मानव रोग

Dis + ease
¯
Dis
= absence (अनुपस्थित)
Ease = सामान्य/आरामदायक अवस्था

  • पोषण विकार, संक्रमण के कारण, आनुवांशिक कारणों से, किसी अंग(organ) के क्षतिग्रस्त हो जाने से जब व्यक्ति सामान्य क्रियाएँ कर पाने में सक्षम न हो तो ऐसी अवस्था 'रोग' (Disease) कहलाती है।

  • एक व्यक्ति के स्वस्थ होने को केवल राेगों की अनुपस्थिति से ही नहीं दर्शा सकते हैं, शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्णत: स्वस्थ होना ही व्यक्ति को नीरोगी बनाता है।

I. जन्मजात रोग (Congenital disease) –

  • ऐसे रोग, जो बच्चे में जन्म से ही पाए जाते हैं, 'जन्मजात रोग' कहलाते हैं।

  • ये सामान्यतया 'आनुवांशिक रोग' होते हैं।

1.   मेण्डेलीयन विकार – गुणसूत्रों (Chromosomes) की संरचना में परिवर्तन। जैसे – हीमोफिलिया, वर्णांधता

2.   गुणसूत्री विकार – गुणसूत्रों की संख्या में परिवर्तन। जैसे – क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम, डाउन सिंड्रोम

II. उपार्जित रोग (Acquired disease) –

  • जन्म लेने के बाद के जीवन में होने वाले रोग।

1.   संक्रामक (Contegious) – रोगी व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में फैलते हैं। सूक्ष्मजीवों से फैलते हैं।

2.   गैरसंक्रामक (Non-cantagious) – रोगी व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में नहीं फैलते हैं।

रोगों से संबंधित परिभाषाएँ –

1.   रोगकारक (Pathogon) – ये सामान्यतया सूक्ष्मजीव होते हैं, जो कि रोग उत्पन्न करते हैं। उदाहरण – प्लाज़्मोडियम मलेरिया का रोगकारक है।

2.   रोगवाहक (Vector) – ये किसी रोगकारक को अपने शरीर में भोजन एवं आवास प्रदान करते हैं तथा रोगकारक के प्रसार में सहायता करते हैं। उदाहरण – मादा एनोफिलिज़ मच्छर मलेरिया के रोगकारक (प्लाज्मोडियम) की रोगवाहक है।

3.   वाहक (Carrier) – ये किसी रोगकारक को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने का कार्य करते हैं। उदाहरण – मक्खी 'हैजा' की वाहक है।

4.   आशय (Reservoir) – ये जीव किसी रोगकारक को अपने शरीर पर आवास तो प्रदान करते हैं, लेकिन स्वयं इससे प्रभावित नहीं होते हैं तथा अप्रत्यक्ष रूप से रोगकारक को फैलाने में सहायता करते हैं।

फल चमगादड़ (Fruit Bat), निपाह वायरस का अाशय (Reservoir) है।

5.   इन्टरफेरॉन – वायरस संक्रमण के समय हमारी कोशिकाओं के द्वारा स्रावित प्रोटीन से बना पदार्थ, जो कि इनके संक्रमण को बढ़ने से रोकता है।

6.   टीकाकरण (Vaccination) – ये रोगों के प्रति प्रतिरोधकता (Immunity) उत्पन्न करने में सहायक। ये टीके मुख्यतया 2 प्रकार के –

सक्रिय टीका

(Active Vaccine)

  • इसमें किसी रोगकारक को निष्क्रिय या मृत अवस्था में शरीर में डाला जाता है, जिससे हमारे शरीर में उस रोगकारक के प्रति एंटीबॉडी का निर्माण हो जाता है।

  • ये पूरे जीवनभर रोग से सुरक्षा प्रदान करता है। उदाहरण – पोलियो वैक्सीन

निष्क्रिय टीका

(Inactive Vaccine)

  • इसमें पहले से तैयार एंटीबॉडीज़ को हमारे शरीर में प्रवेश कराया जाता है।

  • ये कम समय तक रोग के प्रति सुरक्षा प्रदान करता है। उदाहरण – टिटेनस वैक्सीन

7.   एंटीजन – वह बाहरी पदार्थ, जो हमारे प्रतिरक्षा तंत्र (Immunity System) को सक्रिय कर दे, 'एंटीजन' कहलाता है। ये सजीव या निर्जीव भी हो सकता है। उदाहरण – वायरस, बैक्टीरिया, धूल-मिट्‌टी के कण।

