, या रासायनिक क्षति के कारण मूत्राशय में सूजन (प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ जाने में भी)

 

  1. पीलिया (Jaundice)

  • मूत्र में पित्त वर्णकों का अत्यधिक मात्रा में पाया जाना।

  • हिपेटाइटिस के समय।

  1. हीमोग्लोबिन यूरिया (Haemoglobinurea)

मूत्र में Hb की उपस्थिति

  1. एल्केप्टोन्यूरिया (Alcaptonurea)

  • इसे कृष्ण मूत्र रोग (Black Urine Disease) भी कहते हैं क्योंकि एल्कैप्टोन वायु के सम्पर्क में आने से मूत्र काला दिखाई देता है।

  • मूत्र में एल्कैप्टोन/हीमोजेन्टीसिक अम्ल पाया जाना।

  1. कीटोन्यूरिया (Ketonuria)

मूत्र में कीटोन काय जैसे ऐसीटो एसीटिक अम्ल आदि की मात्रा बढ़ जाना।

  1. ओलीगोयूरिया (Oligourea)

मूत्र की मात्रा सामान्य से कम

  1. डाइबिटीज इन्सीपिड्स (Diabetes Insipidus)

  • ADH हॉर्मोन्स के अल्पस्त्रावण के कारण दूरस्थ कुण्डलित नलिका व संग्राहक नलिका में जल का अवशोषण नहीं हो पाता है।

  • इस रोग को  मूत्रता भी कहते हैं, जिसमें रोगी बार-बार अधिक मात्रा में मूत्र त्याग करता है और प्यास भी ज्यादा लगती है।

  1. एल्ब्यूमिन यूरिया (Albuminurea)

मूत्र में एल्ब्यूमिन प्रोटीन की मात्रा बढ़ना।

  1. ब्राइट रोग/नेफ्रिटिस (Brigut’s Disease)

  • यह रोग केशिका गुच्छ में स्ट्रेप्टोकोकाई जीवाणु के संक्रमण से उत्पन्न होता है।

  • इसके कारण ग्लोमेरुलस में सूजन आ जाती है।

Note-

नेफ्रिटिस का इलाज नहीं होने पर ऊतकों में तरल जमा होने पर टांगे फूल जाती है, इसे एडीमा या ड्रोप्सी कहते हैं।

  1. जलीय शोथ (Oedema)

ऊतकों में अत्यधिक मात्रा में तरल एकत्र होने पर।

  1.  असंयम (Incontinence)

मूत्र त्याग का नियंत्रण न करने की अवस्था।

कारण- बाह्य अवरोधिनी के तंत्रिका मार्ग का पूरी तरह से निर्माण न हो पाना।

• रुधिर अपोहन (Haemodialysis)

  • किडनी जब अपना कार्य करना बंद कर देती है, तो रक्त में यूरिया की मात्रा बढ़ जाती है, इस अवस्था को यूरेमिया (Uremia) कहते हैं।

  • यूरिया व अन्य अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने के लिए कृत्रिम वृक्कीय युक्ति की आवश्यकता पड़ती है, इसे रुधिर अपोहन (Haemodialysis) कहा जाता है।

  • इसके खोजकर्ता c-मूर्रे है, जिन्होंने 4 मार्च, 1954 को इसकी खोज की थी।

वृक्क प्रत्यारोपण

जब रोगी मनुष्य में वृक्क पूरी तरह कार्य करना बंद कर देते है, तो उन्हें भी उपचारित नहीं किया जा सकता है और इनके स्थान पर दूसरे स्वस्थ व्यक्ति के वृक्क लगाये जाते हैं, वृक्क प्रत्योरोपण कहलाता है।

मानव मूत्र

  • मूत्र हल्के पीले रंग का तरल है, जिसमें अपशिष्ट पदार्थ मुख्यतया नाइट्रोजन युक्त अपशिष्ट पदार्थ पाए जाते हैं।

  • मानव के मूत्र का PH 6.4 (हल्का अम्लीय) होता है।

  • स्वस्थ व्यक्ति प्रतिदिन 1 से 1.5 लीटर मूत्र का त्याग करता है।

  • मूत्र का संग्रहण –  नर 800ml

मादा 500ml

  • मूत्र का पीला रंग यूरोक्रोम वर्णक के कारण है, जो मृत RBC के हीमोग्लोबिन के विघटन से बनता है।

  • मूत्र की मात्रा, जल, शारीरिक कार्य, शोधन एवं वातावरणीय तापमान पर निर्भर करती है।

