संजीवों का वर्गीकरण

संजीवों का वर्गीकरण



विज्ञान की वह शाखा जिसके अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के जीव जन्तुओं का वर्गीकरण व नामकरण किया जाता है।

– वर्गीकरण : वर्गिकी एवं वर्गीकरण विज्ञान निश्चित नियमों अथवा सिद्धांतों पर आधारित वर्गीकरण हैं।

  • द्विनाम पद्धति : कैरोलस लीनियस द्वारा दी गई है पौधों व जीवों के दो नाम होते हैं।

 पहला नाम वंशीय व दूसरा जातीय होता है।

  • त्रिनाम पद्धति : वंश तथा जाति के अतिरिक्त उपजाति का भी नाम लिखा जाए उसे त्रिनाम पद्धति कहते हैं।

  • कैरोलस लिनीयस : आधुनिक वर्गीकरण का पिता "सिस्टेमा नेचुरी" में 4236 ज्ञात जातियों का वर्गीकरण  किया।

  • वर्गीकरण की इकाइयाँ/पदानुक्रम

    इसमें सभी तरह के पौधों को

    पादप में रखा गया है। 

  • वर्गीकरण की द्विजगत प्रणाली :

– अरस्तु द्वारा जीवों को दो समूहों में बाँटा गया :

 (i) जंतु (ii) वनस्पति

– कैरोलस लीनियस द्वारा जीवों को दो भागों में बाँटा गया।

 (i) जंतु जगत :-  – एक कोशिका जंतु, स्वपोषी होते हैं।

    – भोजन ग्रहण करने के लिए विशेष अंग होता है। जैसे – प्रोटोजोआ

 (ii) पादप :  – बहुकोशिकीय समुद्री पादप जीवाणु

    –  परपोषी होते हैं (भोजन के लिए अन्य पर निर्भर रहते हैं)

  • चार जगत वर्गीकरण :-

 वर्ष 1956 में एच.एफ. कोपलैण्ड द्वारा

 1. मोनेरा

 2. प्रोटिस्टा

 3. मेटाजोआ

  • पाँच जगत वर्गीकरण :-

वर्ष 1969 में व्हीटेकर द्वारा प्रस्तुत किया गया।

1. मोनेरा जगत (Monera)

2. प्रोटिस्टा (Protista)

3. फंजाई (Fungi)

4. प्लांटी (Plantai)

5. एनीमेलिया (Anmalia)

1.  मोनेरा जगत (Monera)

– इसका वर्णन सबसे पहले अर्नेस्ट ने किया था।

– एक कोशिकीय प्रोकेरियोटिक जीव इस वर्ग में आते हैं।

 जैसे :- जीवाणु, नील हरित, शैवाल, माइकोप्लाज्मा, तंतुमय जीवाणु आदि।

– इनकी कोशिका में केन्द्रक कला व केन्द्रिका नहीं पायी जाती है।

– इनमें जनन विभाजन/विखंडन द्वारा होता है।

– ये रासायनिक संश्लेषण के द्वारा पोषण करते हैं।

 जीवाणु (Bactaria)

– इसकी खोज एंटोनी वॉन ल्यूबोनहॉक ने की तथा जीवाणु नाम एहरेनबर्ग ने दिया था।

– इनकी कोशिका काइटिन की बनी होती है।  

– सामान्यत यह विषम पोषी होते हैं लेकिन कुछ स्वयंपोषी होते हैं।

– ये मिसोसोमस द्वारा श्वसन करते हैं।

  • कार्य

– नाइट्रीकरण – एजोबैक्टर, राइजोबियम

– भोजन विषाक्तता-क्लास्ट्रीडियम बोटुलीनम

– मृदा का विनाइट्रीकरण – थियोबेसिलस डेनिट्रिफिकेन्स

– खाद – मिथेनोजेनिक बैक्टीरिया

  • नील हरित शैवाल

– इन्हें साइनो बैक्टीरिया कहा जाता है।

– प्रकाश संश्लेषण से ऊर्जा प्राप्त होती है।

– धान के फसल में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करके नाइट्रोजन की आंशिक पूर्ति करता है।

  • माइको प्लाज्मा :

– इसे सूक्ष्म विज्ञान का जोकर कहा जाता है।

– इसमें DNA तथा RNA दोनों होते हैं।

– इसकी खोज नोकार्ड व रॉक्स ने की तथा नाम एल्बर्ट फ्रेंक ने दिया।

2.  प्रोटिस्टा जगत (Pootista Kingdom)

 इसका वर्णन हैकल ने किया था, ये पहले युकेरियोटिक थे इसमें भी एक कोशिकीय जीव आते हैं।