8.   एंटीबॉडीज़ – हमारे शरीर में एंटीजन के प्रति सुरक्षा हेतु प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System) के द्वारा एंटीबॉडीज़ का निर्माण किया जाता है।

एण्डेमिक/Endonic

(स्थानीय रोग)

  • किसी क्षेत्र विशेष में ही पाया जाता है। उदाहरण – घेंघा/goitre(पहाड़ी क्षेत्रों में)

एपिडेमिक/Epidemic

(जानपदिक रोग)

  • कुछ देशों/राज्यों में फैला हुआ रोग। उदाहरण – प्लेग/Plague

पैण्डेमिक/Pendemic

(महामारी)

  • लगभग पूरे विश्व में फैला हुआ रोग। उदाहरण – COVID-19 स्वाइन फ्लू।

9.   ट्यूबरक्यूलोसिस (T.B.) –

      (a) MDR थैरेपी (Multiple Drug Resistant Therapy)

      (b) DOTS : Direct Observation Treatment Short-course

टायफॉइड/एन्टेरिक फीवर/मोतीझरा/Slow-fever/मियादी बुखार –

  • रोगकारक – साल्मोनेला टायफी

  • संक्रमण – दूषित जल एवं भोजन से

  • लक्षण – आँतों में संक्रमण, उल्टी-दस्त, तेज बुखार, जो कि शाम-रात्रि में बहुत तेज हो जाता है।

  • परीक्षण – विडाल-टेस्ट

  • टीका – TAB वैक्सीन (टायफॉइड, पैराटायफॉइड A& B)

  • उपचार – एंटीबायोटिक दवाएँ

कॉलेरा/हैजा/विसूचिका –

  • रोगकारक – विब्रियो कॉलेरी (कोमा (') की आकृति के बैक्टीरिया)

  • वाहक – मक्खी

  • संक्रमण – दूषित जल एवं भोजन से

  • लक्षण – आँतों में संक्रमण, उल्टी-दस्त एवं तेज बुखार

  • परीक्षण – Schick Test (शिक परीक्षण)

  • टीका – TABC (टॉयफाइड, पैराटायफॉइड A व B, कॉलेरा) ड्यूकोरल वैक्सीन

  • उपचार – एंटीबायोटिक दवाएँ, ORS का घोल (Oral Rehydration Solution)

डिफ्थीरिया (गलघाेंटू) –

  • रोगकारक – कीर्निबैक्टीरियम डिफ़्थिरियाई

  • संक्रमण – संक्रमित वस्तुओं एवं दूषित जल भोजन से

  • लक्षण – गले में संक्रमण, गहरे लाल-दाने दिखाई देते हैं। श्वसन मार्ग(Trachea) में गाढ़ा पदार्थ ठोस होकर जमने लगता है, जिससे साँस लेने (Breating) में कठिनाई।

  • परीक्षण – Sputum Test (कफ परीक्षण)

  • वैक्सीन – DPT वैक्सीन (डिफ्थीरिया, परट्यूसिस, टिटेनस)

  • उपचार – एंटीबायोटिक दवाएँ

परट्यूसिस/काली खाँसी/कुकर खाँसी/100 days cough (whooping cough) –

  • रोगकारक – हीमोफिलस परट्यूसिस/बोर्डेटेला परट्यूसिस

  • संक्रमण – संक्रमित वस्तुओं एवं रोगी के संपर्क में आने से

  • लक्षण – लगातार लंबे समय तक चलने वाली खाँसी (Cough), जिसमें कुत्ते के पिल्ले जैसी आवाज उत्पन्न होती है। कई बार पसलियों में फ्रेक्चर, हर्निया।

  • वैक्सीन – DPT टीका

  • उपचार – एंटीबायोटिक दवाएँ

बोटुलिज़्म (खतरनाक खाद्य विषाक्तता/Food poisoning) –

  • रोगकारक – क्लोस्ट्रीडियम बोटुलिनम (अनॉक्सी बैक्टीरिया)

