श्वसन तंत्र

संवातन:- गैसों को शरीर के अंदर लेना तथा शरीर से बाहर छोड़ना संवातन कहलाता है।
संवातन एक भौतिक प्रक्रम है, न कि रासायनिक प्रक्रम है।

  • सामान्य संवातन की प्रक्रिया 12-16 बार प्रतिमिनट होती है।
  • कठिन परिश्रम करते समय संवातन की प्रक्रिया 25 बार प्रतिमिनट होती है।
  • सोते हुए व्यक्ति में संवातन 10 बार प्रतिमिनट होता है।
    श्वसन:- श्वसन एक जैव रासायनिक प्रक्रिया है, जिसमें ग्लूकोज का ऑक्सीकरण तथा विघटन होता है। जिसके फलस्वरूप कार्बनडाई ऑक्साईड (CO2), जल तथा ATP के रूप में ऊर्जा का निर्माण होता है।
    C6H12O6 + 6O2 6CO2 + 12H2O + 36 ATP
    श्वसन की प्रक्रिया के दौरान व्यक्ति के भार में कमी आती है।
    श्वसन की प्रक्रिया के चार चरण होते है।
  1. बाह्य श्वसन
  2. परिवहन
  3. आन्तरिक श्वसन
  4. कोशिकीय श्वसन

बाह्य श्वसन:- वातावरण तथा फुफ्फुस अर्थात् फेंफड़ो के मध्य गैसों का आदान-प्रदान बाह्य श्वसन कहलाता है।
परिवहन:- शरीर की 97% ऑक्सीजन का परिवहन हीमोग्लोबिन के रूप में होता है तथा केवल 3% ऑक्सीजन का परिवहन प्लाज्मा के रूप में होता है।

  • हीमोग्लोबिन एक संयुक्त प्रोटीन है जो कि हिम (Fe+2) तथा ग्लोबिन से निर्मित होता है।
  • हीमोग्लोबिन अम्ल तथा क्षार दोनों के समान व्यवहार करता है।
  • 1 हीमोग्लोबिन का अणु 4 ऑक्सीजन के अणुओं का परिवहन करता है।
  • हीमोग्लोबिन को श्वसनीय वर्णक कहा जाता है।
    Note: O2 के परिवहन के समय (Fe+2) फैरस आयन की ऑक्सीजन अवस्था में परिवर्तन नहीं होता है।
    कार्बन डाई ऑक्साईड का परिवहन:-
  • शरीर की 60-65% CO2 का परिवहन HCO3 (बाई कार्बोनेट) के रूप में होता है।
  • 20-25% परिवहन हीमोग्लोबिन के रूप में होता है।
  • 5-7% CO2 का परिवहन प्लाज्मा के रूप में होता है।
    आन्तरिक श्वसन:- रक्त तथा शरीर के अन्य ऊतको के मध्य गैसों का आदान-प्रदान आन्तरिक श्वसन कहलाता है।
    कोशिकीय श्वसन:- कोशिकाओं में उपस्थित ग्लूकोज को O2 के द्वारा तोड़कर CO2, H2O तथा ATP के रूप में ऊर्जा का निर्माण कोशिकीय श्वसन कहलाता है।

 

मानव श्वसन तंत्र के निम्न भाग होते है।
नासा
ग्रसनी
श्वासनली
फेंफडे
डायफ्राम
वायु कूपिका
नासा (NOSE) – श्वसन की प्रक्रिया नासा से प्रारंभ होती है।