  • मूत्र के रासायनिक संगठन में निम्न सम्मिलित है-

  1. H2O

  2. यूरिया

  3. यूरिक अम्ल

  4. क्रिएटिनिन

  5. हिप्यूरिक अम्ल

  6. Nacl

  7. NH3

Important Fact in Daily Science

  • लम्बे समय तक भूखे व्यक्ति के मूत्र में ‘Nacl’ की मात्रा ज्यादा होती है।

  • गर्भवती तथा दुग्धपान महिला के मूत्र में क्रिएटिनिन की मात्रा ज्यादा होती है।

  • मानव के मूत्राशय में कुछ सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं, जो यूरिया को अमोनिया में बदल देते है, तथा इस अमोनिया के कारण मूत्र की विशेष गंध आती है।

  • मानव की किडनी के पास प्रतिदिन 180 लीटर/दिन रुधिर आता है।

  • जब हेनले का लूप छोटा एवं मध्यांश में कम धँसा रहता है, तो उस वृक्काणु को वल्कुटीय वृक्काणु तथा यदि हेनले लूप बड़ा एवं मध्यांश में अन्दर की ओर धँसा होता है, तो उसे जुकस्टा मध्यांशीय वृक्काणु कहते हैं।

  • औसतन वृक्क से प्रतिदिन 1100-1200 मिली रुधिर छनता है, जो हृदय के निलय द्वारा प्रतिमिनट पम्प किए गए रुधिर का 1/5वाँ भाग होता है।

  • चाय, कॉफी, एल्कोहॉल आदि के अत्यधिक सेवन से मूत्र की मात्रा बढ़ जाती है, जिसे डाइयूरेटिक्स (Diuretics) कहते हैं।

  • वृक्क के ऊतकों में कैल्शियम ऑक्सलेट तथा फॉस्फेट के जमाव से वृक्क पथरी का निर्माण होता है।

  • वृक्क की पथरी को ऑपरेशन द्वारा या लिथोट्रॉपी (Lithotropy) की सहायता से हटाया जाता है।

  • किडनी में संक्रमण का पता लगाने में इनुलिन नामक पॉलीसैकेराइड सहायक हैं, यह डहेलिया की जड़ों में उपस्थित होता है।

  • रक्त अपोहन द्वारा ‘यूरेमिया’ रोग से ग्रसित व्यक्ति के जीवनकाल को बढ़ाया जा सकता है।

  • G.H.P. (Glomerular hydrostatic) दाब ग्लोमेरुलस की कोशिकाओं के कारण होता है, जो 70MMHg होता है।

  • BCOP (Blood Collodial Osmotic Pressure) 30MMHg होता है, जो प्लाज्मा प्रोटीन के कारण होता है।

  • CHP (Capsular hydrostatic Pressure) 20MMHg का लगता है, जेा बोमन कैप्सूल के कारण लगता है।

  • EFP (Effective Filtration Pressure) –

GHP – (BCOP + CHP)

Filtration Fraction = GFR
                                         RPF

GFR – Glomerular Filtration Rate

RPF – Renal Plasma Flow

जीव व उसके उत्सर्जी अंग

जीव

उत्सर्जी अंग

सीलेन्ट्रेटा 

शरीर की सतह एवं मुख

प्रोटोजोआ

प्लाज्मा मेम्ब्रेन

एस्केहेल्मिन्थीज

रेनेट कोशिका

एनेलिडा

नेफ्रीडिया

ऑथ्रोपोडा (कीट)

मैलपीघी नलिकाएँ

केंचुआ

उत्सर्जिकाएँ/क्लोरोगोगेन कोशिकाएँ

फीताकृमि

फ्लेम कोशिकाएँ

अमीबा

शरीर की सतह एवं मुख

झींगा मछली

हरी ग्रंथियाँ

सिफेलोकॉर्डेटा

प्रोटोनेफ्रिडिया

यूरोकॉर्डेटा

Neurl Gland

प्लेटीहेल्मिन्थीज

ज्वाला कोशिकाएँ

मोलस्का

Organ of Bojanus and Keber’s Organ

 

उत्सर्जन की कार्यिकी

  1. विअमोनीकरण (Deamination)

अतिरिक्त अमीनोअम्ल का विअमोनीकरण यकृत कोशिकाओं में पाया जाता है।

यह दो प्रकार का होता है-

  1. Oxidative

 

  1. Hydrolytic – 1 oxidative deamination

  1. ऑर्निथीन चक्र

इसे हेन्स क्रेब तथा Kurt Henseleit ने वर्ष 1932 में खोजा था, इसे kreb Henseleit Cycle कहते है।

  • यह liver चक्र में पाया जाता है।

  • एक ऑर्निथीन चक्र में 3ATP अणुओं का उपयोग होता है।

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