  • संक्रमण – डिब्बाबन्द भोज्य पदार्थों में उपरोक्त जीवाणु के संक्रमण से।

  • लक्षण – संक्रमित भोजन का सेवन करने के बाद तंत्रिका तंत्र एवं माँसपेशियाँ प्रभावित, व्यक्ति बेहोश, उपचार न मिलने पर मृत्यु।

  • उपचार – एंटी-टॉक्सिन्स, एंटीबायोटिक्स

कुष्ठ रोग/लेप्रोसी/हेनसन का रोग –

  • रोगकारक – मायकोबैक्टीरियम लैप्रे

  • संक्रमण – रोगी व्यक्ति के संपर्क में लगातार रहने पर दूषित जल एवं भोजन से

  • लक्षण – शरीर के दूरस्थ अंग (Distal organs) पर सफेद दाग बनते तथा यहाँ की कोशिकाएँ नष्ट होती रहती हैं, जिससे ये अंग गलने लगते हैं।

  • टीका – BCG वैक्सीन इसमें भी उपयोगी।

  • उपचार – एंटीबायोटिक दवाएँ (MDR थैरेपी)

  • परीक्षण – लेप्रोमिन टेस्ट

प्लेग/काली मौत/Black-Death/ब्यूबोनिक प्लेग –

  • रोगकारक – येरसीनिया पेस्टिस

  • रोगवाहक – जीनोप्सिला चियोप्सिस (आरियंटेलिस रेट फ़्लाई)

  • आशय – चूहा

  • लक्षण – लसिका तंत्र में संक्रमण, शरीर दूरस्थ अंग काले पड़ने लगते हैं, जिससे गेंग्रीन होने लगता है।

  • वैक्सीन – प्लेग-वैक्सीन (कम प्रभावी)

  • उपचार – एंटीबायोटिक दवाएँ एवं शल्य चिकित्सा

एंथ्रेक्स –

  • रोगकारक – बैसीलस एंथ्रेसिस

  • संक्रमण – रोगी के व्यक्ति के संपर्क में आने से संक्रमित दुधारू पशुओं (cattle) से

  • लक्षण – त्वचा पर छाले (Blisters), श्वसन पथ में संक्रमण

  • वैक्सीन – एंथ्रेक्स वैक्सीन

  • उपचार – एंटीबायोटिक दवाएँ

  • बैसीलस एंथ्रेसिस का दुरुपयोग जैविक हथियार के रूप में किया जाता है।

 

गोनेरिया/सूजाक

सिफलिस

रोगकारक

नेस्सिरिया गोनोराई

ट्रेपोनीमा पैलिडम

संक्रमण

संक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षिम यौन-संबंध

गोनेरिया के समान

लक्षण

जननांगों में संक्रमण, मूत्र करते समय जलन, मूत्र पथ में घाव बन जाते हैं। बाँझपन(Sterlity)

गोनेरिया के समान + याद्दाश्त में कमी आने लगती है, बाल झड़ने लगते हैं। बाँझपन

उपचार

एंटीबायोटिक दवाएँ

एंटीबायोटिक दवाएँ

न्यूमोनिया –

  • रोगकारक – डिप्लोकोकस या न्यूमोकोकस या स्ट्रेप्टोकोकस निमोनियाई

  • संक्रमण – दूषित जल एवं भोजन से

  • लक्षण – तेज बुखार, जुखाम एवं फेफड़ों में संक्रमण, साँस लेने में कठिनाई।

  • उपचार – एंटीबायोटिक दवाएँ

 

वायरस जनित रोग

बड़ी माता(Small Pox)/ चेचक –

  • रोगकारक – वेरियोला वायरस

  • संक्रमण – रोगी के संपर्क में आने से, संक्रमित वस्तुओं से

  • लक्षण – पूरे शरीर पर संक्रमित तरल से भरे दानों (Blisters) का निर्माण, संक्रमण ठीक होने के बाद भी त्वचा पर ये गड्‌ढों के रूप पाए जाते थे।

  • उपचार – लक्षणात्मक उपचार

  • वैक्सीन – स्मॉल पॉक्स वैक्सीन (एडवर्ड जेनर)

छोटी माता/चिकन पॉक्स –

  • रोगकारक – वैरीसेला जोस्टर वायरस

  • संक्रमण – संक्रमित वस्तुओं से, रोगी के संपर्क में आने से।

  • लक्षण – तेज बुखार, पूरे शरीर पर संक्रमित तरल से युक्त गहरे लाल रंग के दाने (Blisters) बन जाते हैं, जो कि संक्रमण मुक्त होने पर ठीक।