  • नासा के पृष्ट भाग पर एक जोडी छिद्र पाए जाते हैं, जिन्हें नासा छिद्र कहा जाता है।
  • दोनों नासा छिद्र के मध्य हायलिन उपास्थि पाई जाती है।
  • नासा छिद्र में सिबेसियस ग्रन्थियाँ तथा रोम पाए जाते हैं।
  • रोम द्वारा वायु छानने का कार्य किया जाता है ताकि रेत के कण शरीर में प्रवेश न कर सके।
  • सिबेसियस ग्रन्थियाँ म्यूकस का स्त्रवण करती हैं, जिससे नासा गुहा नम बनी रहती है।
  • नाक में तीन अस्थियाँ पाई जाती हैं।
  1. नेजल
  2. मेक्सिला
  3. एथेमॉइड
    ग्रसनी (Pharynx):– ग्रसनी भोजन तथा वायु का उभयनिष्ठ मार्ग है।
    ग्रसनी पर एपिग्लोटिस नामक ढक्कन रूपी संरचना पाई जाती है जो कि भोजन को श्वासनली में जाने से रोकता है।
  • कई बार भोजन गलती से श्वासनली में चला जाता है तब डायफ्राम में लगातार संकुचन तथा शिथिलन होता है जिससे एक ध्वनि का निर्माण होता है, यह ध्वनि हिचकी कहलाती है।
    कंठ (Larynx)-
  • यह ध्वनि उत्पादक यंत्र है ।
  • महिलाओं का कंठ छोटा होता है तथा पुरुषों का कंठ बड़ा होता है।
  • पुरुषों के कंठ में एडल एप्पल नामक विशेष संरचना पाई जाती है।
  • पुरुष की ध्वनि निम्न तारत्व (ध्वनि का मोटा या पतला होना) वाली होती है, जबकि महिला की ध्वनि उच्च तारत्व वाली होती है।
  • उच्च तारत्व वाली ध्वनि प्रभावशाली यानि तेज होती है।
  • कंठ पर दो जोड़ी वाक् तन्तु पाए जाते हैं।
  1. 1 जोड़ी सत्य वाक् तन्तु
  2. 1 जोड़ी मिथ्या वाक् तन्तु
  • यदि कंठ से मिथ्या वाक‌् तंतु को हटा दिया जाए तो ध्वनि पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
  • जन्म से गूंगे व्यक्तियों में कंठ तो पाए जाते है परंतु वे वाणी का उच्चारण नहीं कर पाते क्योंकि उनके प्रमस्तिष्क में उपस्थित वाणी केन्द्र विकसित नहीं होते हैं।
    Note: पक्षियों के ध्वनि उत्पादक यंत्र को सिरिक्स कहा जाता है।
  • खरगोश की आवाज को किकियाना कहा जाता है।
    श्वासनली (Trachea)- श्वासनली की लंबाई 10 से 12 सेमी होती है।
  • श्वासनली कोमल तथा नाजुक होती है।
  • श्वासनली पर हायलिन उपास्थि से निर्मित C आकार के छल्ले पाए जाते हैं, जो श्वासनली को पिचकने नहीं देते है।
  • श्वासनली फेंफड़ों में जाकर दो भागों में बँट जाती है, जिसे प्राथमिक श्वसनी कहा जाता है।
  • प्राथमिक श्वसनिकाएँ आगे अनेक सूक्ष्म नलिकाओं में बँट जाती है। जिसे ब्रोंकियोल कहा जाता है।
  • ब्रोंकियोल अंत में वायु कूपिका में खुलता है तथा वायुकूपिका से गैसों का आदान प्रदान होता है। इसलिए वायु कूपिका को श्वसन की संरचनात्मक तथा क्रियात्मक इकाई कहा जाता है।
  • मानव में एक जोड़ी फेंफडे़ पाए जाते हैं।
  • फेंफडों में अन्तरापर्शुक पेशियाँ पाई जाती हैं।
  • फेंफड़ों के चारों तरफ 12 जोड़ी अर्थात् 24 पसलियाँ पाई जाती हैं।
    डायफ्राम:- यह फेंफडो के नीचे स्थित होता है।
  • यह मांसपेशियों का बना होता है।Note: मानव में श्वसन की प्रक्रिया विसरण द्वारा होती है।

अन्त:श्वसन

बहिश्वसन

अन्त:श्वसन में अन्तरापर्शुक पेशियाँ एवं डायफ्राम में संकुचन होता है।

बहिश्वसन में अन्तरापर्शुक पेशियाँ एवं डायफ्राम में शिथिलन होता है

वक्ष गुहा बाहर की तरफ गति करती है।

वक्ष गुहा अंदर की तरफ गति करती है।

वक्ष गुहा का आयतन बढ़ता है।

वक्ष गुहा का आयतन घटता है।

वक्ष गुहा का दाब घटता है।

वक्ष गुहा का दाब बढ़ता है।

 सांद्रता घटती है।

सांद्रता बढ़ती है।

विसरण के कारण गैसे बाहर से शरीर के अंदर प्रवेश करती है।

विसरण के कारण गैसे अंदर से शरीर के बाहर उत्सर्जित होती है।

इस प्रक्रिया में डायफ्राम चपटा हो जाता है।

इस प्रक्रिया में डायफ्राम सीधी हो जाता है।

अन्त:श्वसन में 2 सैकण्ड का समय लगता है।

बहिश्वसन में 3 सैकण्ड का समय लगता ह

श्वसन दो प्रकार का होता है।

वायवीय श्वसन/ऑक्सीश्वसन

अवायवीय श्वसन/अनॉक्सीश्वसन/किण्वन

यह ऑक्सीजन की उपस्थिति में होता है।

यह ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है।

यह माइटोकॉन्ड्रिया के मेट्रीक्स भाग में होती है।

अवायवीय श्वसन कोशिका द्रव्य में होता है।

 