– इसमें कोशिका झिल्ली तथा हरित लवक पाए जाते हैं।

– ये लैंगिक और अंलैगिक दोनों प्रकार का जनन करते हैं।

– ये स्वपोषी तथा विषमपोषी दोनों प्रकार के होते हैं।

 इसमें तीन प्रकार के वर्ग होते हैं :-

 (a) प्रकाश संश्लेषी प्रोटिस्टा :

 इनमें शैवाल आते हैं तथा हरित लवक पाया जाता है। 

 उदा. युग्लीना (इसे पादप तथा जन्तु के बीच की कड़ी कहा जाता है।)

 (b) अपघटनी प्रोटिस्टा :

 इनमें हरित लवक नहीं पाया जाता है।  

 उदा. स्लाइम मॉलड्स

 (c) प्रोटोजोआ प्रोटिस्टा :

 पैरामिसियम : स्वच्छ जल में युक्तजीवी

 प्लाज्मोडियम : मनुष्यों में मलेरिया रोग उत्पन्न करता है

 अमीबा : एक कोशिकीय सरलतम जीव, कोई निश्चित आकार नहीं।

3.  कवक जगत (Fungi Kingdom)

 जिस शाखा के अन्तर्गत कवक का अध्ययन किया जाता है। उसे माइकोलॉजी (कवक विज्ञान) कहा जाता है प्रथम प्रति-जैविक पेनीसिलीन थी जिसे पेनेसिलियस नोटेरम कवक से प्राप्त किया था।

– इनकी कोशिका भित्ति सेलुलोज की बनी होती है।

– इनमें भोजन ग्लाइकोजन या वसा के रूप में एकत्रित होता है।

– इनमें लैंगिक और अंलैगिक दोनों प्रकार के जनन पाए जाते हैं।  

– ये एककोशिकीय तथा बहुकोशिकीय हो सकते हैं।

– ये मृतोपजीवी, परजीवी तथा सहोपकारिता तीनों प्रकार के हो सकते हैं।

 1. मृतोपजीवी : सड़े गले पदार्थों से पोषण लेते हैं।

  उदा.  1. राइजोपस

   2. पेनीसीलियम – सर्वप्रथम खोजी गई एंटिबायोटिक दवाई (A. Flaming)

 2. परजीवी  : दूसरे प्राणियों से पोषण प्राप्त करते हैं।

    अस्टिलागो, पक्सिनिया।

 3. सहोपकारिता : परस्पर एक दूसरे को पोषण देते हैं।

 उदा. 1. लाइकेन (कवक व शैवाल की सहजीवी संरचना)

  – सल्फर प्रदूषण की सूचक

– यीस्ट का प्रयोग बैकरी उद्योग में होता है।

– कवकों की कोशिका भित्ति काइटिन की बनी होती है।

 (C22 H55 N4O21)

– कवक से रोग :

 – राई में अर्गट रोग

 – दाद: ट्राइफायटॉन कवक

 – एथलीट फुट एपीडर्मोफाइटॉन

4.  पादप जगत (Planteae Kingdom)

– ये सर्वव्यापी, युकेरियोटिक तथा बहुकोशिकीय होते हैं।

– कोशिका भिति सेलुलोज की बनी होती है।

– ये स्वपोषी होते हैं प्रकाश संश्लेषण से भोजन बनाते हैं।

 (a) थैलोफाइटा : इनमें ऊत्तक अनुपस्थित होते हैं जैसे शैवाल।

– जिस शाखा के अन्तर्गत अध्ययन होता है, फाइकोलॉजी (शैवाल विज्ञान) कहलाती है।

– सबसे छोटा गुणसूत्र पाया जाता है तथा भोजन स्टार्च के रूप में एकत्रित रहता हैं।

 (b) ब्रायोफाइटा : ये जल तथा स्थल दोनों पर पाए जाते हैं।

– इनमें संवहन ऊतक नहीं पाए जाते हैं।

– भोजन स्टार्च के रूप में संचित।

– अपुष्पीय तथा बीज रहित होते हैं।

 (c) टेरिडोफाइटा : यह शब्द हैकल ने दिया था, ये नमी वाले स्थानों पर पाए जाते हैं।

– ये बीच रहित होते हैं।

– इनमें संवहनी ऊतक पाए जाते हैं।

 (d)अनावृतबीजी : (Gymnosperms) (नग्न+बीज)

– इनकी जड़ों में सहजीवी कवक पाया जाता है जिसे माइकोराइजा कहते हैं।

– अण्डाशय तथा पुष्प का अभाव पाया जाता है।

 उदा. पाइनस, साइकस, सागो, पल्म etc.

 (e) आवृत्तबीजी : (Angiosperms) (फूल+बीज)

– इसमें अण्डाशय व पुष्प पाए जाते हैं।

 उदा. आम, ross, कैक्टस etc.