  • उपचार – लक्षणात्मक उपचार

  • नोट – बड़ी माता(Small Pox) का विश्व से उन्मूलन हो चुका है।

  • चिकन पॉक्स जीवन में एक बार ही होता है। इसके बाद शरीर एंटीबॉडी बन जाने के कारण दुबारा संक्रमण नहीं होता है।

डेंगू (Dengue) –

  • रोगकारक – डेंगू वायरस

  • रोगवाहक – एडीज़ इजिप्टाई मच्छर

  • संक्रमण – संक्रमित मच्छर के काटने से

  • लक्षण –

प्रथम अवस्था में (प्रारंभिक 4-5 दिन) → तेज बुखार + शरीर में दर्द (हड्‌डी तोड़ बुखार/Bone-Breaking Fever)

द्वितीय अवस्था में (4-5 दिन बाद) → प्लेटलेट्स की संख्या में कमी आने लगती है। रक्त पतला होने से आंतरिक रक्त स्राव होने लगता है।

  • आंतरिक रक्त स्राव होने लगता है। रक्त दाब कम हो जाने से रोगी बेहोश फिर कोमा में जा सकता है।

  • उपचार – लक्षणात्मक उपचार

पोलियो मायलाइटिस –

  • रोगकारक – पोलियो वायरस/एन्टीरोवायरस/पिकोनो वायरस

  • संक्रमण – दूषित जल एवं भोजन से

  • लक्षण – सर्वप्रथम आँतों में संक्रमण से डायरिया, रोगकारक रक्त से होता हुआ, अस्थिमज्जा(Bone-Marrow) में संक्रमण करता है, साथ ही तंत्रिका तंत्र एवं पेशियाँ भी प्रभावित, जिससे विकलांगता उत्पन्न।

  • उपचार – उपलब्ध नहीं।

  • वैक्सीन – 2 प्रकार वैक्सीन

IPV

(Inactivated Polio Vaccine)

  • खोजकर्ता – साल्क

  • इसमें मृत वायरस को शरीर में इंजेक्शन के द्वारा डाला जाता है, जिससे शरीर में एंटीबॉडीज़ का विकास होता है।

OPV

(Oral Polio Vaccine)

  • खोजकर्ता – साबिन

  • इसमें जीवित लेकिन रोग उत्पन्न करने की क्षमता से रहित वायरस को मुखीय टीके (Oral Vaccine) के रूप में दिया जाता है।

  • नोट – मार्च, 2014 में भारत को पोलियो से मुक्त घोषित किया गया।

मम्प्स(Mumps)/गलसुआ –

  • रोगकारक – पेरामिक्सो वायरस

  • संक्रमण – रोगी के संपर्क में आने पर सामान्यतया बच्चों में लेकिन वयस्कों में भी।

  • लक्षण – पैरोटिड लार ग्रंथियों में सूजन, जो कि गले तक पहुँच जाती है। कभी ये वायरस रक्त से होता हुआ जननांगों में भी सूजन कर देता है, ऐसे में रोगी बन्ध्य हो सकता है।

  • वैक्सीन MMR (मम्प्स, मीज़ल्स व रुबेला)

  • उपचार – लक्षणात्मक उपचार

मीज़ल्स/ख़सरा/रुबियोला –

  • रोगकारक – रुबियोला वायरस

  • संक्रमण – रोगी के संपर्क में आने पर

  • लक्षण – चेहरे एवं गर्दन पर गहरे लाल रंग के दाने, तीव्र बुखार एवं साँस लेने में परेशानी।

  • वैक्सीन – MMR

  • उपचार – लक्षणात्मक उपचार

रुबेला/जर्मन खसरा –

  • रोगकारक – रुबेला वायरस

  • संक्रमण – रोगी व्यक्ति के संपर्क में आने से

  • लक्षण – खसरे के समान ही लक्षण

  • वैक्सीन – MMR

  • उपचार – लक्षणात्मक उपचार

  • नोट – वर्तमान में भारत सरकार के द्वारा स्कूलों, आँगनबाड़ी एवं मदरसों में MR-टीकाकरण किया जा रहा है, जिसके तहत् 13 वर्ष तक के बच्चों में मीज़ल्स एवं रुबेला के लिए टीकाकरण किया जा रहा है।