वायवीय श्वसन के दौरान ग्लूकोज से CO2, H2O तथा ATP का निर्माण होता है।

अवायवीय श्वसन में ग्लूकोज के टूटने पर एथेनॉल, लैक्टिक एसिड, जल, CO2 तथा ATP का निर्माण होता है।

वायवीय श्वसन के दौरान 36 या 38 ATP का निर्माण होता है।

अवायवीय श्वसन के दौरान 2 ATP के अणुओं का निर्माण होता है।

अवायवीय श्वसन के उदाहरण:-

  1. जब व्यक्ति अधिक मात्रा में शारीरिक कार्य करता है। तब उसकी पेशी कोशिका में अवायवीय श्वसन होता है। जिससे फलस्वरूप कोशिका में लेक्टिक अम्ल का निर्माण हो जाता है। लेक्टिक अम्ल के कारण ही शरीर में थकान उत्पन्न होती है।
  2. एथेनॉल का निर्माण, बीयर का निर्माण
    एथेनॉल के निर्माण में जाइमेज एंजाइम का उपयोग किया जाता है।
  3.  गोबर गैस का निर्माण
  4. ब्रेड का निर्माण ब्रेड के निर्माण में सेकेरोमाइसीज सेरेवेसी का उपयोग किया जाता है।
  5. कुछ जीवाणुओं में अवायवीय श्वसन होता है।
    जैसे विनाइट्रीकरण करने वाले जीवाणु अवायवीय श्वसन करते हैं।
     श्वसन पथ:-
  • श्वसन पथ में चार चरण पाए जाते हैं।
  1. ग्लाइकोलाइसिस
  2. क्रेब्स चक्र
  3. लिंक रिएक्शन
  4. इलेक्टॉन परिवहन तंत्र
  1.  ग्लाइकोलाइसिस ग्लाइकोलाइसिस को EMP पाथ कहा जाता है।
  • ग्लूकोज से पायरुवेट निर्माण की प्रक्रिया ग्लाइकोलाइसिस कहलाती है।
  • ग्लाइकोलाइसिस की प्रक्रिया कोशिका द्रव्य में होती है।
  • ग्लाइकोलाइसिस में पायरुवेट के निर्माण के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अत: इसमें 2 ATP के अणु खर्च होते है।
  • पायरुवेट के निर्माण से 4 ATP के अणुओं का निर्माण होता हैं।
  • ग्लाइकोलाइसिस में शुद्ध ATP लाभ 2 ATP होता है।
  • ग्लाइकोलाइसिस में 2NADPH2 के अणुओं का निर्माण होता है।
  • 2 NADPH2 = 6 ATP
  • अत: ग्लाइकोलाइसिस में कुल 8 ATP का निर्माण होता है।
  • ग्लाइकोलाइसिस वायवीय तथा अवायवीय दोनों अवस्था में होता है।
    लिंक रिएक्शन
  • पायरुवेट का एसिटाइल को-एंजाइम में परिवर्तित होना ही Link-Reaction कहलाता है।
  • लिंक रिएक्शन माइट्रोकॉन्ड्रियाँ के मेट्रिक्स भाग में होता है। क्योंकि पायरुवेट को यहाँ O2  प्राप्त होती है।
  • लिंक रिएक्शन में NADPH2 के 2 अणुओं का निर्माण होता है।
  • लिंक रिएक्शन में 6 ATP के अणुओं का निर्माण होता है।
  • लिंक रिएक्शन को ग्लाइकोलाइसिस तथा क्रेब्स चक्र के मध्य योजक कड़ी कहा जाता है।
  1. क्रेब्स चक्र:-
  • यह प्रक्रिया माइट्रोकॉन्ड्रियाँ के मेट्रिक्स भाग में होती है।
  • एसिटाइल को-एंजाइम से ओक्जेलो एसिटिक अम्ल के निर्माण की प्रक्रिया क्रेब्स चक्र कहलाती है।
  • क्रेब्स चक्र में 1 GTP, 3 NADPH2 तथा 1 FADH2 के अणु का निर्माण होता है।
  • 1 GTP= 1ATP
    3  NADPH2 = 9 ATP
    1 FADH2 = 2 ATP
    अत: क्रेब्स चक्र में कुल 12 ATP के अणुओं का निर्माण होता है।
  • ग्लूकोज के पूर्ण ऑक्सीकरण के लिए क्रेब्स चक्र को दो बार चक्कर लगाना पड़ता है।
  • अत: ग्लूकोज के पूर्ण ऑक्सीजन से क्रेब्स चक्र में 24 ATP अणुओं का निर्माण होता है।
  1. ETS (इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र)
  • ETS माइट्रोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली पर होता है।
  • ETS में इलेक्ट्रॉन परिवहन की सहायता से श्वसन प्रक्रिया में निर्मित NADPH2, FADH2 तथा GTP को ATP में रुपांतरित किया जाता है।
  • ATP का संश्लेषण माइट्रोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली पर होता है क्योकि आंतरिक परत पर सकसीनाइल हिडाइड्रोजिनेज एंजाइम पाया जाता है।