  • जन्तु जगत (Animal Kingdom) :

– ये बहुकोशिकीय, युकेरियोटिक तथा विषमपोषी होता है।

– इनमें कोशिका भित्ति अनुपस्थित होती है।

– इन्हें दो भागों में विभाजित किया जाता है।

 (a) प्रोटोजोआ :

 ये एक कोशिकीय युकेरियोटिक जीव है

 उदा. अमीबा, युग्लिना, प्लाज्मोडियम

 (b) मेटाजोआ : ये बहुकोशिकीय होते हैं। 9 भाग होते हैं :-

 (i) पोरीफेरा : अध्ययन R.E. Graunt ने किया था इसका अर्थ है "छिद्र धारक"। इसलिए इसे 'स्पंज' कहते हैं। जल सोखने की क्षमता होती है। Ex. साइकन, मयोनिया etc.

 (ii) प्लेटी हेल्मीन्थीज : इनका शरीर त्रिस्तरीय होता है।

– अधूरा पाचन तंत्र पाया जाता है।

– देहगुहा अनुपस्थित होती है Ex. फीता कृर्मी, प्लेनेरिया etc.

 (iii) सिलेन्ट्रेटा : सिलेन्ट्रॉन नामक गुहा से भोजन का पाचन होता है।

 Ex. जेलिफिस, फाइसेलिया etc.

 (iv) एस्केल्मीन्यीज : इनका शरीर द्विपक्षीय सममित होता है। एकलिंगी होते हैं, लैंगिक जनन पाया जाता है।

 (v) एनिलिडा : इनके शरीर में खण्ड पाए जाते है। द्विस्तरीय तथा पूर्ण विकसित पाचन तंत्र पाया जाता है।

 Ex. कैंचुआ, जोक (leech)

 (v) आर्थोपोडा : यह जन्तु जगत का सबसे बड़ा संघ है। इनके पादो में संधि या Toint पाए जाते हैं।

 Ex. तितली, झींगा मछली

 (vii) मोलस्का : यह दूसरा सबसे बड़ा जन्तु जगत है।

– इनका शरीर मूलायम होता है तथा ये कैल्सियम बाई कार्बोनेट स्त्रावित करते है।

 Ex. शंख, सीप, घोंघा इत्यादि

 (viii) इकाइनोडर्मेटा : यह समुद्री जीव होता है

 – इनकी त्वचा पर कांटे (कोटे+त्वचा) पाए जाते हैं।

 Ex. तारा मछली, एकाईनस etc.

 (xi) कॉर्डेटा : यह सबसे विकसित संघ है इनमें पूर्ण विकसित व बन्द प्रकार का परिवहन तंत्र होता है इसके कुल 13 वर्गों में से प्रमुख वर्ग निम्न हैं :-

  • मत्स्य वर्ग :-

– ये जलीय जीव होते हैं।

– क्लोमो द्वारा श्वसन करते हैं, जो जल में घुलनशील श्वसन लेते हैं।

– इनमें वायु थैली होती है जो जल दाब नियंत्रित करती है।

– यह अनियत तापी जन्तु होते हैं के वातावरण के अनुसार ताप बदलते हैं।

 Ex. लायन मछली, डॉग मछली, समुद्री घोड़ा etc.  

  • उभयचर वर्ग :-

– जल तथा थल दोनों में निवास करते हैं।

– जल में श्वसन क्लोमों द्वारा तथा थल पर त्वचा व फेफड़ों द्वारा होता है।

– असमतापी होते हैं। 2 आलिंद व 1 निलय होता है।

– जनन प्रक्रिया में अंडों को जन्म देते हैं।

 Ex. सैलामैडर, मेंढक, टोड etc.

  • सरीसृप वर्ग :-  

– ये धरातल पर रेंगने वाले जन्तु होते हैं।

– अनियततापी होते हैं।

– श्वसन के लिए फेफड़ों का उपयोग करते हैं।

– त्वचा पर कांटेदार सल्क का आवरण होता है।

– हृदय तीन कोष्ठीय होता है। अपवाद : मगरमच्छ (4)

 उदा. छिपकली, मगरमच्छ, कछुआ etc.

  • पक्षी वर्ग :

– इनके अग्रपाद पंख के रूप में परिवर्तित होते हैं।

– ये फेफड़ों से श्वसन करते है इनका हृदय 4 कोष्टों में बंटा होता है।

– ये नियतस्त्रावी जीव है व जनन में अंडे देते हैं।

 Ex. कबूतर, कौआ, मोर, तोता  etc.   

  • स्तनधारी :

– इस वर्ग के जीवों में मादाओं के स्तन ग्रंथियाँ पायी जाती है –

– श्वसन फेफड़ों द्वारा होता है।

– एकलिंगी होते हैं।

– हृदय 4 कोष्ठिय होता है।

– कुत्ता, बिल्ली, मनुष्य etc.

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