हर्पीज़ –

  • रोगकारक – हर्पीज़ वायरस

  • संक्रमण – रोगी व्यक्ति से

  • लक्षण – मुख के किनारों पर घाव हो जाना

  • वैक्सीन – हर्पीज़ वैक्सीन

  • उपचार – लक्षणात्मक उपचार

एड्स/AIDS/एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशियेंसी सिंड्रोम –

  • रोगकारक – HIV (ह्यूमन इम्यूनोडेफिशियेंसी वायरस)

  • संक्रमण – रोगी व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन संपर्क, माता से गर्भस्थ शिशु में, संक्रमित रक्त चढ़ाने से, संक्रमित सुई के प्रयोग से।

  • लक्षण – रोगप्रतिरोधक क्षमता में कमी, व्यक्ति में WBC की संख्या में कमी आने लगती है तथा धीरे-धीरे दूसरे संक्रमण होने से व्यक्ति के अंग कार्य करना बंद कर देते हैं। अंतत: मृत्यु।

  • उपचार – उपलब्ध नहीं, लेकिन जिडोवुडीन जैसी दवाएँ रोगी को कुछ समय तक तेज संक्रमण से बचाती है।

  • वैक्सीन –

  • परीक्षण – एलिसा परीक्षण(ELISA) – एंजाइम लिंक्ड इम्यूनो सोर्जेंट एस्से। निश्चयात्मक परीक्षण – वेस्टर्न ब्लॉट (PCR आधारित)

रेबीज़/जलभीति –

  • रोगकारक – रैब्डो वायरस

  • संक्रमण – रैबीज कुत्ते के काटने से।

  • लक्षण – कुत्ते के काटने के बाद घाव पर संक्रमण उत्पन्न माँसपेशियाँ प्रभावित विशेषतया गले की पेशियाँ, जल निगलने में परेशानी तथा स्वयं कुत्ता भी पागल होकर मर जाता है।

  • वैक्सीन – एंटी-रैबीज वैक्सीन

  • उपचार – लक्षणात्मक उपचार

हिपेटाइटिस –

  • रोगकारक – हिपेटाइटिस वायरस (A, B, C, D, E)

  • संक्रमण – दूषित/संक्रमित वस्तुओं से राेगी के संपर्क में आने से। हिपेटाइटिस B एवं C सबसे ज्यादा संक्रामक।

  • लक्षण – यकृत में संक्रमण होने से। इसमें सूजन एवं दर्द, पीलिया जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

  • उपचार – लक्षणात्मक उपचार

  • वैक्सीन/टीका – हिपेटाइटिस वैक्सीन

  • भारत में हिपेटाइटिस, वैक्सीन पहली वैक्सीन थी, जिसका निर्माण 'रिकॉम्बीनेंट DNA' तकनीक से किया गया तथा इसका व्यावसायिक उत्पादन किया गया।

  • अत्यधिक मात्रा में शराब/एल्कोहॉल का सेवन करने पर यकृत में वसा(Fat) का जमाव होने लगता है, जिससे यकृत में सूजन आने लगती है। इसे 'लीवर सिरोसिस' (Fotty Liver Syndrome)/वसीय यकृत संलक्षण भी कहते हैं।

मेनिन्जाइटिस –

  • रोगकारक – मुख्यतया वायरस लेकिन बैक्टीरिया एवं कवक के कारण भी हो सकता है।

  • संक्रमण – संक्रमित/दूषित वस्तुओं से, संक्रमित माता से शिशु में।

  • लक्षण – मस्तिष्क आवरण [मेनिंजेज़ (ड्यूरामैटर, एरेक्नोइड एव पायामीटर)] में संक्रमण के कारण सूजन आ जाती है, ऐसे में मस्तिष्क पर दबाव पड़ने लगता है, जिससे रोगी कोमा में भी जा सकता है।

  • उपचार – लक्षणात्मक उपचार।

अन्य वायरस जनित रोग –

  • इबोला – सर्वप्रथम अफ्रीका में 'इबोला नदी' के पास इसका वायरस देखा गया। इसमें शरीर से रक्त स्रवण अत्यधिक मात्रा में होने से रोगी की मृत्यु।