RQ- (श्वसन गुणांक)- मुक्त CO2 का आयतन तथा प्रयुक्त O2 के आयतन का अनुपात कहलाता है।

                         

  • कार्बोहाइड्रेट का RQ 1 होता है।
  • श्वसन गुणांक की कोई इकाई तथा कोई विमा नहीं होती है।

श्वसन से संबंधित विकार
अस्थमा यह एक एलर्जी रोग है।

  • एस्पर्जिलस नामक कवक के संक्रमण से यह रोग होता है।
  • इस रोग में ब्रोक्रिया में सूजन आ जाता है।
  • इस रोग में व्यक्ति को संवातन में परेशानी आती है।
  • इस रोग का उपचार ब्रोकाडाइलाइटिस नामक थेरेपी है।
    एम्फाइसीमा यह एक Chornic रोग है।
  • यह रोग धूम्रपान के सेवन से होता है।
  • इस रोग में वायु कूपिकाओं में क्षति हो जाती है।
  • इस रोग में श्वसन सतह कम हो जाती है।
    सिलीकोसिस सिलिका की धूल से यह रोग होता है।
  • ब्रोकिया में सूजन आ जाती है।
    Black Lung Disease- यह रोग कोयले से होता है। इसमें व्यक्ति के फेंफडे अंदर से काले हो जाते है एवं शरीर का रंग नीला पड़ जाता है। यह रोग ब्लू बेबी सिण्ड्रोम कहलाता है।
    शरीर में ऊर्जा
  • ATP शरीर में ऊर्जा का रूप होती है।
  • जब व्यक्ति द्वारा कार्य किया जाता है तो ATP, ADP में परिवर्तित हो जाती है।
  • जब व्यक्ति द्वारा भोजन किया जाता है तो ADP, ATP में रुपांतरित हो जाती है।
  • ATP- एडिनोसिस ट्राई फॉस्फेट
  • ADP- एडिनोसिस डाई फॉस्फेट

मेट हीमोग्लोबिन जब हीमोग्लोबिन में उपस्थित आयरन (fe+2)की ऑक्सीजन अवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होता तो शरीर में O2 का परिवहन अच्छा होता है।
जब शरीर में नाइट्रेट व कार्बन मोनो ऑक्साइड की मात्रा अधिक हो जाती है तब हीमोग्लोबिन में उपस्थित आयरन की ऑक्सीकरण अवस्था में परिवर्तन हो जाता है जिस कारण शरीर में O2 का परिवहन धीमा हो जाता है।

  • जिस हीमोग्लोबिन में आयरन की ऑक्सीकरण अवस्था (fe+3)  हो, उसे मेटहीमोग्लोबिन कहा जाता है।
    ब्लू बेबी सिण्ड्रोम जब हीमोग्लोबिन में नाइट्रेट NO3 की मात्रा अधिक हो तो शरीर में शुद्ध तथा अशुद्ध रक्त मिश्रित हो जाते हैं। एवं शरीर का रंग नीला पड़ जाता है।
  • मानव में श्वसन की प्रक्रिया का नियमन पोन्स में स्थित न्यूमेटिक केन्द्र से होता है।
  • केंचुआ, जोंक, मेंढ़क में श्वसन त्वचा द्वारा होता है।
  • कीटों में श्वसनिकाओं द्वारा श्वसन होता है।
  • जलीय जीवो में –क्लोम (गलफड़े, गिल्स) द्वारा श्वसन होता है।
  • मानव में फेंफडो द्वारा श्वसन होता है।

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