  • ज़ीका – ये ज़ीका वायरस, जो कि एडिज़ मच्छर के द्वारा मनुष्यों में संक्रमण उत्पन्न करता है।

  • इसका संक्रमण तो ठीक हो जाता है, लेकिन यदि कोई संक्रमित स्त्री ठीक होने के बाद भी 3-4 वर्ष के दौरान गर्भधारण करें, तो ऐसे में गर्भस्थ-शिशु के सिर एवं मस्तिष्क का विकास नहीं हो पाता है, जिसे 'माइक्रोसिफेली' कहते हैं। ऐसे में शिशु या तो गर्भावस्था में मर जाते हैं या जन्म के कुछ समय बाद मर जाते हैं।

  • निपाह – फल चमगादड़ इसके आशय होते हैं तथा निपाह वायरस इसका रोगकारक है। 2018 जून में केरल में संक्रमण।

  • सार्स/SARS(Severe Acute Respiratory Syndrome) – 2002 से 2004 के बीच चीन में फैला।

  • रोगकारक – SARS-COV(कोरोना वायरस)

  • Killer Pneumonia (किलर निमोनिया)

 

प्रोटोजोआ जनित रोग

मलेरिया –

  • रोगकारक – प्लाज़्मोडियम (Pl. वाइवेक्स, Pl. मलेरी, Pl. ओवेल, Pl. फैल्सीपेरम/घातक मलेरिया)

  • मनुष्य में प्लाज़्मोडियम की संक्रामक अवस्था – स्पोरोजॉइट

  • रोगवाहक – मादा एनोफिलीज़ मच्छर

(a) प्राथमिक पोषी (Primary Host) – मच्छर (लैंगिक अवस्था/जनन)

(b) द्वितीयक पोषी (Secondary Host) – मनुष्य (अलैंगिक अवस्था/जनन)

  • लक्षण – रात्रि में तीव्र कंपकंपी के साथ तेज बुख़ार आता है तथा दिन में मनुष्य स्वस्थ होने का अनुभव करता है।

  • उपचार – सिनकोना वृक्ष की छाल से प्राप्त कुनैन सल्फेट तथा 'हाइड्रॉक्सीक्लोक्विन'

अमीबियासिस/अमीबता/अमीबीय पेचिश –

  • रोगकारक – एण्टअमीबा हिस्टोलाईटिका

  • संक्रमण – दूषित जल एवं भोजन

  • लक्षण – आँतों में संक्रमण, उल्टी-दस्त एवं तेज बुख़ार, संक्रमण बढ़ने पर मल के साथ खून आना।

  • उपचार – एंटिबायोटिक दवाएँ, ORS (Oral Rehydration Solution)

पायरिया/पेरियोडोन्टाईटिस –

  • रोगकारक – एण्टअमीबा जिन्जीवेलिस तथा कभी बैक्टीरिया जनित।

  • संक्रमण – दाँतों की सफाई न करना, दूषित जल एवं भोजन से।

  • लक्षण – मसूड़ों में सूजन, रक्त स्रवण तथा मुँह से तेज दुर्गंध आना।

  • उपचार – स्केलिंग (विशेषज्ञ के द्वारा दाँतों की सफाई), एंटीबायोटिक दवाएँ, नियमित रूप से दाँतों की सफाई।

लीशमानियेसिस/काला बाजार/Black fever –

  • रोगकारक – लीशमानिया डोनोवानी

  • रोगवाहक – रेतमक्ख़ी/Sand-fly

  • लक्षण – RBC की संख्या में कमी, शरीर पर काले धब्बे बनने लगते हैं, एनीमिया के लक्षण दिखाई देते हैं।

  • उपचार – एंटीबायोटिक दवाएँ

ट्रिपनोसाेमियेसिस/अफ्रीकन निद्रा रोग –

  • रोगकारक – ट्रिपनोसोमा गैम्बियेन्स

  • रोगवाहक – सी-सी मक्खी (Tse-Tse fly)

  • लक्षण – जैविक घड़ी तंत्र प्रभावित (Biological Clock System), जिससे व्यक्ति को असमय ही निद्रा आती है।

  • उपचार – एंटीबायोटिक दवाएँ

 

 

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